प्रायश्चित
एक राजा को घोड़ा बहुत प्यारा था। पर उसकी बुरी आदत से राजा को नीचा देखना पड़ता था। चलते-चलते घोड़े को खाने की चीज दिख जाए तो बस उधर ही चल देता था।
पुराने सईस को बुलाया गया, उसने घोड़े को दौड़ाया जैसे ही वह खाने की ओर बढ़ता सईस कोड़ा मारता, दो-चार कोड़े खाकर उसने यह आदत छोड़ दी।
हमारा मन भी घोड़े की तरह है, संसार की ओर भागे तो तगड़े प्रायश्चित का कोड़ा लगा दें, धीरे-धीरे भागना छोड़ देगा।
ब्र. (डॉ.) निलेश भैया




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प्रायश्चित का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण हेतु जब कभी ग़लत कार्यों के होने पर प्रायश्चित लेना परम आवश्यक है, ताकि जीवन में सुधार हो सकता है।