# Maitree Sandesh ## Posts - [पंचशील](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%b6%e0%a5%80%e0%a4%b2/): बौद्ध मत का पाँचवाँ शील बताया है…. मद्यपान-विरति, जैन दर्शन में पांचवाँ……………………………… अपरिग्रह। ब्र. डॉ. नीलेश भैया - [सकारात्मक सोच](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%b8%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%95-%e0%a4%b8%e0%a5%8b%e0%a4%9a-3/): माली राजा को रोज़ाना फल लाकर देता था। राजा एक खाता/ रखता, दूसरा माली के ऊपर फेंकता। माली कहता “अच्छा हुआ”। पूछा, ऐसा क्यों कहता है ? अच्छा हुआ मैं तरबूज नहीं लाता। ब्र. डॉ. नीलेश भैया - [जैनदर्शन](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%9c%e0%a5%88%e0%a4%a8%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6%e0%a4%a8/): जैनदर्शन न द्वैतवादी है, ना ही अद्वैतवादी है। द्वैतवादी संश्लेष तथा संयोग सम्बन्धों को मानते हैं, अद्वैतवादी दोनों को नहीं। जैनदर्शन तो इन दोनों सम्बन्धों के अलावा तादाम्य सम्बन्धों को भी मानता है। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी - [दृष्टि](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%a6%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a4%bf-17/): मोटे पेट वाला व्यक्ति गोल्फ़ खेलने गया। बॉल पास में रखी तो दिखी नहीं, दूर रखी तो वहाँ स्टिक पहुँचे नहीं। हमारी भी दूर/ दूसरों की चीज़ों पर दृष्टि जाती है पर पहुँच नहीं। पास/ अपने पास की चीज़ों पर दृष्टि पहुँचती नहीं। (क्योंकि पेट बड़ा है/ संचय ज्यादा है, सदुपयोग कम) ब्र. डॉ. नीलेश भैया - [तीर्थंकरों की महिमा](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%a4%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%82%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%ae%e0%a4%be/): तीर्थंकरों की महिमा…. श्री सोनागिर सिद्धक्षेत्र से मुनि नँगकुमार, अनँगकुमार जी मोक्ष गये। चन्द्रप्रभु भगवान का समवसरण आया। मूलनायक प्रतिमा चन्द्रप्रभु भगवान की ही है। चिंतन - [शिष्य / गुरु](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%b6%e0%a4%bf%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%81/): आचार्य श्री विद्यासागर जी से पूछा…. आप अपने को कैसा शिष्य मानते हैं ? सूखे पत्ते सा। वो कैसे ? सुखे पत्ते की अपनी कोई इच्छा/ मंज़िल नहीं होती, गुरु रूपी हवा जिधर ले जाती है, उधर चला जाता है। आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी - [अभिषेक](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%85%e0%a4%ad%e0%a4%bf%e0%a4%b7%e0%a5%87%e0%a4%95-7/): अभिषेक पांडुकशिला पर “श्री” लिखकर करना चाहिये। ताकि भगवान पर ढाया हुआ जल “श्री” को छूता हुआ आये। क्योंकि अभिषेक श्रावकों के द्वारा श्रावकों के लिये होता है, उनको मोक्षलक्ष्मी के साथ-साथ श्रीलक्ष्मी भी चाहिये होती है। ठोड़ी के नीचे कपड़ा लगाकर अभिषेक करना सही नहीं है। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी - [सकारात्मकता](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%b8%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%95%e0%a4%a4%e0%a4%be-16/): वैज्ञानिक आइंस्टीन की सालों की मेहनत अचानक प्रयोगशाला में आग लगने से समाप्त हो गयी। आइंस्टीन…. अच्छा हुआ मेरी गल्तियाँ समाप्त हो गयीं, अब नये सिरे से बेहतर काम शुरु करुँगा। एकता – पुणे - [मीमांसा](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%be/): दर्शन तीन प्रकार के – तत्त्व मीमांसा –> सृष्टि का निर्माण कैसे आदि। ज्ञान मीमांसा –> ज्ञान की सीमायें क्या हैं। आचार मीमांसा –> ये ज्ञान हमारे जीवन में बदलाव कैसे लाये। ब्र. डॉ. नीलेश भैया - [सम्बन्ध](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%ac%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a7/): नदी/ सूरज हमसे सम्बन्ध बनाते नहीं, हम आगे बढ़कर बनाते हैं, प्यास बुझाने/ ताप लेने। भगवान/ गुरु से हमें ही Connect होना होगा। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी - [समय](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%af-11/): स्टेज पर दूसरे कार्यक्रमों की बहुलता तथा धर्मचर्चा के लिये समय बहुत कम रह जाने पर, आचार्य श्री विद्यासागर जी –> समय की कीमत करो, ये साधु अपना-अपना स्वाध्याय छोड़कर यहाँ धर्मचर्चा करने/ सुनने आये हैं। एक समय में इनकी असंख्यात् गुणी निर्जरा हो सकती थी। एक समय में जीव नरकायु बांधते-बांधते मुक्त हो सकता है। आचार्य श्री विद्यासागर जी - [शून्य](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%b6%e0%a5%82%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%af-3/): शून्य अंदर/ बाहर से खाली होता है। जिन‌का जीवन अंदर/ बाहर से खाली होता है, उनके जीवन में पूर्ण विराम लग जाता है। शून्य पूर्णता का प्रतीक है। (जिस अंक के पीछे भी लगा दो तो उसकी कीमत बढ़ जाती है) मुनि श्री प्रमाणसागर जी - [भागदौड़](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%97-%e0%a4%a6%e0%a5%8c%e0%a4%a1%e0%a4%bc/): भागदौड़…. कुत्ता एक मिनट में 15 बार सांस लेता है, औसत आयु 10 वर्ष। कछुआ एक मिनट में 2 बार सांस लेता है, औसत आयु 400 वर्ष। क्या अपनी सांस की ओर नज़र डालते हैं हम ? - [धर्म / दान](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%a8/): आहार-दान धर्म है इसलिये देने तथा लेने वाले दोनों का धर्म बढ़ेगा। यदि साधु के पेट भरने का भाव आ जाय तो धर्म नहीं। ऐसे ही आर्शीवाद जब अभय-दान बन जाता है तब बहुत कारगर बन जाता है। पर काम करेगा अपने से छोटों पर। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी - [कषायों की तीव्रता](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%95%e0%a4%b7%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%a4%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a4%be/): किसी जीव का क्रोध अनंतानुबंधी का है, बाक़ी कषायें मंद दिखती हैं, पर बाकी कषायें भी आयेंगी मंद अनंतानुबंधी की श्रेणी में ही। क्योंकि कषायों की तीव्रता गुणस्थानों से निर्धारित होती है, न कि बाह्य रूप से। चिंतन - [लाड़ / डांट](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%a1%e0%a4%bc-%e0%a4%a1%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%9f/): लाड़ से खुशी सुरक्षित, डाँट से हित। इसीलिये गुरु शिष्य को डाँट लगाकर रखते हैं। आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे…. पर डाँट इतनी तगड़ी मत लगा देना कि शीशी से दवा निकले ही नहीं(उद्देश्य पूरा होगा ही नहीं)। मुनि श्री प्रमाणसागर जी - [विकथा](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%a5%e0%a4%be/): विकथा 4 नहीं, 15 होती हैं…. स्त्री, धन, भोजन, नदी पर्वत से घिरे स्थान/ केवल पर्वतों से घिरे स्थान, राज, चोर, देश-नगर, खान, नट, भाट, मल्ल, कपट, व्याध, जुआरी, हिंसकों की कथायें। आत्मप्रशंसा/ परनिंदा, जिससे प्रयोजन सिद्ध न हो, हार-जीत जहाँ अपना कुछ लेना-देना न हो। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र – अध्याय 8/7) - [बंध / अबंध](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%ac%e0%a4%82%e0%a4%a7-%e0%a4%85%e0%a4%ac%e0%a4%82%e0%a4%a7/): भगवान महावीर से उनके सबसे बड़े शिष्य गौतम जी ने पूछा… आप भी इस संसार में, मैं भी; पर आप अबद्ध (संसार/ कर्मों से), मैं बद्ध। ऐसा कैसे ? एक आम के पेड़ पर दो तोते। एक आम चख रहा है(बद्ध), दूसरा पेड़ पर रहते भी तटस्थ बैठा है (अबद्ध)। ब्र. डॉ. नीलेश भैया - [वैय्यावृत्त्य](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%b5%e0%a5%88%e0%a4%af%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a5%83%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af/): आचार्य श्री भद्रबाहु जी की वैय्यावृत्त्य देवता भी करते थे। कैसे ? गर्मी/ प्यास ज्यादा होने पर बादल की छांव करके। - [अंधकार / छाया](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%9b%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%be/): अंधकार… प्रकाश का अभाव। छाया……. प्रकाश का अवरोध। चिंतन - [रूपी / मूर्तिक](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%b0%e0%a5%82%e0%a4%aa%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf/): 1. आत्मा –> रुपी संसारी की, रुपी/ अरुपी केवलज्ञानी का विषय। अमूर्तिक(निश्चित आकार नहीं)। सिद्ध –> अरुपी, अमूर्तिक … केवलज्ञानी का विषय। 2. विषयभोग –> रूपी क्योंकि पौद्गलिक, मूर्तिक भी। 3. काल/ धर्म/ अधर्म –> मूर्तिक क्योंकि आकार निश्चित, अमूर्तिक क्योंकि स्पर्श आदि नहीं। आकाश –> अमूर्तिक (अनन्त है), अरूपी। केवलज्ञानी को रूपी (दिखने की अपेक्षा)। पुद्गल –> मूर्तिक, रूपी। सूक्ष्म-पुद्गल प्रत्यक्षज्ञानी का विषय, स्थूल-पुद्गल मति/ श्रुतज्ञानी का विषय। चिंतन - [इंद्रियों पर नियंत्रण](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%87%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a3/): इंद्रियों पर नियंत्रण रखने के लिये मन को असंतुष्ट रखें। मीठा मन को अच्छा लगता, सो और-और मांगता है, जिव्हा नहीं। (असंतुष्ट मन बुझ आता है फिर ज़िद नहीं करता है) आचार्य श्री समयसागर जी - [गर्भ कल्याणक](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%97%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ad-%e0%a4%95%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a4%95/): संस्कारों का महत्व बताने के लिये गर्भ-कल्याणक दो दिन मनाया जाता है। देवियाँ भगवान की माँ की सेवा में, गर्भ की रक्षा हेतु नहीं बल्कि संस्कारों की रक्षा के लिये क्योंकि माँ के भावों का प्रभाव गर्भ के जीव पर पड़ता है। मुनि श्री प्रमाणसागर जी - [निवेश](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a5%87%e0%a4%b6/): अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिये धनोपार्जन आदि क्षेत्रों में निवेश करते रहते हैं। शुद्ध विचारों का निवेश नहीं करने तो शुद्ध का उत्पादन कैसे होगा ? ब्र. डॉ. नीलेश भैया - [प्रमाद](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a6-9/): प्रमाद…. कुशल (मंगलरूप, हितकारी कार्य) में अनादर। प्रमाद से ही व्यसन, व्रतों में दोष। प्रमाद होने पर विकथा आदि होने का नियम नहीं। लेकिन विकथा आदि हो रही है तो प्रमाद होगा ही। 6वें गुणस्थान का प्रमाद (अंतरंग) शुद्ध से शुभ-व्रृत्ति में आने से। थकान दूर करने के लिये निद्रा प्रमाद नहीं। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र – अध्याय 8) - [सुधार प्रवृत्ति](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%a7%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a5%83%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf/): सामूहिक पूजा करते समय, प्रायः लोग सामग्री पटकते हैं। सलीके से चढ़ायें, तो टेबल/ थाली सुंदर दिखे। सामने वाला बायें पर डाले तो आप दायें चढ़ायें, वो बिगाड़े आप सुधारें। एक सुंदर कृति उमरती जायेगी, देखने में आनंद देगी। चिंतन - [अचित्त](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%85%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%a4/): अचित्त सेवन से वातादि दोष नहीं होते हैं। जोड़ों के दर्द में लाभ, खासतौर पर शीतकाल में। अपच भी नहीं। शरीर में हलकापन। सचित्त में जीव (त्रस) होते ही हैं, शरीर के अंदर जाकर भी उत्पत्ति। कहा है –-> “सावद्य लेशो बहु पुण्य राशो”। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र – 7/35 ) - [निजता](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%9c%e0%a4%a4%e0%a4%be/): दूसरा (जैसा) बनने के लिये की खुद/ निजता की हत्या करनी पड़ती है। फिर भी दूसरे तो बन नहीं पाते। दूसरे को आदर/ प्रमुखता देने से खुद में हीनता। आप Photocopy बन भी गये तो कीमत 2 रुपये। चोरी (व्यक्तित्व) की, सफलता 10% को। विभाव में चाहते हुए भी टिक नहीं सकते, स्वभाव में वापस आने से रोक नहीं सकते।* ब्र. डॉ. नीलेश भैया * Leopard can not change its spots. - [ज्ञान](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%9e%e0%a4%be%e0%a4%a8-52/): दो अक्षर का (छोटा सा) “ज्ञान”, तीन तीन अक्षरों(बडों) वाले “दर्शन” तथा “चारित्र” के बीच जैसे माता पिता के बीच बच्चा, ताकि उछलकूद न करे। जैसे दो पाटों के बीच नहर, यदि किनारे मज़बूत नहीं तो बाढ़ या जल गंतव्य तक पहुँचेगा ही नहीं। मुनि श्री प्रमाणसागर जी - [धर्म / धर्मात्मा](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be/): धार्मिक क्रियायें तो बहुत‌ लोग बहुत सारी करते हैं पर धर्मात्मा वही जो सुख (पुण्योदय) में दुःखी हो (कि भोगना पड़ रहा है) तथा दुःख (पापोदय) में सुखी हो (कि पाप कर्म कम हो रहे हैं) दीपा जैन – अमेरिका - [मन वृद्ध](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%ae%e0%a4%a8-%e0%a4%b5%e0%a5%83%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a7/): सब इंद्रियों की अपेक्षा अनिन्द्रिय मन सबसे वृद्ध और महत्वपूर्ण है। वह सब इंद्रियों को अपने अनुसार चलाना चाहता है, जैसे कुछ वृद्ध परिवार के हर व्यक्ति को अपने अनुसार चलाना चाहते हैं। इसमें मिथ्यादृष्टि कारणभूत है। चिंतन - [इच्छा / इज़्ज़त](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%87%e0%a4%9a%e0%a5%8d%e0%a4%9b%e0%a4%be-%e0%a4%87%e0%a4%9c%e0%a4%bc%e0%a5%8d%e0%a4%9c%e0%a4%bc%e0%a4%a4/): कुछ बड़ा चाहिये तो जो है उसकी महिमा बढ़ाओ (बखान करो)/ उसके विज्ञापन बनो। जिस धर्म/ व्रतादि से तुम्हारी इज़्ज़त बढ़ी है, तुम उस धर्म/व्रतादि की इज़्ज़त बढ़ाओ। (तुम्हारी इज़्ज़त और बढ़ेगी) निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी - [प्रासुक](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%95-3/): प्रासुक…. “प्र”…. प्रगत ( निकल जाना) “असु”…”असवः (प्राण) प्रासुक होने पर स्पर्श, रस, गंध, वर्ण –> बद‌ल जाँय जल गर्म/ उबालने से भी रस से रसांतर हो जाता है। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र) - [दुःख का कारण](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%83%e0%a4%96-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a3/): सब मनुष्यों के जन्म, मरण तथा दुःख समान ही होते हैं। दुःख समान कैसे ? क्योंकि सबके दुःखों के कारण “भ्रम” ही होते हैं। जैसे सोते में समुद्र में डूबने से उभरने का उपाय… जागना/ तत्व ज्ञान। क्षु. सहजानंद जी (सुख यहाँ) - [कायक्लेश](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%b6/): कायक्लेश…. चलाकर(बुद्धिपूर्वक) काय को क्लेश देना। बाईस परिषहों में से एक। तप का भेद। उपसर्ग अचानक आते हैं, परिषह के लिये पहले से तैयार रहते हैं। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी - [कर्मफल](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%ab%e0%a4%b2-11/): मौसमी के 6-7 फ़ीट के पेड़ पर हज़ारों फूल लगे। बाद में सैकड़ों छोटी-छोटी मौसमी की गाँठें सी बन गयीं। चिंता हुई कि ये छोटा सा पेड़ इतनी मौसमियों का बोझ झेल कैसे पायेगा! 3 सप्ताह बाद कुण्डलपुर यात्रा से लौटा, तो देखा, सिर्फ़ 15-20 मौसमी बढ़ रही हैं। गुरुवर श्री क्षमासागर जी कहते थे, “तुम्हारे कर्म तो बौर जैसे हैं; बहुत हैं। यदि सब एक साथ फलित हो जायें, तो तुम्हारा पाउडर भी नहीं बचेगा!” पुण्य-क्रियाओं से पाप-प्रकृतियाँ झड़ जाती हैं या/और कम हो जाती हैं। चिंतन - [विद्या गुरु मिल जायें](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%81-%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%b2-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a5%87%e0%a4%82/): “…विनती हमारी है बड़े बाबा, विद्या गुरु मिल जायें…” – भजन (ब्र. सलौनी)। प्रश्न… गुरु तो स्वर्ग में, कैसे मिलें ? 1. हम ऐसा पुण्य करें कि उनसे स्वर्ग में मिलें। 2. उनके प्रतिरूप मिल जायें (आचार्य समयसागर जी के रूप में मिल भी गये हैं)। चिंतन - [जीवन का उद्देश्य](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%9c%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%89%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%af-2/): जीवनोद्देश्य… जिनादेश* पालन अनुपदेश…..अन्य का उपदेश नहीं आचार्य श्री विद्यासागर जी * भगवान का आदेश - [निर्माल्य](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%af-3/): माली मेहनत करता है, बदले में मेहनताना निर्माल्य में नहीं आयेगा। मन्दिर का सामान/ दुकान आदि हड़पना निर्माल्य में आयेगा। मुनि श्री प्रमाणसागर जी - [मूल / भूल](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%ae%e0%a5%82%e0%a4%b2-%e0%a4%ad%e0%a5%82%e0%a4%b2/): मूल पर नज़र न रखना ही बड़ी भूल है। मूल पर नज़र तभी जाती है जब नज़र शुद्ध हो। नज़र शुद्ध कैसे हो ? नज़र = ना + ज़र (धन)। धन का संग्रह करना बुरा नहीं, परिग्रह (उससे ममत्व रखना) बुरा है। ब्र. डॉ. नीलेश भैया - [बंध के हेतु](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%ac%e0%a4%82%e0%a4%a7-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b9%e0%a5%87%e0%a4%a4%e0%a5%81/): बंध के हेतु…. सिद्धान्त ग्रन्थों के 3 हेतु…राग, द्वेष, मोह। अन्य ग्रन्थों में 4 हेतु……. मिथ्यात्व, अविरति, कषाय, योग। तत्त्वार्थ सूत्र में 5 हेतु……. मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कषाय, योग। अन्य ग्रन्थकारों ने प्रमाद को अविरति या कषाय में गर्भित कर लिया है। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र – 8.1) - [स्वभाव](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b5-20/): Boss के Boss तक मेरे मित्र ने मेरे खिलाफ शिकायत की। मैं Boss के पास जाकर दु:खी हुआ। Boss… ये तो तुम्हारे हित में हुआ है। जितनी जल्दी व्यक्ति का स्वभाव पता लगे उतना अच्छा। सुनते ही मन शांत। कहीं अपना स्वभाव पता लग जाय तो कितनी शांति मिलेगी ! चिंतन (हां ! दो टके की हांडी तो गई पर कुत्ते की जात पहचानी गई… जे.पी.शर्मा-जयपुर) - [बच गये या मर गये](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%ac%e0%a4%9a-%e0%a4%97%e0%a4%af%e0%a5%87-%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a4%b0-%e0%a4%97%e0%a4%af%e0%a5%87/): एक प्रसिद्ध फ़िल्म में डाकुओं के सरदार ने तीन डाकुओं को गोली मारी पर तीनों बच गये, तीनों बहुत खुश हुए। अचानक सरदार ने तीनों को गोली मार दी। हम भी श्रद्धा, ज्ञान, चारित्र बढ़ाने वाली क्रियाओं से बच कर खुश होते हैं पर कर्म रूपी सरदार जब धराशायी करेगा तब ! चिंतन - [गुरु](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%81-20/): आपका स्मरण रहे, संसार का विस्मरण रहे। गुरु ने मुझे गुरु समय दिया, लघु बनने के लिये। आचार्य श्री विद्यासागर जी - [सल्लेखना](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%b8%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%a8%e0%a4%be-7/): क्षु. श्री जिनेंद्र वर्णी जी की सल्लेखना आचार्य श्री विद्यासागर जी के सानिध्य में चल रही थी। एक दिन आचार्य श्री सम्बोधन देने देर से पहुँचे। वर्णी जी ने परेशान होकर कहा –> “मुझे छोड़ कर न चले जाना, सल्लेखना बिगड़ जायेगी” आचार्य श्री… “वर्णीजी ! सल्लेखना तो स्वयं ली जाती है।” - [ज्ञान](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%9e%e0%a4%be%e0%a4%a8-51/): बड़ों के अनुभव पर आधारित कहानी किस्सों से छोटों को आसानी/ रुचि के साथ ज्ञान ग्राह्य हो जाता है। ये आधारित होती हैं धूप, छांव पर। दुर्दिन, अच्छे दिनों के लिये अच्छी कहानी देने वाले बन जाते हैं । लोग प्रश्न नहीं उत्तर चाहते हैं। ब्र. डॉ. नीलेश भैया - [आचार्य श्री विद्यासागर जी का अंतिम प्रवचन से](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%86%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%97%e0%a4%b0-%e0%a4%9c-2/): पंच परमेष्ठी का Short Form –> “ओंकाराय नमो नमः” आचार्य श्री विद्यासागर जी - [दया](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%a6%e0%a4%af%e0%a4%be-9/): दया तो आत्मा का स्वभाव है, हर जीव में पाया जाता है, अपने बच्चों के प्रति हिंसक जानवरों तक में। जैसे-जैसे आत्मा विशुद्ध होती जाती है, पहले मनुष्यों पर दया, फिर जानवरों, कीड़े मकोड़ों, अंत में सूक्ष्म जीवों पर भी। चिंतन - [स्व-पर कल्याण](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b5-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a3-2/): आचार्य श्री ज्ञानसागर जी* फल (धर्म-पुरुषार्थ) खाकर चले गये। गुठली भी बोई (आचार्य श्री विद्यासागर जी)/ पौधे को संवारा, विकसित भी कर गये। जिस पर आज अनेकों सुगंधित फल/ फूल लग रहे हैं। चिंतन * आचार्य श्री विद्यासागर जी के गुरु - [दान](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%a8-43/): अभक्ष्य खाने वाले को, अभक्ष्य देना दान में नहीं आयेगा। क्योंकि दान तो स्व-पर हितकारी होता है। अभक्ष्य देने में स्व का अहित तो है ही, “पर” का भी धार्मिक/ आत्मिक स्तर पर अहित होगा। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी - [प्रमाद](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a6-8/): प्रमाद जीतने के उपाय … विकथा –> शास्त्रानुसार भाषण या मौन। कषाय –> कलुषित भावों की निंदा करें/ क्षमा धारण करें। विषयासक्ति –> लोकनिंदा का ध्यान/ दुष्परिणाम पर विचार। निद्रा –> दुर्गति का शोक भाव/ सामूहिक स्वाध्याय करें। स्नेह –> बंधनों से आत्म-अहित का चिंतन करें। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र/अध्याय – 8) - [सापेक्ष](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%aa%e0%a5%87%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7/): सापेक्ष… तीन मित्र घूमने निकले। घोंघा कछुए की पीठ पर, शिकायत करता रहा –> धीरे चलो। साथ में खरगोश को कछुए से शिकायत थी ——> इतना धीरे क्यों चल रहे हो ? ब्र. डॉ. नीलेश भैया - [आयु](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%86%e0%a4%af%e0%a5%81-3/): देव, नारकी तथा भोगभूमिज की आयु बहुत बड़ी-बड़ी, मनुष्य/ तिर्यन्च की कम क्यों ? मनुष्य/ तिर्यन्च संयम ले सकते हैं और संयम लेने के लिये लम्बी आयु की ज़रूरत नहीं होती। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी - [Advice](https://maitreesandesh.com/advice-3/): Good advice is always certain to be ignored, but that’s no reason not to give it. J. L. Jain (Agatha Christie) - [द्रव्य / तत्त्व / पदार्थ](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%a4%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b5-%e0%a4%aa%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5-2/): जीव (आत्मा)………… द्रव्य। जीवत्व…………………..तत्त्व। जीव की पर्याय (मनुष्यादि)… पदार्थ। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी - [भगवान का घर](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%ad%e0%a4%97%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%98%e0%a4%b0/): अपने घर को अपना न कहकर भगवान का कहने से घर में गलत काम नहीं हो पायेंगे। जैसे मन्दिर में नहीं कर पाते। - [ज्ञान](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%9e%e0%a4%be%e0%a4%a8-50/): ज्ञान तो बस ज्ञान है। माध्यम/ ग्रहण करने वाला सम्यक्/ मिथ्या हो सकता है। मुनि श्री मंगलसागर जी - [मोह](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%ae%e0%a5%8b%e0%a4%b9-47/): मोह रूपी छोटा सा कागज़ भी आँख के करीब रखने से, वह पहाड़ जैसे बन जाता है। जिसके पीछे पूरा संसार ढक जाता है। सुख यहाँ - [रोना](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%a8%e0%a4%be-3/): अपने गुरु आचार्य श्री विद्यासागर जी की समाधि होने पर शिष्य रोये। मुनि को रोना चाहिये ? नहीं, लेकिन रोओ तो चन्दनबाला जैसा कि भगवान लौट आयें; या गौतम स्वामी जैसा कि भगवान के पास चले जाओ। मुनि श्री विनम्रसागर जी - [ज्ञान](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%9e%e0%a4%be%e0%a4%a8-49/): ज्ञान दो साधनों से –> 1. वस्तु(अजीव) जगत से… इसमें स्थायीपना होता है सो प्रमाणिक है जैसे आग जलाती है। आजकल इसका आदर बहुत बढ़ गया है। 2. जीव जगत से…इसमें स्थिरता नहीं। आदर घट गया है। ब्र. डॉ. नीलेश भैया - [दोष](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%a6%e0%a5%8b%e0%a4%b7-10/): 1. अतिक्रम –> मन की शुद्धि में कमी। 2. व्यतिक्रम –> मन से मर्यादा उलंघन। 3. अतिचार –> अज्ञान/ प्रमादवश विषय में प्रवृत्ति। 4. अनाचार –> दोष से हट न पाना। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र 7/23) - [Feelings](https://maitreesandesh.com/feelings/): गृहस्थों के लिए… One of the best feelings in the world is… knowing that someone is happy because of you. (J.L.Jain) साधुओं के लिए… One of the greatest feelings in the world is… knowing that no one is unhappy because of you. Reaction of Kalpesh bh. - [द्वितियोपशम सम्यक्त्व](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%aa%e0%a4%b6%e0%a4%ae-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b5/): द्वितियोपशम सम्यक्त्व के साथ कौन से स्वर्ग में जाते हैं ? पहले से लेकर सर्वार्थसिद्धि तक, किसी में भी। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी - [मोह](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%ae%e0%a5%8b%e0%a4%b9-46/): मोह कम/ समाप्त कैसे होता है ? संसार/ सम्बन्धों को क्षणिक/Temporary मानने, उसका बार-बार चिंतवन करने से। मुनि श्री प्रमाणसागर जी - [प्रमाद / हिंसा](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%be/): कोई व्यक्ति सिर्फ बैठा है, इसमें हिंसा कैसे घटित होगी ? प्रमाद में बस बैठने से अपने समय/ मन का दुरुपयोग कर रहा है। भाव/ निश्चय हिंसा कर रहा है। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र 7/13) - [भाग्य / पुरुषार्थ](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%81%e0%a4%b7%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5-6/): भाग्य / पुरुषार्थ… एक प्रसिद्ध ज्योतिषी ने मेरी उम्र 62 वर्ष बतायी थी। फिर थोड़ा धर्म/ अनुशासित जीवन किया तो 72 वर्ष पर आ गया। तब धर्मादि और बढ़ाये, 80 वर्ष तक आ चुका हूँ, लगता है 82 वर्ष होने की सम्भावना है। चिंतन - [ऋषभनाथ भगवान](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%8b%e0%a4%b7%e0%a4%ad%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%a5-%e0%a4%ad%e0%a4%97%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a8/): ऋषभनाथ भगवान का चिन्ह बैल नहीं, क्योंकि बैल तो नपुंसक होता है। उनका चिन्ह है “वृषभ” (सांड़)। मुनि श्री मंगलानन्द सागर जी - [मौन](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%ae%e0%a5%8c%e0%a4%a8-10/): मौन… म (मन) + ऊन (कम करना)। मौन में मन को कम होना चाहिये। ब्र. डॉ. नीलेश भैया - [श्रावक / आत्मानुभव](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%95-%e0%a4%86%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%81%e0%a4%ad%e0%a4%b5/): जब तक बाह्य दृष्टि रहेगी, अंतरंग पर दृष्टि/ आत्मानुभूति कैसे हो सकती है ? श्रावक बाह्य से दृष्टि हटा नहीं सकता। चिंतन - [मोह](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%ae%e0%a5%8b%e0%a4%b9-45/): जैसे कीचड़ से कीचड़ नहीं धुल सकती है, वैसे ही मोह से मोह धुलता नहीं है, बल्कि बढ़ता ही है। क्षु. श्री सहजानंद जी - [मैं](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%82-7/): जिसमें मेरी आत्मा नहीं, वह “मैं” नहीं। (जैसे मकान, रिश्तेदार आदि) क्षु. श्री सहजानंद जी - [Who you are ?](https://maitreesandesh.com/who/): Committing yourself is a way of finding out who you are. A man finds his identity by identifying. Robert E. Terwilliger - [आत्मा](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%86%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be-21/): आत्मा एकत्व(अपने में पूर्ण लीन), विभक्त(अन्य से भिन्न) रूप है। क्षु. श्री सहजानंद जी - [धोखा](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%a7%e0%a5%8b%e0%a4%96%e0%a4%be-6/): धोखे से कमाये गये धन को पुण्य में लगाने पर पुण्य उसको मिलेगा जिसको धोखा दिया गया था। गुरु गोविन्द सिंह - [चोरी](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%9a%e0%a5%8b%e0%a4%b0%e0%a5%80/): परमार्थ में चोरी… “पर” को अपना मानना। क्षु. श्री सहजानंद जी - [संगति](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a4%a4%e0%a4%bf-25/): संगति… गंगा का शुद्ध जल भी नाली में गंदा हो जाता है। चिंतन - [भक्ति](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%ad%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf-6/): शुद्धोपयोग में शुद्ध की अनुभूति, भक्ति में भगवान बनने की। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी - [शुभ-लाभ](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%b6%e0%a5%81%e0%a4%ad-%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%ad-2/): शुभ… यानी अशुभ से दूर। लाभ… यानी फायदा –> संसार में धनादि का (धर्म में आत्मकल्याण का)। आचार्य श्री विद्यासागर जी - [अनर्थदण्ड विरत](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5-%e0%a4%a6%e0%a4%a3%e0%a5%8d%e0%a4%a1-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a4%a4/): अनर्थदण्ड विरत = मन, वचन और काय की कुचेष्टाओं का त्यागी अनर्थ = निष्प्रयोज्य दण्ड = मन, वचन और काय की कुचेष्टायें विरत = उदासीन, त्यागी कमलकांत - [घमंड](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%98%e0%a4%ae%e0%a4%a3%e0%a5%8d%e0%a4%a1/): हम इन्द्रियों का बहुत घमंड करते हैं। कानों से सुने, आँखों से देखे को ही सही मानते हैं। क्षु. श्री सहजानंद जी</span - [पद्मासन मूर्ति](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a4%a8-%e0%a4%ae%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf/): प्राय: पद्मासन मूर्तियाँ क्यों ? तप भी इसी मुद्रा में ? पैर जमीन से नकारात्मक ऊर्जा लेते हैं। पद्मासन में पैर तथा हथेलियाँ ऊपर की ओर, सकारात्मक ऊर्जा ग्रहण करतीं हैं। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी - [Jainism](https://maitreesandesh.com/jainism/): Jainism –> “How to Live” ही नहीं, “How to Die” भी है। आचार्य श्री विद्यासागर जी - [साता](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a4%be-4/): असाता से साता में जाने का तरीका –> पूजा, स्वाध्याय आदि का कोटा तय मत करो, समय की सीमा बना लो जैसे एक मुहूर्त पूजा करेंगे, दो मुहूर्त स्वाध्याय आदि। चिंतन - [धनवान](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%a7%e0%a4%a8%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a8-2/): आचार्य मानतुंग के अनुसार धनवान वह जो अपने धन का उपयोग धनहीनों को धन, पुण्यवानों को आहार दानादि, बराबर वालों को सहयोग प्रदान करता हो। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी - [इन्द्रिय-विजय](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%87%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%af-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%9c%e0%a4%af-3/): रामकृष्ण मिशन के साधुओं ने आचार्य श्री विद्यासागर जी से पूछा… “इन्द्रिय-विजय कैसे करें?” “इन्द्रियों को इन्द्रियों का काम करने दो।” “वो तो हम करते ही हैं!” “नहीं, तुम इन्द्रियों के सारे विषयों का भोग मन से करते हो; इन्द्रियों को तो सिर्फ़ माध्यम बनाते हो।” मुनि श्री प्रमाणसागर जी - [सब्र](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%b8%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b0-3/): बारात के पीछे हॉर्न बजाने से फ़ायदा कुछ नहीं, नुकसान –> आकुलता, ध्वनि-प्रदूषण। बेहतर है नाच लो –> कलुषता कम होगी, न्योछावर राशि में नोट भी मिल जाएँ। ब्र. डॉ. नीलेश भैया</span - [ज्ञान](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%9e%e0%a4%be%e0%a4%a8-48/): सामान्यजन का ज्ञान प्राय: धारावाहिक/ पुनरावृत्ति वाला होता है। यही सही है (चाहे झूठ ही क्यों न हो) मिथ्याज्ञान है, क्योंकि संयोगपने से पैदा होता है। जैसे बहू की पीड़ा को झूठा मानते हैं क्योंकि सास ने भी बहाने बनाये थे। ब्र. डॉ. नीलेश भैया - [शरीर / आत्मा](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%b6%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%86%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be-6/): आत्मा शरीर के माध्यम से भोग करती है। तभी तो शरीर पर चींटी, अनुभव आत्मा करती है। आत्मा निकलने के बाद बिच्छू भी काट ले तो अनुभव नहीं। प्रश्न… फिर मरने पर “राम/ अरिहंत नाम सत्य” क्यों सुनाते हैं ? मुर्दे को नहीं, ले जा रहे लोगों को सुनाते हैं। चिंतन - [चेतना](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%9a%e0%a5%87%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a4%be-3/): कर्म-फल चेतना का अनुभव… कि मैं हूँ। फल भोगना सुख-दु:ख की अनुभूति तो सब जीवों में होती है, कीड़ों में भी। कर्म-चेतना (कर्ता भाव) संज्ञियों में तथा ज्ञान-चेतना सिद्धों में (पूर्ण रूप से)। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी - [अहिंसा / अनुकम्पा](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%85%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%be-%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a4%be/): अहिंसा मुनियों के लिये क्योंकि उनके पास अनुकम्पा करने के साधन नहीं होते हैं। अनुकम्पा तो गृहस्थों के लिये होती है। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी - [धर्मात्मा](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be-12/): धर्म शुरु में काँटों* से बचने को कहता है। आगे चलकर फूलों** से भी। चिंतन *अशुभ से। **शुभ/ सुख-सुविधा। - [गुरु](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%81-19/): गुरु कोई व्यक्ति नहीं शक्ति हैं। जो हमको कभी नज़रों से, कभी आशीर्वाद से और कभी भावनाओं से बिना कहे/ बिना कुछ करे शक्ति देते रहते हैं। आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी - [आहार](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%86%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b0-10/): 1991 के मुक्तागिरी के चातुर्मास में आचार्य श्री विद्यासागर जी ने मुनियों को सम्बोधन दिया… दुर्भाग्य है कि पंचमकाल में आहार के लिए रोज़ उठना पड़ता है, पर कम से कम मन से तो मत उठो। आचार्य श्री समयसागर जी</span - [अनेकांत](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%a4-15/): जितना कीमती हीरा, उतने ज्यादा कोण। ऐसे ही जिस व्यक्ति के जितने ज़्यादा दृष्टिकोण, वह व्यक्ति उतना ही ज़्यादा महान। निर्यापक मुनि श्री वीरसागर जी - [ज्ञान](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%9e%e0%a4%be%e0%a4%a8-47/): कम से कम ज्ञान निगोदिया को। जिसे “नित्य उद्घाटित ज्ञान” कहते हैं। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र – अध्याय 8) - [जीना](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%9c%e0%a5%80%e0%a4%a8%e0%a4%be-9/): जीना और जाना तो निश्चित है। कैसे जाना/ क्या करके जाना ताकि आगे का जीवन अच्छे से जी सकें, यह हमारे हाथ में है। चिनाई में पुरानी ईंटें, नई ईंटों की दिशा और दशा निर्धारित करती हैं। ब्र. (डॉ.) नीलेश भैया - [नय](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%a8%e0%a4%af-9/): नय हमारे लिए। अपराध स्थल से छोटे-छोटे सबूतों को जुटाकर केस सुलझाते हैं। लेकिन हमेशा सुलझा नहीं पाते हैं। इसीलिए भगवान जब तक सर्वज्ञ नहीं होते, धर्मज्ञ नहीं होते (प्रवचन नहीं करते)। ब्र. डॉ. नीलेश भैया</span - [सीमा](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%b8%e0%a5%80%e0%a4%ae%e0%a4%be-7/): साधना की सीमा क्या होनी चाहिये ? साध्य की प्राप्ति तक। आचार्य श्री विद्यासागर जी - [ब्रह्मचर्य](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%9a%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%af-4/): ब्रह्मचर्य व्रत … आलम्बन सहित। ब्रह्मचर्य धर्म … आलम्बन रहित। (नीलेश भैया – सांगानेर)</span - [प्रवेश](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a5%87%e0%a4%b6/): अपने मकान/ मच्छरदानी में एक छोटे से मच्छर का भी प्रवेश वर्जित है। अपनी आत्मा में दुश्मनों का भी प्रवेश वर्जित नहीं ! चिंतन ## Pages - [पटाखे](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%9f%e0%a4%be%e0%a4%96%e0%a5%87/): पटाखे जलाने से आठ प्रकार के कर्म बंधते हैं… 1) कागज़ के जलते हुये अक्षर से ज्ञानावरणीय कर्म 2) जीवित प्राणियों के अंग विच्छेदन से दर्शनावरणीय कर्म 3) प्राणियों को कष्ट पीड़ा से असाता वेदनीय कर्म 4) पटाखे फोड़ने का आनंद लेने से मोहनीय कर्म 5) पटाखों से जीवों का विनाश होने से तिर्यंच/ नरकायु 6) प्राणी जीवों के शरीर के नाश से अशुभ नामकर्म 7) फूटते पटाखे का अहंकार करने से नीचगोत्र कर्म 8) जीवों की शांति भंग करने से अंतराय कर्म (रेनू-नयाबाजार) - [Testing 30 Dec](https://maitreesandesh.com/testing-30-dec/): जो मात्र किताबी शिक्षा दे, वह शिक्षक। इनसे पढ़ने वाले छात्र कहलाते हैं। ये शिक्षा Carrier/ पैसा कमाने के लिये। गुरु शिक्षा के साथ Implementation सिखाते/ जीवन बनाते हैं। इनसे पढ़ने वाले शिष्य कहलाते हैं। गुरु अपने अनुभव से पढ़ाते हैं। इसीलिये बच्चों को गुरु से Attach करना चाहिये। - [test](https://maitreesandesh.com/44727-2/): Content here!… Pages CATEGORIES 2010 2011 2012 2013 2014 2015 2016 2017 2018 2019 2020 2021 2022 Email News Quotation Story संस्मरण-आचार्य श्री विद्यासागर संस्मरण – अन्य संस्मरण – मुनि श्री क्षमासागर वचनामृत-आचार्य श्री विद्यासागर वचनामृत – मुनि श्री क्षमासागर वचनामृत – अन्य प्रश्न-उत्तर पहला कदम डायरी चिंतन गुरु आध्यात्मिक भजन अगला-कदम Archives Blogroll आचार्य श्री विद्यासागर जी गुणस्थान चार्ट मुनि श्री क्षमासागर जी Tag Cloud Recent Posts - [जैनदर्शन पारिभाषिक-कोश - Testing](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%9c%e0%a5%88%e0%a4%a8%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6%e0%a4%a8-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%b6-testing/): जैनदर्शन पारिभाषिक-कोश प्रस्तुति : मुनि क्षमासागर अ अकाम – निर्जरा – अपनी इच्छा के बिना इन्द्रिय-विषयों का त्याग करने पर तथा परवश होकर भोग-उपभोग का निरोध होने पर उसे शान्ति से सह लेना, इससे जो कर्मों की निर्जरा होती हे उसे अकाम-निर्जरा कहते है । अकाल-मृत्यु – विषभक्षण आदि किसी बाह्य कारण के मिलने पर समय से पहले ही आयु का क्षीण हो जाना अकाल-मृत्यु हे। इसे कदलीघात- मरण भी कहते हैं । अकृत्रिम – चैत्यालय – देखिए चैत्यालय । अक्षमृक्षणवृत्ति – जेसे व्यापारी लोग कीमती सामान से भरी गाडी मे साधारण सा तेल आदि चिकना पदार्थ डालकर उसे आसानी […] - [जैन दर्शन परिभाषिक शब्दकोष : मुनि श्री क्षमासागर जी](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b6%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%b7/): [dflip id=”45412″ ][/dflip] - [Test Page](https://maitreesandesh.com/test-page-2/) - [New Home Page](https://maitreesandesh.com/new-home-page/) - [Test Page](https://maitreesandesh.com/test-page/): Pages CATEGORIES Archives Recent Comments Blogroll आचार्य श्री विद्यासागर जी गुणस्थान चार्ट मुनि श्री क्षमासागर जी Tag Cloud Maitree Sandesh Log in Entries RSS Comments RSS WordPress.org Recent Posts - [जैन दर्शन परिभाषिक शब्दकोष](https://maitreesandesh.com/jain-darshan/): Pages CATEGORIES 2010 2011 2012 2013 2014 2015 2016 2017 2018 2019 2020 2021 Email News Quotation Story संस्मरण-आचार्य श्री विद्यासागर संस्मरण – अन्य संस्मरण – मुनि श्री क्षमासागर वचनामृत-आचार्य श्री विद्यासागर वचनामृत – मुनि श्री क्षमासागर वचनामृत – अन्य प्रश्न-उत्तर पहला कदम डायरी चिंतन गुरु आध्यात्मिक भजन अगला-कदम मंगल आशीष Archives Blogroll आचार्य श्री विद्यासागर जी गुणस्थान चार्ट मुनि श्री क्षमासागर जी Tag Cloud Recent Posts - [जैन सिद्धांत – पहला कदम](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/): 2010 2011 2012 2013 2014 2015 2016 2017 2018 2019 2020 2021 2022 Pages CATEGORIES मंगल आशीष Archives Blogroll आचार्य श्री विद्यासागर जी गुणस्थान चार्ट मुनि श्री क्षमासागर जी Tag Cloud Recent Posts - [जैन सिद्धांत – अगला कदम](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%85%e0%a4%97%e0%a4%b2-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/): 2010 2011 2012 2013 2014 2015 2016 2017 2018 2019 2020 2021 2022 Pages CATEGORIES मंगल आशीष Archives Blogroll आचार्य श्री विद्यासागर जी गुणस्थान चार्ट मुनि श्री क्षमासागर जी Tag Cloud Recent Posts - [जैन दर्शन परिभाषिक शब्दकोष](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%9c%e0%a5%88%e0%a4%a8-%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6%e0%a4%a8-%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b6%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a4%95-2/): शब्दकोश – मुनि श्री क्षमासागर जी अकाम निर्जरा – अपनी इच्छा के बिना इन्द्रिय-विषयों का त्याग करने पर तथा परवश होकर भोग – उपभोग का निरोध होने पर उसे शान्ति से सह लेना, इससे जो कर्मों की निर्जरा होती है उसे अकाम निर्जरा कहते हैं। अक्षमृक्षणवृत्   –        जैसे व्यापारी लोग कीमती सामान से भरी गाड़ी में साधारण सा तेल आदि चिकना पदार्थ डालकर उसे आसानी से ले जाते हैं इसी प्रकार साधू भी रत्नत्रय से युक्त शरीर रूपी गाड़ी में सरस या नीरस आहार डालकर उसे आसानी से मोक्षमार्ग पर ले जाते है, इसलिये साधु की यह आहरचर्या अक्षमृक्षणवृत्ति कहलाती है। अक्षिप्र […] - [Basics of Jainism (Audio)](https://maitreesandesh.com/basics-of-jainism/): Complete List Of Audios Sr. No Subject Time 1 णमोकार 5:01 2 धर्म क्यों? 1:48 3 देवदर्शन – 3 गुण – देव 1:43 4 रत्नत्रय 2:22 5 धर्म की विशेषतायें 2:44 6 भगवान – नाम/चिन्ह 5:30 7 आवश्यकतायें – 3 1:13 8 सात व्यसन 1:02 9 मेरी भावना 2:25 10 दस धर्म 4:31 11 हिंसा : 4 प्रकार 1:12 12 दिगम्बरत्व 2:43 13 चमडे का त्याग 2:02 14 रेशम त्याग 1:08 15 भ्रुण हत्या 0:59 16 अभक्ष्य 1:51 17 5 पाप 1:26 18 4 पुरुषार्थ 2:46 19 पानी छानना 1:36 20 6 आवश्यक 2:58 21 4 कषाय, 4 प्रकार 1:47 […] - [Photo Gallery](https://maitreesandesh.com/photo-gallery/): मंगल आशीष प. पू. मुनि श्री क्षमासागर जी महाराज प. पू. मुनि श्री योगसागर जी महाराज प. पू. आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज प. पू. मुनि श्री प्रणम्यसागर जी महाराज प. पू. मुनि श्री संभवसागर जी महाराज प. पू. मुनि श्री निश्चलसागर जी महाराज प. पू. आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज Paintings Made By – प्रो. (ड़ा.) जया जैन ( ग्वालियर ) छ: द्रव्य जीव अजीव धर्म अधर्म आकाश काल सात तत्व जीव अजीव आश्रव बंध संवर निर्जरा मोक्ष अनेकांत अनेकांत ध्यान ध्यान भगवान बाहुबली भगवान बाहुबली एकीभाव स्त्रोत एकीभाव स्त्रोत गुरुपास्ति दस धर्म उत्तम शौच उत्तम क्षमा उत्तम मार्दव […] - [About](https://maitreesandesh.com/about/): About Us यह किसी व्यक्ति विशेष का प्रयास नहीं है,मुनि श्री क्षमासागर जी महाराज से जुडे हुये कुछ लोगों  ने मिलकर इसे अपने आत्म कल्याण के लिये शुरू किया है ।इससे दूसरों में भी धर्म प्रभावना हो, ऐसी भावना है । इसका मूल ढ़ांचा जैन धर्म के सिद्धांतों पर आधारित है । इसमें आम बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया गया है । इसमें मुख्य चार भाग हैं –1. General  – सबके समझने योग्य ।2. Basics Of Jainism – इसमें ज्यादातर Audio 2 मिनिट से लेकर 6 मिनिट तक के हैं ।3. जैन सिद्धांत : पहला कदम – जैन सिद्धांत […] - [Home](https://maitreesandesh.com/): Pages CATEGORIES 2010 2011 2012 2013 2014 2015 2016 2017 2018 2019 2020 2021 2022 2023 Email News Quotation Story संस्मरण-आचार्य श्री विद्यासागर संस्मरण – अन्य संस्मरण – मुनि श्री क्षमासागर वचनामृत-आचार्य श्री विद्यासागर वचनामृत – मुनि श्री क्षमासागर वचनामृत – अन्य प्रश्न-उत्तर पहला कदम डायरी चिंतन आध्यात्मिक भजन अगला-कदम Archives Blogroll आचार्य श्री विद्यासागर जी गुणस्थान चार्ट मुनि श्री क्षमासागर जी Tag Cloud Recent Posts - [Sample Page](https://maitreesandesh.com/sample-page/): This is an example page. It’s different from a blog post because it will stay in one place and will show up in your site navigation (in most themes). Most people start with an About page that introduces them to potential site visitors. It might say something like this: Hi there! I’m a bike messenger by day, aspiring actor by night, and this is my website. I live in Los Angeles, have a great dog named Jack, and I like piña coladas. (And gettin’ caught in the rain.) …or something like this: The XYZ Doohickey Company was founded in 1971, […] - [- 2018](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2018-2/): – January – February – March – April – May – June – July – August – September – October – November – December - [- December](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2017-2/december/): Posted by admin on December 29, 2017 at 00:51 AM· अस्नान :- स्नान वे करते हैं जो गंदे होते हैं । मुनि गंदे ही नहीं होते हैं । मुनि श्री सुधासागर जी Posted by admin on December 28, 2017 at 00:49 AM· ज्ञानावरण :- यह आवरण Uniformly पतला या मोटा समझें । ऐसा नहीं कि किसी के कम या छोटे छोटे छेद हों या किसी के में ज्यादा या बड़े बड़े छेद हों । मुनि श्री प्रमाणसागर जी Posted by admin on December 27, 2017 at 00:47 AM· पुण्य :- पुण्य के बिना तो पाप भी नहीं कर सकते हैं […] - [- November](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2017-2/november/): Posted by admin on November 29, 2017 at 00:11 AM· समयसार और गृहस्थ :- समयसार को गृहस्थ के द्वारा पढ़ने में दिक्कत नहीं, पर अपनी आत्मा को वैसा (शुद्ध) मान मत लेना । मुनि श्री सुधासागर जी Posted by admin on November 28, 2017 at 00:15 AM· रौद्र ध्यान :- इसमें 4 पापों को लिया गया है, कुशील को क्यों नहीं ? कुशील, हिंसा और परिग्रह में Cover हो जाता है । Posted by admin on November 27, 2017 at 00:57 AM· बारात/मेहमानों का स्वागत :- इनका स्वागत गंधोदक से करें (दिन में) । Posted by admin on November 25, […] - [- October](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2017-2/october/): Posted by admin on October 31, 2017 at 00:11 AM· सार्थक जीवन :- द्रष्य जीवन को सार्थक बनाने में समग्र जीवन को निरथक बना रहे हैं । Posted by admin on October 28, 2017 at 00:17 AM· विदेह में मिथ्यात्व :- वहाँ द्रव्य-मिथ्यात्व नहीं होता । मुनि श्री निर्वेगसागर जी Posted by admin on October 27, 2017 at 00:40 AM· श्रद्धा :- हमारी श्रद्धा की अद्रढ़ता का मुख्य कारण है – केवलज्ञान के विषयों को मतिश्रुत ज्ञान से समझने/सिद्ध करने का प्रयास । Posted by admin on October 26, 2017 at 00:07 AM· सामायिक :- पुस्तक, प्रकाश आदि के बिना […] - [- September](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2017-2/september/): Posted by admin on September 29, 2017 at 00:05 AM· इंद्रियाँ और सम्यग्दर्शन :- घ्राण इंद्रिय का जुगुत्सा जीतने में / सम्यग्दर्शन में योगदान है, बाकी किसी इंद्रिय का नहीं । मुनि श्री सुधासागर जी Posted by admin on September 28, 2017 at 00:13 AM· ज्ञानावरण के भेद :- मति, श्रुतादि नहीं, ये तो ज्ञान की पर्याय हैं । भेद तो मतिज्ञानावरण आदि होंगे । बाई जी Posted by admin on September 27, 2017 at 00:16 AM· प्रमत्त / ध्यान :- प्रमत्त – परवस्तु के ग्रहण का भाव, परवस्तु पर ध्यान तो अप्रमत्त अवस्था में भी लगाया जाता है । […] - [- August](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2017-2/august/): Posted by admin on August 31, 2017 at 00:42 AM· कुगुरु :- कैंचुली (बाह्य) तो छोड़ देते हैं पर विषदंत (अंतरंग) नहीं । Posted by admin on August 29, 2017 at 00:47 AM· धर्म और भगवान :- भगवान धर्म नहीं बनाते, बल्कि धर्म भगवान बनाता है । Posted by admin on August 28, 2017 at 00:28 AM· प्रतिमा के कल्याणक :- प्रतिमाओं के 4 कल्याणक ही होते हैं । इसिलिये प्रशस्ति पर ज्ञान कल्याणक की तिथि लिखी जाती है । पं. रतनलाल बैनाड़ा जी Posted by admin on August 26, 2017 at 00:18 AM· अशोक वृक्ष :- समवसरण में अशोक […] - [- July](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2017-2/july/): Posted by admin on July 30, 2017 at 00:11 AM· व्यसन :- निंदा आठवाँ व्यसन है । Posted by admin on July 28, 2017 at 00:35 AM· पाक्षिक श्रावक :- जो अष्टमूल गुणों के पक्ष में रहे । Posted by admin on July 27, 2017 at 00:14 AM· वर्तमान का संहनन :- वर्तमान में यदि कोई श्रेणिक जैसा पश्चाताप करे तो पागल हो जाये । Posted by admin on July 26, 2017 at 00:47 AM· प्रतिक्रमण :- किसी भी मत के प्रतिक्रमण में “पुण्य मिथ्या हो” नहीं कहा है । Posted by admin on July 25, 2017 at 00:19 AM· […] - [- June](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2017-2/june/): Posted by admin on June 29, 2017 at 00:45 AM· अशोक वृक्ष :- भगवान को केवलज्ञान जिस वृक्ष के नीचे होता है, वह अलग अलग नाम के होते हैं जैसे आम आदि । समवसरण में भगवान जिस वृक्ष के नीचे बैठते हैं वह देवों के द्वारा निर्मित (पृथ्वीकायिक) वही वृक्ष का नमूना बनाया जाता है जिसके नीचे भगवान को केवलज्ञान प्राप्त हुआ था । अब उसे अशोक वृक्ष कहते हैं । इस तरह अलग अलग भगवानों के अशोक वृक्ष अलग अलग होते हैं (चाहे समवसरण का आकार एक सा हो) । Posted by admin on June 28, 2017 at 00:38 […] - [- May](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2017-2/may/): Posted by admin on May 31, 2017 at 00:17 AM· सूतक :- हमको सूतक जैसे पीढ़ीयाँ ज्यादा होने पर, कम दिनों का लगता है ऐसे ही हमारे पिता/दादा भी अपनी अपनी पीढ़ीयों की दूरी के अनुसार सूतक मानेंगे । Posted by admin on May 29, 2017 at 00:06 AM· निगोदिया की आयु :- “एक सांस में 18 बार” । सांस का मतलब हृदय की धड़कन लेना है तथा यह लब्धि – अपर्याप्तक की होती है (पर्याप्तक की अंतर महुर्त) । Posted by admin on May 27, 2017 at 00:17 AM· निर्जरा :- 2 प्रकार – सकाम निर्जरा – स्वीकृति पूर्वक, […] - [- April](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2017-2/april/): Posted by admin on April 28, 2017 at 00:02 AM· अग्निकायिक जीव :- क्या प्रासुक जल में गर्मी अग्निकायिक जीवों के कारण रहती है ? यदि उसमें जीव रहे तो वह जल प्रासुक कैसे रहेगा ? अग्निकायिक बादर जीव तो अग्नि के आश्रित ही रहते हैं, सूक्ष्म जीव तो हर जगह पाये जाते हैं । गर्मी अग्नि के सानिध्य के कारण रहती है । पं. रतनलाल बैनाड़ा जी Posted by admin on April 27, 2017 at 00:22 AM· ध्यान :- आर्त/रौद्र – निमित्तों का ध्यान, धर्म – कर्म सिद्धांतों का ध्यान । ध्यान की विधि से बंधी कोई विधि नहीं […] - [- March](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2017-2/march/): Posted by admin on March 31, 2017 at 00:17 AM· वर्गणा :- मनोवर्गणा, भाषा वर्गणा बन सकतीं हैं । पाठशाला Posted by admin on March 29, 2017 at 00:10 AM· काल :- कहते हैं “समय पीछे नहीं जाता” । सही तो है – काल द्रव्य का पीछे जाना यानि स्वभाव से विपरीत यानि विभाव/अशुद्धि । पर काल द्रव्य तो शुद्ध द्रव्य है और कभी अशुद्ध नहीं होता । चिंतन Posted by admin on March 28, 2017 at 00:15 AM· पंचकल्याणक के पात्र :- पंचकल्याणक के पात्र के सौधर्म इंद्र व्रतीयों को नहीं बनना चहिये क्योंकि इनका गुणस्थान 5 वाँ होता […] - [- February](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2017-2/february/): Posted by admin on February 28, 2017 at 12:25 PM· अष्टमी / चौदस :- धर्म में चारित्र का सबसे बड़ा महत्त्व है । अष्टमी – अष्टकर्मों का नाश, प्रथम चरण में अष्टमूल गुणों के पालन से । चौहदवें गुणस्थान की प्राप्ति तक की यात्रा, चौदश पर्व से । प्रशनोत्तर संग्रह पेज – 176 Posted by admin on February 27, 2017 at 01:53 AM· विवाह :- विवाह में, भाग्य और पुरूषार्थ के अलावा आजकल नोकर्म (जो कर्मों की उदीरणा में कारण हैं) भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने लगा है । (शारीरिक आकर्षण) Posted by admin on February 25, 2017 at 00:2 AM· […] - [- January](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2017-2/january/): Posted by admin on January 31, 2017 at 00:15 AM· दान-तीर्थ :- राजा श्रेयांस के द्वारा, आदिनाथ भगवान को प्रथम आहार देने को दान-तीर्थ क्यों कहा है ? दान तो करुणा आदि भी होते हैं, पर सुपात्र का दान मोक्ष का हेतु होता है, यानि संसार से पार लगाने वाला । चिंतन Posted by admin on January 28, 2017 at 00:47 AM· मति-श्रुत ज्ञान :- करणेंद्रिय से श्रवण किये गये शब्दों का ज्ञान, मतिज्ञान है, इस ज्ञान पर विचार, श्रुतज्ञान । तत्त्वार्थसूत्र टीका – 127 Posted by admin on January 27, 2017 at 11:47 AM· अभक्ष्य :- अभक्ष्य वो जो […] - [- 2017](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2017-2/): – January – February – March – April – May – June – July – August – September – October – November – December - [- December](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2016-2/december/): Posted by admin on December 31, 2016 at 00:05 AM· तिर्यंचों के व्रत :- तिर्यंचों के व्रत तो होते हैं पर प्रतिमाऐं नहीं मानी जाती, क्योंकि वे विधि पूर्वक प्रतिमाओं का पालन नहीं कर पाते । पाठशाला Posted by admin on December 29, 2016 at 01:45 AM· कषाय :- मंद कषाय से पुण्य, तीव्र से पाप लहता है, जैसे मं अग्नि से दूध में मलाई/घी पड़ती है, तीव्र से उबाल आकर बर्बाद हो जाता है । Posted by admin on December 28, 2016 at 02:00 AM· प्रायश्चित :- नियमों के प्रायश्चित स्वयं, भगवान के समक्ष ले सकते हैं, पर यम […] - [- November](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2016-2/november/): Posted by admin on November 29, 2016 at 1:25 AM· व्रत और संवर :- व्रत प्रवृत्तियात्मक होते हुये भी क्योंकि सावधानी पूर्वक किये जाते हैं इसलिये संवर में कारण होते हैं । पाठशाला Posted by admin on November 28, 2016 at 10:55 AM· पुण्य :- श्रद्धा की अपेक्षा – हेय है, ज्ञान में – ज्ञेय है, चारित्र में – उपादेय है । पाठशाला Posted by admin on November 26, 2016 at 10:12 AM· समय की इकाई :- मिनिट/घंटे के व्यवहार से पहले – 60 घड़ी का एक दिन = 8 पहर का व्यवहार होता था । विदेह क्षेत्र में आज […] - [- October](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2016-2/20320-2/): Posted by admin on October 29, 2016 at 04:15 AM· एकत्व :- पैन्सिल पतली सो अच्छी मानी जाती है । Posted by admin on October 28, 2016 at 10:50 AM· नाटक :- पंचपरमेष्ठी को नाटक के पात्र में नहीं दिखाना चाहिये । वे तो संसार के नाटक को समाप्त करने वाले होते हैं । Posted by admin on October 27, 2016 at 11:14 AM· मूर्ति पत्थर की क्यों ? भगवान हमारे हित/अहित के प्रति पत्थर जैसे हैं । चिंतन Posted by admin on October 26, 2016 at 12:54 AM· अस्थिरता :- इधर रहकर उधर का ध्यान करोगे, तो इधर का […] - [- September](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2016-2/september/): Posted by admin on September 29, 2016 at 02:14 AM· जन/जिन :- जन वैभव को सिर पर बैठाते हैं, जिन वैभव के सिर पर बैठते हैं । Posted by admin on September 28, 2016 at 11:15 AM· आहार की बेला :- सूर्योदय से 3 घड़ी बाद से सूर्यास्त के 3 घड़ी पहले तक । सुबह पूजा के बाद या सामायिक के बाद । पाठशाला Posted by admin on September 27, 2016 at 11:08 AM· आकिंचन्य :- त्याग के त्याग का नाम भी आकिंचन्य है । Posted by admin on September 26, 2016 at 11:15 AM· सम्यग्दृष्टि की पहचान :- जो […] - [- August](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2016-2/august/): Posted by admin on August 31, 2016 at 11:41 AM· भाषा :- महाभाषाओं में प्राकृत, संस्कृत आती हैं, हिंदी लघुभाषा में । Posted by admin on August 29, 2016 at 10:28 AM· कायोत्सर्ग :- हर क्रिया के बाद कायोत्सर्ग क्यों ? हर क्रिया में दोष तो लगता है, उसके निवारण हेतु । हर क्रिया के लाभ को Absorb करने के लिये जैसे योगा के बाद शवासन । Posted by admin on August 27, 2016 at 08:12 AM· अनेकांत :- शास्त्रों में कई विषयों पर आचार्यों के अलग अलग मत हैं पर मौलिक सिद्धांतों पर उनके मतभेद नहीं हैं, जैसे 7 […] - [- July](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2016-2/july/): Posted by admin on July 29, 2016 at 11:54 pm· गोत्र :- आचार्य ज्ञान सागर जी (आचार्य श्री जी के गुरू) के अनुसार चौथे काल में नीच गोत्र, उच्च में बदल भी जाता था और वे मोक्ष भी प्राप्त कर लेते थे । पं. रतनलाल बैनाडा जी Posted by admin on July 28, 2016 at 08:28 am· खाना / भोजन / आहार :- खाना सामान्यजन खाते हैं, भोजन व्रतियों को कराते हैं, आहार मुनि लेते हैं । Posted by admin on July 27, 2016 at 11:24 pm· ज्ञान/दर्शन :- ज्ञान साकार, विशेष, भेद वाला, दर्शन निराकार, सामान्य, भेद रहित होता […] - [- June](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2016-2/june/): Posted by admin on June 29, 2016 at 10:59 am ज्ञान :- मति, श्रुत – अधूरे व अस्पष्ट अवधि, मन:पर्यय – अधूरे व स्पष्ट केवलज्ञान – पूरा व स्पष्ट पाठशाला Posted by admin on June 28, 2016 at 10:48 am सम्यग्ज्ञान :- सम्यग्दृष्टि यदि रस्सी को साँप जान रहा है, तो भी उसका सम्यग्दर्शन खंड़ित नहीं होगा, क्योंकि यह अप्रयोजनभूत ज्ञान है । पाठशाला Posted by admin on June 27, 2016 at 03:58 pm पंचपरावर्तन :- द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव, भाव में सबसे छोटा द्रव्य, सबसे बड़ा भाव होता है । Posted by admin on June 25, 2016 at 03:56 […] - [- May](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2016-2/may/): Posted by admin on May 31, 2016 at 01:27 pm संवेग :- भीति, प्रीति, प्रतीति, परणति से ही संवेग गुण हमारे जीवन में घटित होता है । Posted by admin on May 28, 2016 at 05:38 pm फ़ुर्सत :- आदमी को मरने की फ़ुर्सत नहीं, निगोदिया को मरने से फ़ुर्सत नहीं । (धर्मेंद्र) Posted by admin on May 25, 2016 at 05:38 pm मूर्ति :- पाषाण, धातु आदि चिर-स्थायी Material की बनाते हैं । Posted by admin on May 24, 2016 at 05:30 pm शासन-काल :- भगवान महावीर की दिव्यध्वनि खिरने तक वे गृहस्थ अवस्था में, भगवान पार्श्वनाथ के शासन काल […] - [- April](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2016-2/april/): Posted by admin on April 29, 2016 at 05:25 pm धर्म और विज्ञान :- विज्ञान प्रयोगों से, जो बदलता रहता है । Posted by admin on April 28, 2016 at 05:13 pm जन्म दिवस :- ज़्यादातर तीर्थंकरों का तप/ मोक्ष जन्म दिवस पर हुआ। अपन भी अपने जन्म दिवस को ऐसे ही सार्थक बनाऐं। Posted by admin on April 27, 2016 at 02:11 pm अदरक / आलू :- अदरक साबुत ही सूखकर काष्ठ/सौंठ बन जाता है, साबुत आलू सूखता नहीं, सड़ जाता है । Posted by admin on April 26, 2016 at 02:10 pm मति / श्रुत :- सब जीवों […] - [- March](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2016-2/march/): Posted by admin on March 31, 2016 at 03:23 pm निमित्त :- सिद्ध भी निमित्त (धर्म द्रव्य) के अधीन रहते हैं ! तो हमारी क्या विसात है !! निर्यापक मुनि श्री वीरसागर जी Posted by admin on March 29, 2016 at 05:22 pm देवपूजा :- 6 आवश्यकों में देवदर्शन नहीं, देवपूजा को लिया है, देवदर्शन तो जानवरों के लिये आवश्यक है । मुनि श्री धवलसागर जी Posted by admin on March 28, 2016 at 05:08 pm चारित्र :- अशुभ क्रियाओं से निवृति । पाठशाला Posted by admin on March 26, 2016 at 05:31 pm भूल :- सबसे बड़ी भूल विभाव […] - [- February](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2016-2/february/): Posted by admin on February 29, 2016 at 01:57 pm देवदर्शन :- इससे दो लाभ और भी हैं – 1. गुरुओं का सानिध्य मिलता है । 2. समाज धर्मात्मा मानकर इज्जत देती है । श्री रिंकू – शिवपुरी Posted by admin on February 27, 2016 at 01:52 pm आइरियाणं :- आइरियाणं – ये सही है । “र” पर बड़ी “री” अशुद्ध (व्याकरण से) । “इ” की जगह “य” से स्वर/व्यंजन में अंतर आ जाता है, हालाँकि अर्थ तीनों का सही है । Posted by admin on February 26, 2016 at 01:56 pm गुरुत्वाकर्षण :- सिद्ध नीचे नहीं आते क्योंकि आकर्षण […] - [- January](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2016-2/january/): Posted by admin on January 29, 2016 at 02:57 pm सम्यग्दर्शन और मोक्ष :- सम्यग्दर्शन के 33% नंबर हैं, यानि पास या एक तिहाई । मोक्ष के लिये 100% लाने होंगे । बाकि 67% चारित्र में score करने होंगे । चिंतन Posted by admin on January 28, 2016 at 04:51 pm आचार्य समंतभद्र स्वामी :- पुराने आचार्यों ने इनके तीर्थंकर प्रकृति बंध नहीं कहा है । पर कुछ नये आचार्य और विद्वान मानते हैं । पाठशाला Posted by admin on January 27, 2016 at 04:49 pm अरिहंत / व्रती :- अरिहंत भगवान प्रवृत्ति/निवृत्ति तो बुद्दिपूर्वक करते नहीं, तो क्या महाव्रती हैं […] - [- 2016](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2016-2/): – January – February – March – April – May – June – July – August – September – October – November – December - [- December](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2015-2/december/): Posted by admin on December 31,2015 at 4:13 pm 31 दिसम्बर:- क्या करें 31 दिसम्बर को ? 3+1=4 गतियों में भटक रहे हैं, तो क्या इसके लिये जश्न मनायें !! या एकत्व भाव का चिंतन करते हुए 1 जनवरी में प्रवेश करें !!! Posted by admin on December 29, 2015 at 03:12 pm सल्लेखना :- मुनि के श्वासोच्छ्वास रोककर मरण करने को सल्लेखना कहेंगे ? भोजन भोग है, पर श्वासोच्छ्वास भोग नहीं, इसलिये इसका त्याग करके मरण को पंड़ित मरण नहीं कह सकते हैं । प्रश्नोत्तर सं. – 2/67 Posted by admin on December 28, 2015 at 03:09 pm भरतेश […] - [- November](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2015-2/november/): Posted by admin on November 29, 2015 at 2:21 pm भेद विज्ञान :- मैं आत्मा हूँ, इसका सम्बंध मेरे शरीर से नहीं , तो सम्बंधियों के शरीर से कैसे हो सकता है ? चिंतन Posted by admin on November 28, 2015 at 2:16 pm व्रत/नियम/संयम :- व्रत यानि पापों में Break, नियम – व्रत कुछ समय के लिये, Side Mirror संयम – सावधानी से कार चलाना Posted by admin on November 27, 2015 at 12:35 pm विक्रिया:- :- अनेक शरीर धारण करने पर भी कर्मबंध एक शरीर के बराबर ही बंधेगा, क्योंकि उपयोग तो एक ही रहेगा । मुनि श्री कुंथुसागर […] - [- October](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2015-2/october/): Posted by admin on October 31, 2015 at 10:07 am अनिवृतिकरण :- अ = नहीं; निवृति = भेद; करण = परिणाम; पाठशाला Posted by admin on October 29, 2015 at 10:45 am गोत्र :- सोने/चांदी के बर्तन को चमकाओ तो चमचमा जाते हैं, लोहे/मिट्टी के ? चिंतन Posted by admin on October 28, 2015 at 10:35 am जिनवाणी :- तत्वार्थ सूत्र तो जिनवाणी अंश है, पूजाऐं जिनवाणी में नहीं आतीं । Posted by admin on October 27, 2015 at 10:30 am मुनि चर्या :- Magnifying glass से चर्या ना देखें. पर Naked eye से जरूर देखें । Posted by admin […] - [- September](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2015-2/september/): Posted by admin on September 29, 2015 at 12:47 pm निश्चय सम्यग्दर्शन :- अनुभूति पूर्वक सम्यग्दर्शन । Posted by admin on September 28, 2015 at 12:45 pm बालब्रम्हचारी साधक :- कोरी सिलेट पर अक्षर अधिक स्पष्ट उभरते हैं । Posted by admin on September 26, 2015 at 12:43 pm उदय :- 2 तरह का होता है : फलोदय – फल देकर नष्ट प्रदेषोदय – बिना फल दिये, (तप से) नष्ट Posted by admin on September 25, 2015 at 12:38 pm उच्च गोत्र :- इसे प्राप्त करने के लिये उच्च कुलाचार का पालन करना होता है । Posted by admin on […] - [- August](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2015-2/august/): Posted by admin on August 29, 2015 at 11:47 AM · पूजा :- रागी की पूजा से कंधों का बोझ कम हो जाता है, वीतरागी की पूजा से कंधे बोझ उठाने लायक हो जाते हैं । Posted by admin on August 28, 2015 at 11:45 AM · भवनत्रिक देव :- ये देव अपने से कमजोर देवों की देवियाँ/वैभव आदि छीन भी लेते हैं । पं रतनलाल बैनाड़ा जी Posted by admin on August 27, 2015 at 11:43 AM · चंदोबा :- आचार्य श्री धर्मसागर जी महाराज ( आचार्य श्री शांतिसागर जी के शिष्य) के अभिनंदन ग्रंथ में लिखा है – […] - [- July](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2015-2/july/): Posted by admin on July 31, 2015 at 02:51 PM · तीर्थंकरों के चारित्र :- भगवान के सम्यक्चारित्र 8 वर्ष होने पर नहीं, मुनि बनने पर ही होता है, तभी तो रत्नत्रय धारण कर पायेंगे । पं. रतनलाल बैनाड़ा जी Posted by admin on July 29, 2015 at 12:30 PM · श्वोसोच्छवास :- बिना नाक वालों के भी होता है (रोमों से) । मुनि श्री कुंथुसागर जी Posted by admin on July 28, 2015 at 02:39 PM · तीर्थंकर के अवधिज्ञान :- तीर्थंकर चाहे नरक से आयें, अवधिज्ञान लेकर ही आते हैं । Posted by admin on July 27, 2015 […] - [- June](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2015-2/june/): Posted by admin on June 29, 2015 at 11:27 PM · आकिंचन्य :- ना कोई जरूरत, ना कोई आवश्यकता । (श्रीमति नेहा) Posted by admin on June 27, 2015 at 11:06 PM · गणधर :- सारे गणधर मोक्ष जाते हैं । आचार्य श्री का भी यही मत है । पं. रतनलाल बैनाड़ा जी Posted by admin on June 26, 2015 at 03:32 PM · सोला :- सोला के कपड़ों में दूसरों को न छूने का नियम तो लो, पर दूसरे आपको छू लें तो दोष उनको पड़ेगा, आप अपने भाव क्यों खराब करें !! Posted by admin on June 25, […] - [- May](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2015-2/16562-2/): Posted by admin on May 29, 2015 at 00:09 AM · मुंड़न :- आदिपुराण – गंधोदक सिर पर लगाकर, मुंड़न के बाद पूजा के बचे द्रव्य सिर पर ड़ालें । साधूओं का आशीर्वाद लें । मुनि श्री प्रमाणसागर जी Posted by admin on May 28, 2015 at 03:09 PM · उत्तम तप :- तप तो खुद ही उत्तम है, फिर इसके साथ उत्तम क्यों लगाया ?? निर्जरा कि अपेक्षा से, महाव्रतियों के तप को उत्तम कहा है । आचार्य श्री विद्यासागर जी Posted by admin on May 27, 2015 at 03:01 PM · उपसर्ग :- उपसर्ग प्राय: व्यंतर देव ही […] - [- April](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2015-2/april/): Posted by admin on April 29, 2015 at 02:49 PM · नियम :- वसुनंदी श्रावकाचार तथा भगवती आराधना के अनुसार यम (मरण पर्यंत) नियम लेने वाला 5 गुणस्थान प्राप्त कर सकता है । मुनि श्री सुधासागर जी Posted by admin on April 28, 2015 at 03:40 PM · सिद्धांत ग्रंथ :- श्रावकों के द्वारा सिद्धांत ग्रंथ पढ़ना ऐसा ही है जैसे दूध के दातों से लोहे के चने चबाना । मुनि श्री कुंथुसागर जी Posted by admin on April 27, 2015 at 03:29 PM · अंतराय :- गलत उपयोग (अभिप्राय) के साथ भी यदि कोई सही योग कर रहा हो […] - [- March](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2015-2/march/): Posted by admin on March 31, 2015 at 03:33 PM · यश नामकर्म :- जिसके उदय से पुण्य गुण जगत में प्रकट हो । कर्मकांड़ – 22 Posted by admin on March 29, 2015 at 03:29 PM · विसंयोजना :- तीर्थ यात्रा पर जाते समय भारी भारी सामान छोड़ गये/हलका हल्का ले गये । घर/संसार में लौटने पर भारी भारी सामान को ग्रहण कर लिया । पं. रतनलाल बैनाड़ा जी Posted by admin on March 28, 2015 at 12:56 PM · मूलनायक :- जैनबद्री (श्रवणबेलगोला) में मूलनायक कौन ? बाहुबली नहीं, नेमीनाथ भगवान । इनकी छोटी सी प्रतिमा रखी है, […] - [- February](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2015-2/february/): Posted by admin on February 28, 2015 at 12:55 PM · अनुबंध और व्रत :- देवायु बंध को छोड़कर बाकी तीनों के बंध होने पर देश/सकल व्रत तो नहीं ले सकते, पर नियम ले सकते हैं । मुनि श्री कुंथुसागर जी Posted by admin on February 26, 2015 at 00:24 AM · दु:खी :- एक अपेक्षा से (बाहर से )दु:खी सम्यग्दृष्टि ही,( बाहर से) सुखी मिथ्यादृष्टि । अंतरंग में उल्टा। मुनि श्री कुंथुसागर जी Posted by admin on February 24, 2015 at 09:24 AM · वर्गणायें :- अकर्म वर्गणायें रागद्वेष तथा योग से कर्म वर्गणाओं में प्रवेश कर जाती हैं […] - [- January](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2015-2/january/): Posted by admin on January 31, 2015 at 02:28 PM · निगोदिया :- (नि) नियम से गोद लेने वाला ही निगोदिया । (गोद लेते हैं अपने ही कुल वालों को) मुनि श्री कुन्थुसागर जी Posted by admin on January 28, 2015 at 02:55 PM · तीर्थंकर प्रकृति :- इसके बंध के साथ साथ पाप प्रकृतियों का भी बंध होता है । पर उदय से पहले वे पाप प्रकृतियाँ (घातिया) क्षय हो जाती हैं । चिंतन Posted by admin on January 26, 2015 at 02:53 PM · मोह/राग :- राग – वस्तु से आकर्षण मोह – वस्तु स्वरूप की भूल (विपरीत) […] - [- 2015](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2015-2/): – January – February – March – April – May – June – July – August – September – October – November – December - [- December](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2014-2/december/): Posted by admin on December 28, 2014 at 01:19 PM · गाय का दूध :- बच्चा होने के 5 से 7 दिन तक दूध नहीं पीना चाहिये, पर व्रती 10 दिन तक नहीं लेते हैं । पं. रतनलाल बैनाड़ा जी Posted by admin on December 26, 2014 at 01:07 AM · नोकर्म :- जो अपने से अलग है और सुख दु:ख में निमित्त है जैसे शरीर, गाली आदि । मुनि श्री सुधासागर जी Posted by admin on December 24, 2014 at 05:34 AM · केशलोंच :- आदिनाथ भगवान ने 1000 साल तक तपस्या की पर बालों में जीवराशी पैदा नहीं हुई, […] - [- November](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2014-2/november/): Posted by admin on November 29, 2014 at 02:20 PM · दिगम्बर :- सांप के कैंचुली उतारने से उसका विष कम नहीं हो जाता । अंतरंग विशुद्धता से दिगम्बरत्ब आता है । मुनि श्री विश्रुतसागर जी Posted by admin on November 27, 2014 at 02:17 PM · सल्लेखना :- शल्य को खाना सल्लेखना है । श्री सुभाष – चिंतन Posted by admin on November 25, 2014 at 02: 07 PM · अयश :- यदि अयश का उदय चल रहा है तो व्रत ले लो, अयश समाप्त हो जायेगा (इसका उदय चौथे गुणस्थान तक ही रहता है) । आचार्य श्री विद्यासागर […] - [- October](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2014-2/october/): Posted by admin on October 31, 2014 at 04:15PM · सम्यग्दृष्टि :- जो वैभव बढ़ने पर दु:खी होता हो, जो पुण्य के फल को नहीं, पुण्य को महत्व देता हो, जिसको नोट गिनने में जम्हायी आती हो । मुनि श्री सुधासागर जी Posted by admin on October 28, 2014 at 04:13 PM · धर्मप्रभावना :- मुनियों कि चर्या से ही धर्म की प्रभावना नहीं होती बल्कि क्रियाओं से भी होती है, जैसे शास्त्रों की रचना, आ. नेमिचंद्र जी के सानिध्य में श्रवणबेलगोला का निर्माण । मुनि श्री प्रमाणसागर जी Posted by admin on October 26, 2014 at 03:15 PM · निद्रा […] - [- September](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2014-2/september/): Posted by admin on September 28, 2014 at 04:48 PM · अन्यत्व/एकत्व :- इन भावनाओं को ऐसे भी भा सकते हैं – अन्यों ने अनादि से मेरा नुकसान ही किया है, इस नुकसान से/इनसे बचने का एक ही तरीका है – एकत्व भाव । चिंतन Posted by admin on September 25, 2014 at 04:46 PM · मायाचारी :- थोड़ी मायाचारी से स्त्री पर्याय, तथा बहुत मायाचारी से तिर्यंच पर्याय मिलती है । बाई जी Posted by admin on September 22, 2014 at 03:45 PM · शुक्ल व कृष्ण :- माह में दो पक्ष होते हैं – शुक्ल व कृष्ण । […] - [- August](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2014-2/august/): Posted by admin on August 31, 2014 at 01:54 PM · उत्तम मार्दव धर्म :- मार्दव धर्म निम्न रूपों में आता है । अहंकार तिरस्कार ईर्षा भाव के रूप में क्या मान करना स्वाभाविक नहीं है ? नहीं, अज्ञानता का परिणाम है । मान करने से नीच गोत्र का बंध होता है, अपनी प्रशंसा, दूसरों की निंदा करना भी मान का ही रूप है । मान को अपने जीवन से हटाने के लिये दूसरों के गुणों की प्रशंसा करें, अपने दोषों को देखें, सोचें की आत्मा के अनंत गुण हैं, मुझमें अगर थोड़े से गुण आ गये तो मैं इसमें इतरा क्यों रहा हूँ । […] - [- July](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2014-2/july/): Posted by admin on July 31, 2014 at 12:54 PM · स्व/परद्रव्य :- परमार्थ में तो परद्रव्य भोगने का निषेध है ही, संसार में भी परद्रव्य भोगने वाले को व्यभिचारी कहते हैं । ब्र. नीलेश भैया Posted by admin on July 28, 2014 at 02:02 PM · साता / असाता :- साता में सावधानी, असाता में समता । मुनि श्री मंगलानंद जी Posted by admin on July 26, 2014 at 12:53 PM · पंडित :- मुनि ही पंडित होते हैं, तभी तो पंडित-मरण मुनि के बताया है, इनसे कम के नहीं, चाहे वह कितना भी बड़ा पंडित (विद्वान) क्यों ना […] - [- June](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2014-2/june/): Posted by admin on June 30, 2014 at 04:11 PM · जानकार :- हमारे पाप/पुण्य को जानने वाले तीन हैं – केवली भगवान मैं कर्म वर्गणाऐं मुनि श्री विश्रुतसागर जी Posted by admin on June 27, 2014 at 04:09 PM · पंड़ित :- पंड़ित मरण किसका ? दिगम्बर मुनि का । तो पंड़ित कौन हुआ ? दिगम्बर मुनि । मुनि श्री सुधासागर जी Posted by admin on June 25, 2014 at 02:47 PM · वैरागी :- जम्बूस्वामी घर में रहकर/कामदेव होकर भी वैरागी थे, भरत चक्रवर्ती का ध्यान हमेशा वैराग्य पर रहता था । चिंतन Posted by admin on June 23, […] - [- May](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2014-2/may/): Posted by admin on May 30, 2014 at 12:10 PM · इंद्रिय विजय :- वीतराग धर्म में इंद्रिय-दमन नहीं बताया, इंद्रिय-निरोध कहा है यानि विकारों को पनपने ही नहीं देना(जैसे दमन = गंदगी होने पर दवा छिड़क कर कीटाणुओं मारना; निरोध = सफाई रखकर कीटाणुओं को उत्पन्न ही न होने देना) यह संभव होगा शुद्ध तथा अल्प भोजन, अनुकूल वातावरण, तप परिषहजय आदि से । चातुर्मास में विहार नहीं होते, इसीलिये उपवास/नीरस भोजन तप बढ़ा देते हैं । मुनि श्री निर्भयसागर जी Posted by admin on May 28, 2014 at 12:05 PM · दु:पक्वाहार :- कम या ज्यादा पके भोजन […] - [- April](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2014-2/april/): Posted by admin on April 30, 2014 at 04:26 PM · धर्म :- अधर्म का अभाव ही धर्म है । धर्माचरण धर्म के उद्घाटन के लिये/आंतरिक शुद्धि के लिये होता है। मुनि श्री प्रमाणसागर जी Posted by admin on April 28, 2014 at 04:25 PM · गोत्रबंध :- पाप से घ्रणा करने से उच्च गोत्र का बंध, पापी से घ्रणा करने से नीच गोत्र का बंध होता है । बाई जी Posted by admin on April 25, 2014 at 03:58 PM · चारित्र :- कषायों की मंदता का नाम ही चारित्र है । Posted by admin on April 24, 2014 […] - [- March](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2014-2/march/): Posted by admin on March 04, 2014 at 04:19 PM · परिमाण :- जैसे परिग्रह का परिमाण करते हैं ऐसे ही कष्टों के सहने का परिमाण क्यों नहीं लेते ? इस सीमा तक सहुंगा, उसके आगे उपचार करूँगा । थोड़े कर्म भी कटेंगे तथा सहने की सामर्थ भी बढ़ेगी । श्री लालमणी भाई Posted by admin on March 01, 2014 at 04:33 PM · अष्ट द्रव्यों से पूजा :- अष्ट द्रव्यों से पूजा तो रोज करते हो, पर अष्टांग (सम्यग्दर्शन के) सजे है या नहीं ? वरना अष्टम भूमि (मोक्ष) कैसे मिलेगी ?? (शशि) - [- February](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2014-2/february/): Posted by admin on February 28, 2014 at 02:33 PM · असंख्यात :- जो किसी के द्वारा गिने नहीं जा सकते । (अवधि/मन:पर्यय ज्ञानी असंख्यात को जानते तो हैं पर गिन नहीं सकते, साधारण तो संख्यात की बड़ी संख्या भी नहीं गिन सकते) पं.रतनलाल बैनाड़ा जी Posted by admin on February 25, 2014 at 02:22 PM · इंद्रियों का विषय :- शब्द पौदगलिक है तो उसमें चारों गुण होंगे, फिर उनका रूप चक्षु इंद्रिय को दिखायी क्यों नहीं देता ? शब्द वर्गणाओं में रूप तो है पर सूक्ष्म होने से दिखायी नहीं देता। श्री राजवार्तिक – 17 Posted by admin […] - [- January](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2014-2/january/): Posted by admin on January 31, 2014 at 04:30 PM · तत्व :- 7 तत्वों में – जीव, अजीव – ज्ञेय* हैं, आश्रव, बंध – हेय, संवर, निर्जरा – उपादेय, और मोक्ष – ध्येय है। * न ये हेय हैं, न उपादेय और ना ही ध्येय। पाठशाला Posted by admin on January 28, 2014 at 04:14 PM · अविकृति-आहार :- बेरस आहार को अविकृति-आहार कहते हैं । श्री रत्न्त्रय – 3 (रसीला आहार तो मन/इंद्रियों में विकृति पैदा करेगा ही, इसीलिये धर्म में सादा आहार/उपवास को बहुत महत्व दिया है) Posted by admin on January 24, 2014 at 04:26 PM […] - [- 2014](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2014-2/): – January – February – March – April – May – June – July – August – September – October – November – December - [- December](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2013-2/december/): Posted by admin on December 31, 2013 at 04:45 PM · प्रवचन :- प्रवचन पर वचन हैं । पर के लिये हैं । Posted by admin on December 27, 2013 at 04:00 PM · अमूढ़ :- मूढ़ जिसे अपने हित का ज्ञान नहीं, मूर्ख नहीं, पढ़ा लिखा भी मूढ़ हो सकता है । आध्यात्मिक मूढ़ – पर में लीन । मुनि श्री प्रमाणसागर जी Posted by admin on December 25, 2013 at 03:57 PM · आश्रव/संवर/निर्जरा :- कमरे में अधिकारी के आ जाने पर(1), कर्मचारी बाहर निकल जाते हैं (2), नये आते नहीं हैं (3)। 1. शुभकर्म/ध्यान 2. निर्जरा 3. […] - [- November](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2013-2/november/): Posted by admin on November 29, 2013 at 04:00 PM · तीर्थंकर का मुनि साक्षात्कार :- तीर्थंकर का मुनियों से साक्षात्कार नहीं होता । क्योंकि होने पर तीर्थंकर वंदना नहीं करेंगे तब धर्म की कुप्रभावना होगी । पं. रतनलाल बैनाडा जी Posted by admin on November 22, 2013 at 05:40 PM · अरहंतों की क्षमता :- जब भगवान के दानांतराय कर्म का क्षय पूरी तरह से हो जाता है, तो भी बहुत से जीवों को वे अपनी बात समझा क्यों नहीं पाते ? उन जीवों के लाभान्तराय कर्मों के तीव्र उदय के कारण । तत्वार्थसूत्र मंजूषा – 1/218 Posted by […] - [- October](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2013-2/october/): Posted by admin on October 31, 2013 at 06:20 PM · संतोष/समता :- संतोष ग्रहस्थों के लिये, समता मुनिराजों के लिये है । संतोष यानि थोड़े में संतुष्ट, समता यानि थोड़े से भी असंतुष्ट, शून्य में संतुष्ट, अपकार करने वाले को भी आशीर्वाद । चिंतन Posted by admin on October 28, 2013 at 05:45 PM · कर्म बंध :- पटाखे फोड़ने से आठ कर्मो का बन्धन होता है ..! ज्ञानावर्णीय कर्म- कागज के जलना,पैर के नीचे आने से ! दर्शनावर्णीय कर्म- जीवों की हिंसा, अंगोपांग छेदने से! वेदनीय कर्म- जीवो को भय लगने,वेदना होने से ! मोहनीय कर्म- पटाखे फोड़ने से […] - [- September](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2013-2/september/): Posted by admin on September 19, 2013 at 03:06 PM · वात्सल्य :- वात्सल्य को शरीर के आठ अंगों में से, हृदय से Represent किया जाता है । हृदय ही सारे शरीर में Activity कराता है / सारे अंगों को पुष्ट करता है, ऐसे ही वात्सल्य से भी सम्यग्दर्शन के आठों अंग पुष्ट होते हैं / Maintain होते हैं । मुनि श्री कुन्थुसागर जी Posted by admin on September 18, 2013 at 03:23 PM · उत्तम ब्रम्हचर्य धर्म :- सौदार्य-संतोष को कुशील नहीं कहा, व्रत कहा है, ब्रम्हचर्याणु व्रत । शादी धार्मिक संस्कार है, वासना पूर्ति के लिये नहीं, वासना […] - [- August](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2013-2/august/): Posted by admin on August 28, 2013 at 03:25 PM · अभीक्ष्ण संवेग :- इसके फल हैं – शुभोपयोग कषायों की मंदता वैराग्य ये भाव आते हैं – स्वाध्याय से । पं. रतनलाल बैनाड़ा जी Posted by admin on August 22, 2013 at 00:11 PM · रक्षाबंधन :- रक्षा के लिये बंधन – रत्नों की रक्षा ताले से, रत्नत्रय की रक्षा संयम से !! मुनि श्री कुन्थुसागर जी हम सब का शरीर भी बंधन नामकर्म से ही तो बंधा हुआ है । चिंतन रक्षाबंधन की कथा :- उज्जैनी नगरी में बाली और उनके मित्र मुनिराज से शास्त्रार्द्ध में हार गये […] - [- July](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2013-2/july/): Posted by admin on July 18, 2013 at 04:45 AM · अष्टाहिंका :- ये साल में तीन बार आती है । और महीने के आखिरी आठ दिनों में मनाई जाती है । इस माह (अषाढ़) में यह सप्तमी (16 जुलाई) से प्रारंभ हुई हैं । Posted by admin on July 16, 2013 at 00:12 AM · सत्ता :- कहते हैं कि सबसे बड़ी सत्ता होती है कर्म की, पर कर्म की सत्ता से भी बड़ी है धर्म की सत्ता । मुनि श्री प्रमाणसागर जी Posted by admin on July 14, 2013 at 00:43 AM · अवधिज्ञान :- इसमें प्रत्यक्ष रूप […] - [- June](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2013-2/june/): Posted by admin on June 30, 2013 at 12:22 AM · तीर्थंकर के लक्षण :- भगवान के शरीर पर 1008 लक्षणों में से 108 बड़े/मुख्य लक्षण होते हैं । पं. रतनलाल बैनाड़ा जी Posted by admin on June 25, 2013 at 10:45 AM · तीर्थंकर के नाखून/बाल :- तीर्थंकर होने के बाद नाखून/बाल नहीं बढ़ते हैं, पहले बढ़ते तो हैं पर कटते नहीं हैं, अच्छे लगते हैं । पं. रतनलाल बैनाड़ा जी Posted by admin on June 21, 2013 at 12:11 AM · रात्रि भोजन :- सूर्यास्त से एक घड़ी (24 मिनिट) पहले तक ही भोजन करना चाहिए । पं. […] - [- May](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2013-2/may/): Posted by admin on May 31, 2013 at 2:40 PM · मिथ्यादृष्टि का ज्ञान :- ज्ञान तो भगवान की वाणी यानि सम्यग्ज्ञान ही है, पर है ऐसा जैसे सुंदर-सुंदर औजार पेटी में बंद हों । सम्यग्दर्शन होते ही उनका उपयोग होने लगेगा । मुनि श्री मंगलानंद जी Posted by admin on May 30, 2013 at 2:31 PM · श्वेतता :- “श्वेत पत्र पर, श्वेत स्याही से, कुछ लिखा, सो पढ़ो” शुक्ल लेश्या से, शुक्ल ध्यान करके, आत्मा शुक्ल हो जाती है । आचार्य श्री विद्यासागर जी Posted by admin on May 29, 2013 at 2:19 PM · विसर्जन :- संकल्प […] - [- April](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2013-2/april/): Posted by admin on April 29, 2013 at 03:33 PM · सम्मूर्छन :- बीज में ना नर होता है, ना मादा। पर अनुकूल वातावरण मिलने पर शरीर के लिये वर्गणाऐं लेना प्रारंभ कर पेड़ बन जाता है। इस तरह सम्मूर्छन जन्म में नर मादा का सहयोग नहीं होता है। चिंतन Posted by admin on April 26, 2013 at 02:03 PM · निमित्त / उपादान :- उपादान = जो कार्य रूप परिणत हो जाये, निमित्त + उपादान = कार्य। आचार्य श्री विभवसागर जी Posted by admin on April 25, 2013 at 02:01 PM · रौद्रध्यान :- बच्चा पैदा होते समय रोता […] - [- March](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2013-2/march/): Posted by admin on March 30, 2013 at 12:02 PM · जीव / आत्मा :- जो प्राणों सहित हो, वह जीव, आत्मा जानने देखने वाला जैसे सिद्ध । हम आत्मा भी और जीव भी (10 प्राणों सहित) है इसीलिये जीवात्मा कहलाते हैं । पं श्री रतनलाल बैनाड़ा जी Posted by admin on March 28, 2013 at 09:15 PM · सागर :- पल्य के समय में 10 कोड़ा कोड़ी का गुणा करने पर जो संख़्या आये। श्री वरांग चरित्र – 27/19 Posted by admin on March 25, 2013 at 10:51 PM · पल्य :- योजनों लम्बे चौड़े गड़्ड़े में रोम, 100 […] - [ह](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%b9/) - [- February](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2013-2/february/): Posted by admin on February 27, 2013 at 03:05 PM · आगम/शास्त्र :- आगम भगवान की वाणी, भाव रूप; शास्त्र भगवान की वाणी का द्रव्य रूप । चिंतन Posted by admin on February 26, 2013 at 03:01 PM · फोटो की पूज्यता :- फोटो/प्लास्टिक की मूर्तियाँ, पूज्य/आरती के योग्य नहीं हैं । पं. रतनलाल बैनाड़ा जी Posted by admin on February 25, 2013 at 03:54 PM · आत्मशांति :- कुँए का पानी कुँए में ही मिलेगा, आत्मशांति आत्मा में ही मिलेगी, बाहर नहीं, पुदगलों में नहीं । आचार्य श्री विभवसागर जी Posted by admin on February 24, 2013 at 02:54 […] - [स](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%b8/) - [श](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%b6/) - [व](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%b5/) - [- January](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2013-2/january/): Posted by admin on January 31, 2013 at 10:22 AM · अनगारी :- गृहस्थी में रहने से रागादि बढ़ते हैं, परन्तु आज के हालात में बिना आंतरिक विशुद्धि/वैराग्य के प्राय: घर छोड़ने से भी रागादि बढ़ते हैं । विशुद्धि के लिये प्राचीन ग्रंथों का स्वाध्याय बहुत उपयोगी है तथा एकत्व भावना का चिंतवन । क्षु. श्री गणेशप्रसाद वर्णी जी Posted by admin on January 30, 2013 at 09:12 AM · परिग्रह :- धान का बाहरी छिलका हटाए बिना चावल के ऊपर की लालिमा हटती नहीं है । उसी प्रकार बाह्य परिग्रह छोड़े बिना अंतरंग परिग्रह छूटता नहीं है । आचार्य श्री […] - [- 2013](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2013-2/): – January – February – March – April – May – June – July – August – September – October – November – December - [- December](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2012-2/december/): Posted by admin on December 29, 2012 at 03:02 PM · मोक्षमार्ग :- मोक्षमार्ग पास है, यदि आप अपने पास हैं, मोक्षमार्ग दूर है, यदि आप दूसरों के पास हैं । Posted by admin on December 28, 2012 at 02:34 PM · परिग्रह :- उपाधि का अर्थ है परिग्रह । श्री शांतिलाल जैन – तत्वार्थसूत्र टीका – 9/26 Posted by admin on December 27, 2012 at 02:31 PM · कल्याण मार्ग :- कल्याणमार्ग तो निरीहवृत्ति में है । क्षु. श्री गणेशप्रसाद वर्णी जी Posted by admin on December 26, 2012 at 09:30 AM · अरहंत/सिद्ध :- अरहंत – जीवन मुक्त […] - [- November](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2012-2/november/): Posted by admin on November 30, 2012 at 10:18 AM · आत्मा का आकार :- तेरहवें गुणस्थान के अंत में शरीर नामकर्म का उदय समाप्त हो जाता है, इसलिये आत्मा शरीर के आकार से कुछ कम हो जाती है । और अनंतकाल तक इसी आकार में बनी रहती है । Posted by admin on November 29, 2012 at 09:22 AM · धातुऐं :- सात धातुऐं किन किन इंद्रिय जीवों के होती हैं ? श्रीमति निधी ऐसा आगम में कहीं लिखा नहीं मिलता पर दो से पाँच इंद्रिय तक के सब जीवों में सब धातुऐं मानना होंगी । पं. रतनलाल बैनाड़ा […] - [ल](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%b2/) - [र](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%b0/) - [य](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%af/) - [म](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%ae/) - [भ](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%ad/) - [ब](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%ac/) - [फ](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%ab/) - [प](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa/) - [न](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%a8/) - [ध](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%a7/) - [- October](https://maitreesandesh.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae/2012-2/october/): Posted by admin on October 31, 2012 at 09:25 am · पर्यंक आसन :- सुखासन या अर्धपद्मासन को पर्यंक आसन कहते हैं । पं. रतनलाल बैनाड़ा जी Posted by admin on October 26, 2012 at 10:15 am · ध्यान :- ध्यान के लिये निम्न 5 बातें जरूरी हैं – 1. वैराग्य 2. तत्व का ज्ञान 3. निर्ग्रंथता 4. समता 5. परिषहजय चूंकि ग्रहस्थों के ये पांचों नहीं होतीं, इसलिये उनके ध्यान नहीं कहा है, ध्यान की भावना हो सकती है । पं. रतनलाल बैनाड़ा जी Posted by admin on October 24, 2012 at 10:08 am · इच्छा :- इच्छा एक […] [comment]: # (Generated by Hostinger Tools Plugin)