Posted by admin on April 29, 2011 at 11:35 am ·
सत्य :-
- पर्याय अनित्य/छणभंगुर हैं,
सत्य तो सागर है, जो लहरे दिखतीं हैं वे पर्याय हैं।
- सत्य, श्रद्धा की नजरों से ही देखा जा सकता है, बोलने में सत्य आता ही नहीं।
- सत्य, मोह की अनुपस्थिति में ही देखा जा सकता है।
- सत्य जानने पर, फालतू बोलना अपने आप बंद हो जाता है।
- पर आजकल असत्य को जानकार भी, छोड़ने का भाव नहीं आता,
चाहे वो व्यवसाय हो या नौकरी।
- संसार को यदि एक बार असत्य की दृष्टि से देखने की आदत डाल ली,
तो सत्य दिखना बंद हो जायेगा।
- परखो = पर + खो = पर को खोदो , तभी सत्य प्रकट होगा।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
Posted by admin on April 28, 2011 at 03:24 pm ·
मूर्ति/मंदिर :-
अकृत्रिम चैत्यालय और मूर्तियां सजीव होती हैं ।
कृत्रिम चैत्यालय और मूर्तियां सजीव भी हो सकतीं है अथवा निर्जीव भी ।
बृहज्जिनोपदेश – 17
Posted by admin on April 26, 2011 at 11:40 am ·
सम्यग्दर्शन/ज्ञान/चारित्र :-
- सम्यग्दर्शन के लिये प्रथमानुयोग पढ़ें,
- सम्यग्ज्ञान के लिये तत्वार्थ सूत्र ,
- सम्यग्चारित्र के लिये रत्नकरण्ड़ श्रावकाचार पढ़ें ।
Posted by admin on April 25, 2011 at 11:38 am ·
त्याग :-
- लोभ कम करने की दवा।
- बांध बनाते समय Mud Gate तथा Over Flow Gate बनाये जाते हैं,
पर हमने अपने जीवन के सारे गेट बंद क्यों कर रखे हैं ?
- विषय/कषाय का त्याग सर्वश्रेष्ठ है, इसके बिना मुक्ति नहीं।
- त्याग करने से निःकांक्षित गुण आता है।
- त्याग से और और सुख सुविधायें मिलती हैं।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
Posted by admin on April 22, 2011 at 05:07 pm ·
दुःख :-
जीवन में दुःख दो कारणों से आते हैं-
- अडियलपने से :- अडियलपना मिथ्यात्व से आता है।
जैसे चोर को चोरी करते हुए चार लोगों ने देखा, गवाही भी दी।
जज के पूछने पर चोर ने कहा- मैंने चोरी नहीं की।
जज-ये चार गवाही ?
चोर-ये चार कहते हैं कि मैंने चोरी की पर इस शहर के चार लाख ऐसे भी हैं जिन्होंने मुझे चोरी करते नहीं देखा, उनका क्या?
अडियलपना अनेकांत को समझने से कम होगा।
- मोह से :- भ्रष्टाचार भी मोह से ही आता है।
आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी
Posted by admin on April 20, 2011 at 11:50 pm ·
एकत्व/अन्यत्व/अशरण :-
आप अपनी कम्पनी के 15-20 मालिक बना लें, काम दिन रात आप करें,
वे फोकट में बैठे पगार लें, अपनी सेवा कराऐँ, तो कम्पनी घाटे जायगी न ?
सब जानते हैं – हम अकेले आए थे, अकेले अपने कर्मों को भोग रहे हैं और अकेले ही जाना है तो इन 15-20 directors को पगार किस बात की ?
इसीलिये यह कम्पनी साल दर साल घाटे में जा रही है ।
कारण ? हममें अन्यत्व भावना नहीं है तथा एकत्व भावना को जानते हैं, पर मानते नहीं।
प्रश्न.- पर देखने में तो आता है कि ये 15-20 directors हमारी care करते हैं ?
(श्रीमति शर्मा)
उत्तर.- यह गलतफ़हमी है, वे या तो काम करना नहीं चाहते या कुछ करना भी चाहें तो कर नहीं सकते, क्योंकि मेरी कम्पनी के लिये वे incapable हैं। मेरी आत्मा/अंदर के विचार रूपी project को नहीं जानते । वे सिर्फ मेरे शरीर रूपी इमारत की बाहर से रखरखाब कर सकते हैं ।
वे जो करते दिख रहे हैं, यह मेरे पुण्य कर्म उनसे करा रहे हैं और हम credit उनको दे रहे हैं – अशरण भावना समझें।
चिंतन
Posted by admin on April 17, 2011 at 04:33 pm ·
क्षमावाणी :-
अपना प्रयास , किसी से कलह ना हो, यदि हो तो तत्काल उसका निवारण कर दें, उसे बैर में परिणत ना होने दें ।
यही ग्रहस्थों की उत्तम क्षमा है ।
Posted by admin on April 16, 2011 at 09:15 am ·
उत्तम ब्रम्हचर्य :-
- पाँचों इंद्रियों के विषयों / पापों को आत्म कल्याण के लिये छोड़ना ही उत्तम ब्रम्हचर्य है ।
- आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ब्रम्हचर्य के लिये सावधानी बताते हैं – इष्ट, गरिष्ठ और अनिष्ट आहार ना लेना ।
- वर्णी जी ने ब्रम्हचर्य व्रत की शपथ पं श्री जगमोहनलाल शास्त्री जी कटनी वालों के पिता से ली थी और वे शास्त्री जी को हमेशा समझाते रहते थे कि आपको भी ब्रम्हचर्य व्रत जल्दी से जल्दी ले लेना चाहिए ।
वर्णी जी के निधन के बाद शास्त्री जी, वर्णी जी की अंत्येष्ठी ( Funeral ) में देर से पहुँचे ।
शास्त्री जी ने वर्णी जी की राख को हाथ में लेकर आजन्म ब्रम्हचर्य व्रत की शपथ ले ली ।रत्नत्रय – 2
- पत्रकार – आप कमरे में अकेले हों और कोई सुंदर युवती आ जाए तो मन में विकारों को कैसे रोका जाए ?
मुनि श्री – यदि आपकी बहन आ जाए तो विकार आऐँगे ?
बस उस युवती में बहन देखने लगो ।
मुनि श्री तरुणसागर जी
Posted by admin on April 15, 2011 at 11:45 am ·
उत्तम आकिंचन्य :-
आकिंचन्य यानि मेरा, मेरे के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है ।
सिर्फ धर्म से / आत्मा से सम्बंध स्थापित करना है ।
अप्पा शरणं गच्छामि – अपनी ही शरण में रहो ।
रत्नत्रय – 2
Posted by admin on April 14, 2011 at 10:13 am ·
उत्तम त्याग :-
- सबसे अच्छा त्याग- अवगुणों का ।
सबसे अच्छा ग्रहण- गुणों का ।
- छोड़ो नहीं, छोड़ने से तो अंहकार आता है, छुड़ाओ अपने आप को ।
- ग्रहण और छोड़ने में संतुलन बनाओ।
- ग्रहण कितना ?
ताकि भविष्य के लिये बीज बचा रहे।
- ग्रहण कैसे ?
जिससे दूसरों का हक न छिने ।
- ग्रहण कब तक ?
जब तक त्याग होता रहे ।
- एक लो, तो एक छोड़ो, चाहे पुराना ही सही ।
- ग्रहण करने से पहले अपने आप से पूछें- क्या इसके बगैर काम नहीं चलेगा ?
मुनि श्री क्षमासागर जी
Posted by admin on April 13, 2011 at 10:11 am ·
उत्तम तप :-
- मन का तप – प्रसन्न रहना ।
- तप से जीवन तराशा जाता है ।
मुनि श्री क्षमासागर जी
Posted by admin on April 12, 2011 at 06:10 pm ·
उत्तम सत्य :-
- सत्य कड़वा नहीं होता,
- जब हम अपनी कलुषता के लिफाफे में सत्य को रखकर, दूसरे को देते हैं, तब वह कड़वा दिखने लगता है।
- प्रिय झूठ, अप्रिय सत्य के बराबर होता है।
मुनि श्री क्षमासागर जी
Posted by admin on April 11, 2011 at 01:10 pm ·
उत्तम शौच :-
- जीवन में पवित्रता लाना, लोभ हटाना ।
- एक व्यक्ति को सिद्धि में एक शंख प्राप्त हुआ, उसमें अपनी इच्छा फूंको तो वह पूर्ण हो जाती थी,
वह व्यक्ति गुरु के पास फिर पहुँचा कि दुगनी इच्छापूर्ति का कोई शंख नहीं है ?
गुरु ने बड़ा सा एक शंख दे दिया ।
उस व्यक्ति ने दस लाख रुपये की इच्छा शंख में फूंकी,
तो शंख का जबाव आया–दस लाख क्यों ? बीस लाख लो ।
व्यक्ति खुश हो गया और उसने फिर शंख में बीस लाख की इच्छा फूंकी।
जबाव आया- 20 लाख क्यों ? चालीस लाख लो ।
इच्छाएँ तो गपोड़शंख होतीं हैं, जो सिर्फ आश्वासन देतीं हैं, मन को शान्ति और संतोष नहीं ।
मुनि श्री क्षमासागर जी
Posted by admin on April 10, 2011 at 03:42 pm ·
उत्तम आर्जव :-
- जीवन से मायाचारी हटाना ।
- सरल दिखना आसान है, बनना कठिन ।
- मान कठोर है, मायाचारी कठिन ।
मुनि श्री क्षमासागर जी
Posted by admin on April 09, 2011 at 11:45 am ·
उत्तम मार्दव :-
मृदोर्भावः कर्मवा मार्दवम्।
मृदुता/कोमलता का भाव ही मार्दव-धर्म है।
Posted by admin on April 08, 2011 at 10:53 am ·
दसलक्षण पर्व :-
चैत माह के दसलक्षण पर्व आज से प्रारंभ हुये हैं ।
आज उत्तम क्षमा धर्म है ।
आज भगवान अजितनाथ का मोक्ष कल्याणक भी है (चैत शुक्ल पंचमी)।
उत्तम क्षमा :-
जिसके उत्तम-क्षमा होती है,
वह तिर्यंच और नरक गति में नहीं जाता।
सम्यग्दर्शन पेज 344
Posted by admin on April 07, 2011 at 12:13 pm ·
असंयम :-
- बैठा हुआ व्यक्ति, पथ का निर्माण नहीं करता,
बल्कि अवरोध पैदा करता है।
- संयमी ही कर्म के थपेड़े सह पाता है।
- संयमी विषयों को विष मानकर छोड़ देता है।
- संयम तो दर्शन (श्रद्धा) की वस्तु है, प्रदर्शन की नहीं,
प्रदर्शन तो कागज के फूल हैं, जिनमें खुशबू न पाकर उनके पास आने वाले लौट जाते हैं।
- संयमी खुश्क नहीं, खुश रहता है।
- संयमी संयोग वियोग/हर्ष विषाद में समता रखता है।
- जो संयम रखता है, वही सच्चा स्वाध्यायी है।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
Posted by admin on April 06, 2011 at 11:13 am ·
रात्रि भोजन त्याग :-
अंतिम दिनों में गाँधी जी ने भी रात्रि भोजन का त्याग कर दिया था।
(उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा प्रकाशित पुस्तक) – Jain & Info – Pune
Posted by admin on April 04, 2011 at 10:14 am ·
परीषह:-
‘परि’ यानि सब ओर से (आंतरिक तथा बाह्य), ‘षह’ यानि सहन करना।
22 परीषह – (1) क्षुदा (2) तृषा (3) शील (4) दंशमशक (5) नग्नता (6) अरति (7) स्त्री (8) चर्या (चलने की) (9) निषधा (बैठने की) (10) शय्या (12) आक्रोश (गाली आदि) (13) वध (14) याचना (माँगने का अवसर आने पर भी नहीं माँगना) (15) अलाभ (भोजन न मिलने पर संतोष) (16) रोग (17) तृण स्पर्श (18) मल (19) सत्कार पुरुष्कार (20) प्रज्ञा (ज्ञान का मद नहीं) (21) अज्ञान (अज्ञान पर खेद न करना) (22) अदर्शन (श्रद्धा न बिगाड़ना)
Posted by admin on April 01, 2011 at 10:22 am ·
समिति/धर्म/अनुप्रेक्षा/परीषह/चारित्र :-
समिति को समीचीन बनाने को धर्म,
धर्म को समीचीन बनाने के लिये अनुप्रेक्षा,
अनुप्रेक्षा को समीचीन बनाने के लिये 22 परीषह,
परीषह बिना चारित्र के धारण नहीं किया जा सकता है।