सेवा प्रशंसनीय है, यदि उसमें ममत्व न हो।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

सृष्टि इन तीनों से ही चलती है। यंत्र, मंत्र हमको मजबूत करते हैं, जंगली पौधे जैसे मुसीबतें झेलता हुआ बढ़ता रहता है।
तंत्र (साधन) कमज़ोर/पराधीन करता है, A. C. का पौधा है, धीरे-धीरे सूखता है।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

धर्म वो नहीं जो संकटों को टाल दे, बल्कि वो जो संकटों में सम्हाल ले।
देखा जाय तो धर्मात्माओं पर संकट आते तो है पर उनको छूते नहीं। क्योंकि संकट तो शरीर पर आते हैं और धर्मात्मा अपने आपको शरीर मानते नहीं, अपने को आत्मा ही मानते हैं।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

सीता जी पर अत्याचार नहीं, बल्कि ऊँचे स्थान पर बैठाने की प्रक्रिया थी जैसे साधुओं की कठिन साधना।
तभी तो आम आदमी सीता राम कहता है।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

2 मुर्गे लड़ते हैं प्रतिक्रिया के कारण।
यदि प्रतिक्रिया न करें तो सामने वाले की स्थिति उस मुर्गे जैसी हो जायेगी जो दर्पण में चोंच मार-मार कर घायल हो जायेगा,
दूसरा मुर्गा यानी आप दर्पण के पीछे सुरक्षित।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

गुरुजन कहते हैं → धर्म ध्यान हर समय करते रहना चाहिये। पर हर समय पूजादि तो सम्भव नहीं !
पूजादि तो धर्म के बाह्य रूप हैं, असली तो अंतरंग है और वह सम्भव होता समता-भाव से।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

भगवान से कभी यह वर मत माँगना कि मैं अपने बच्चों की हर इच्छा पूरी कर सकूँ।
ऐसा वर माँगा, तो धृतराष्ट्र बन जाओगे।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

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