सुपात्र (साधु) को दान देने का एक और फायदा -> सुपात्र को इच्छा/ अपेक्षा नहीं, ऐसों को दान देने से हमारी अपेक्षा/ इच्छा कम होगी।
ऐसे सुपात्र वायदे नहीं करते, इन्हीं के आशीर्वाद फलते हैं जैसे फलदार पेड़।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

जैसा खेत/ बीज, वैसी फसल।
सुपात्र की पूजा से पूजक को सम्मान,
दान से भोग/ इच्छापूर्ति,
भक्ति से सुंदरता(असुंदर भी सुंदर लगने लगता है)।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (रत्नकरण्ड श्रावकाचार श्लोक – 116)

आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे….
जितना-जितना तन को सजा रहा है,
उतना-उतना चेतन को सज़ा दे रहा है।

आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी

एक लघु फिल्म ने बहुतों को बोध कराया…
दो बुज़ुर्ग बैठे तीसरे मित्र का इंतज़ार कर रहे हैं।
5 मिनट बाद….
पहला…वह नहीं आया।
दूसरा.. आएगा।
यही वार्तालाप बार-बार दोहराकर 20 मिनट बाद लिखा आया… आप किसका इंतज़ार कर रहे हैं ? फिल्म तो समाप्त हो चुकी है !

हम किसका इंतज़ार कर रहे हैं ? अपनी फिल्म समाप्त होने से पहले कुछ Generate (शुभ कर्म) क्यों नहीं करते ?
या जो इंतज़ार जीवन भर किया वही आगे भी करना है ?

ब्र.(डॉ.) नीलेश भैया

ईरानी संत चिंतित कि उन्हें भगवान कैसे मिलें !
समुद्र के किनारे छोटा बच्चा भी चिंतित कि समुद्र को प्याली में कैसे भरूँ !!

दोनों चिंतायें एक ही श्रेणी की हैं ।

मुनि श्री मंगलसागर जी

जैसे मंदिर में हम ग़लत न बोल सकते हैं ना ही ग़लत कर सकते हैं।
ऐसे ही यदि हम अपने घर को “भगवान का घर” कहने/ मानने लगें तो घर में भी ग़लत न बोल पायेंगे ना ही ग़लत कर पायेंगे।

बच्चे की आँख में जन्म के समय लाल लेंस लगा दिया। बड़े होकर उसे सब लाल-लाल दिखते थे। बाकी सब को सतरंगी* दुनिया।
गुरु की दृष्टि में संसार में सार नहीं, हमारी दृष्टि में संसार में ही सार है।

ब्र. (डॉ.) नीलेश भैया

* सप्तभंगी

मुनि को हाथी की संज्ञा दी जा सकती है। हाथी को महावत नियंत्रित करता है, मुनि को महाव्रत। नियंत्रित करने वाला अंकुश यदि गिर जाता है तो हाथी ख़ुद उठकर महावत को दे देता है। ऐसे ही मुनि ख़ुद कठोर प्रायश्चित लेकर अपने को नियंत्रित करते हैं।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

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