गाड़ी आगे चले या पीछे ईंधन तो खपेगा ही। सुकर्म करें या दुष्कर्म, कर्म तो बधेंगे ही। गाड़ी आगे जाने पर गंतव्य पहुँचोगे, पीछे जाने पर गंतव्य से दूर।

आर्यिका श्री स्वस्तिभूषणमति माताजी

दो प्रकार के व्यक्ति होते हैं…
पहले… भूमि पर उगे बरगद की तरह जो सबको छाया आदि देते हैं।
दूसरे… उस बरगद जैसे जो दीवार आदि पर उग आते हैं। छाया कम, जहाँ आश्रय पाते हैं, उसे ही तोड़ देते हैं।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

आर्यिका विशालमति, जो आर्यिका विज्ञानमति से ज्येष्ठ हैं, ने उनसे ब्रम्हचर्य पर कुछ लिखने को कहा। बड़ी माताजी की प्रेरणा और सलाह से उन्होने ‘शीलमञ्जूषा’ पुस्तक लिख दी और लेखक के रूप में बड़ी माताजी का नाम डाला।
विशालमति माताजी ने चोरी का दोष मान कर नमक छोड़ दिया। अंतत: दोनों का नाम डलवाया गया।

(अंजू – कोटा)

समाधि कब ?
जब इंद्रियाँ शिथिल होने लगें पर मन में उत्साह बना रहे।
उत्साह कैसे बनाये रखें/ बढ़ायें ?
भगवान/ गुरुओं का जय-जयकार करके।
(युद्ध के दौरान भी इसका सफल प्रयोग किया जाता है)

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

दया, पूजा आदि करके हम दूसरे का कल्याण नहीं करते; उसे लाभ नहीं देते। हम तो अपना कल्याण करते हैं।

हमारे दान से ग़रीब को लाभ हो भी सकता है, नहीं भी। नुक़सान भी हो सकता है।

भगवान न तो ख़ुश होते हैं, न ही नाराज़।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

जो सब कुछ सर्वोत्तम चाहते हैं। वे अगले भव में द्रौपदी (पौराणिक परम्परानुसार) बनते हैं।
द्रोपदी ने 5 क्षेत्रों के सर्वोत्तम पति का वरदान मांगा था, जो एक व्यक्ति में तो सम्भव नहीं था।

चिंतन

मज़ा… संसार पर आश्रित। अल्प समय का।
आनंद.. गुरु/ भगवान के निमित्त/ निकटता/ उनकी सेवा करने से।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र – 8/24)

इष्ट के साथ अनिष्ट भी जुड़ा रहता है जैसे प्रवचन इष्ट, इसमें अवरोध अनिष्ट।
बचपन में माँ इष्ट, बड़े होकर माँ अनिष्ट।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

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April 8, 2022