वृद्धावस्था में इन्द्रियाँ/ दिमाग शिथिल हो जाते हैं। जिन चीज़ों में पहले से रुचि है वही आगे बढ़ जातीं हैं।
यदि खाने में तो खाते रहते, पूजा-पाठ तो वह बढ़ जाता है।
इसलिये शुरु से ही संस्कार अच्छे/ धार्मिक डालें।
चिंतन
अकेला कोई रहना नहीं चाहता।
दो होते ही… तीन…चार।
तालाब में पत्थर फैंकते ही एक, फिर अनेक लहरें उठ जाती हैं।
ऐसे ही विचार एक के बाद अनेक आने लग जाते हैं।
ब्र. डॉ. नीलेश भैया
एक विद्यार्थी दूसरे को पीट रहा था।
कारण ?
दूसरे ने गलत जबाब लिखा था, पहला उसकी नकल कर रहा था।
नकल करनी हो तो असल की करो/ सच्चे देव, शास्त्र, गुरु की करो।
माली राजा को रोज़ाना फल लाकर देता था।
राजा एक खाता/ रखता, दूसरा माली के ऊपर फेंकता।
माली कहता “अच्छा हुआ”।
पूछा, ऐसा क्यों कहता है ?
अच्छा हुआ मैं तरबूज नहीं लाता।
ब्र. डॉ. नीलेश भैया
मोटे पेट वाला व्यक्ति गोल्फ़ खेलने गया।
बॉल पास में रखी तो दिखी नहीं, दूर रखी तो वहाँ स्टिक पहुँचे नहीं।
हमारी भी दूर/ दूसरों की चीज़ों पर दृष्टि जाती है पर पहुँच नहीं।
पास/ अपने पास की चीज़ों पर दृष्टि पहुँचती नहीं। (क्योंकि पेट बड़ा है/ संचय ज्यादा है, सदुपयोग कम)
ब्र. डॉ. नीलेश भैया
आचार्य श्री विद्यासागर जी से पूछा….
आप अपने को कैसा शिष्य मानते हैं ?
सूखे पत्ते सा।
वो कैसे ?
सुखे पत्ते की अपनी कोई इच्छा/ मंज़िल नहीं होती,
गुरु रूपी हवा जिधर ले जाती है, उधर चला जाता है।
आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी
वैज्ञानिक आइंस्टीन की सालों की मेहनत अचानक प्रयोगशाला में आग लगने से समाप्त हो गयी।
आइंस्टीन…. अच्छा हुआ मेरी गल्तियाँ समाप्त हो गयीं, अब नये सिरे से बेहतर काम शुरु करुँगा।
एकता – पुणे
नदी/ सूरज हमसे सम्बन्ध बनाते नहीं, हम आगे बढ़कर बनाते हैं, प्यास बुझाने/ ताप लेने।
भगवान/ गुरु से हमें ही Connect होना होगा।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
शून्य अंदर/ बाहर से खाली होता है।
जिनका जीवन अंदर/ बाहर से खाली होता है, उनके जीवन में पूर्ण विराम लग जाता है। शून्य पूर्णता का प्रतीक है। (जिस अंक के पीछे भी लगा दो तो उसकी कीमत बढ़ जाती है)
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
आहार-दान धर्म है इसलिये देने तथा लेने वाले दोनों का धर्म बढ़ेगा। यदि साधु के पेट भरने का भाव आ जाय तो धर्म नहीं।
ऐसे ही आर्शीवाद जब अभय-दान बन जाता है तब बहुत कारगर बन जाता है। पर काम करेगा अपने से छोटों पर।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
लाड़ से खुशी सुरक्षित, डाँट से हित।
इसीलिये गुरु शिष्य को डाँट लगाकर रखते हैं।
आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे…. पर डाँट इतनी तगड़ी मत लगा देना कि शीशी से दवा निकले ही नहीं(उद्देश्य पूरा होगा ही नहीं)।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
भगवान महावीर से उनके सबसे बड़े शिष्य गौतम जी ने पूछा… आप भी इस संसार में, मैं भी; पर आप अबद्ध (संसार/ कर्मों से), मैं बद्ध।
ऐसा कैसे ?
एक आम के पेड़ पर दो तोते। एक आम चख रहा है(बद्ध), दूसरा पेड़ पर रहते भी तटस्थ बैठा है (अबद्ध)।
ब्र. डॉ. नीलेश भैया
अंधकार… प्रकाश का अभाव।
छाया……. प्रकाश का अवरोध।
चिंतन
इंद्रियों पर नियंत्रण रखने के लिये मन को असंतुष्ट रखें। मीठा मन को अच्छा लगता, सो और-और मांगता है, जिव्हा नहीं।
(असंतुष्ट मन बुझ आता है फिर ज़िद नहीं करता है)
आचार्य श्री समयसागर जी
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