एक राजा को घोड़ा बहुत प्यार था। पर उसकी बुरी आदत से राजा को नीचा देखना पड़ता था। चलते-चलते घोड़े को खाने की चीज दिख जाए तो बस उधर ही चल देता था।
पुराने सईस को बुलाया गया, उसने घोड़े को दौड़ाया जैसे ही वह खाने की ओर बढ़ता सईस कोड़ा मारता, दो-चार कोड़े खाकर उसने यह आदत छोड़ दी।
हमारा मन भी घोड़े की तरह है, संसार की ओर भागे तो तगड़े प्रायश्चित का कोड़ा लगा दें, धीरे-धीरे भागना छोड़ देगा।
ब्र. (डॉ.) निलेश भैया
अकड़ नहीं तो पकड़ (चैंट जाना/ स्वाभिमान को देना) भी नहीं होनी चाहिए।
जिस घर में काम कर रहा हो/ रह रहे हो उसे हल्का, दूसरे घर को बेहतर मानें/ कहे तो नुकसान होगा न !
जिस भगवान के आज/ अभी दर्शन कर रहे हो, उसे ही सर्वोत्तम मानो तभी कल्याण होगा।
चिंतन

(अनीता जैन)
लघुता क्या है ?
याचना।
प्रश्नोत्तरी रत्नमाला (राजर्षि अमोघवर्ष)
याचना किसे कहें ?
प्रार्थना + स्वार्थ सिद्धि।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
संसारी वस्तुएँ मांगने से संसार बढ़ता है… कमलकांत।
सद्गुण/मोक्षादि मांगने से संसार घटता है। उससे लघुता नहीं आएगी। हालाँकि विशुद्धि बढ़ने से माँगना भी बंद हो जाता है…चिंतन
श्रद्धा… अज्ञात पर,
भक्ति… ज्ञात पर।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
(गुरु और भगवान तो ज्ञात हैं उन पर श्रद्धा ?
हां! ज्यादातर लोगों की ज्यादा श्रद्धा इन पर ही होती है, पर गुरु में अंतरंग गुण क्या हैं वह तो पता नहीं, अज्ञात गुणों पर ही तो श्रद्धा होती है।
पत्थर की मूर्ति पर श्रद्धा नहीं करते हैं, उसमें अज्ञात भगवान पर श्रद्धा करते हैं – चिंतन)
बच्चों के सुख को प्राथमिकता दें या हित को ?
सुख मन के लिए होता है, हित जीवन के लिए।
सुख को प्राथमिकता दी तो उनका अहित होगा, हित को दी तो सुखी भी रहेंगे।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी

(रेनू – नया बाजार मंदिर, ग्वालियर)
अकाउंट में डबल एंट्री होती हैं, लेन-देन की अलग-अलग।
कर्म सिद्धांत में भी ऐसा ही है… जिसने गाली खाई उसके में -ve एंट्री हो गई (यदि सहन नहीं कर पाया तो, सहन कर लिया तो पॉजिटिव एंट्री),
जिसने दी उसके में -ve एंट्री पड़ गई।
गौरव-भोपाल (चिंतन)
ईर्ष्या होती है दूसरों को बढ़ते देखकर, उदास होते हो तो दूसरों की वजह से, उम्मीद करते हो तो वो भी दूसरों से, डर लगता है तो वो भी दूसरों से, क्रोध आता है तो दूसरों की वजह से।
सब कुछ तो दूसरों का है, हमारा अपना क्या है ?
(सुरेश-इन्दौर)

(मंजू रानीवाला)
इतने सहज भी न हो जाना की जानवरों की तरह बिना शर्म के कहीं भी/ कभी भी/ कुछ भी करने लग जाओ।
बच्चों की तरह इतने सरल भी न बन जाना की कोई भी बुद्धू बना जाए।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
सेवा में थे तब पूरी पगार, सेवा-निवृत्त होने पर आधी।
आज (81 साल के होने पर) पूछते हैं… कैसे हो ?
सेहत/ हालात पेंशन वाले* हैं, पर काम/ खर्चा सेवा के समय जैसा चल रहा है।
चिंतन
* 50% वाले।
आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे… “मोक्षमार्ग बाहर है ही नहीं।”
जैसे हवाई जहाज उठने के बाद बाहर दौड़ने में सहायक, पहियों को भी अंदर ले लेता है तभी ऊपर उठता जाता है/ गति आती है।
निर्यापक मुनि श्री संभवसागर जी
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