दान अपने से बड़ों को….

  • जिससे उनकी पूज्यता बढ़े।
  • ख़ुद पूज्य बनने को।

पुण्यहीनों को सहयोग।
व्यवहार में तो दान शब्द बहुत जगहों पर प्रयोग कर लेते हैं जैसे पानदान आदि में।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

संसार मार्ग… जियो और जीने दो
मोक्ष मार्ग… न मरो (मोक्ष यानी अमरता), न मरने दो (मोक्षमार्गी को देखकर अन्य भी मोक्ष-पुरुषार्थ करके अमरता की ओर बढ़ेंगे)।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

घना कोहरा पूरे दिन छाया रहा। सूरज भी पूरे दिन ताप देता रहा, फिर भी कोहरा कम न हुआ।
हमारी पुण्य क्रियायें भी ऐसी ही हैं। यदि पाप का कोहरा घना हो तो सूर्य के ताप की तरह लगेगा कि यह क्रियायें पाप को काट नहीं पा रही हैं,
पर ध्यान रहे…आज कोहरा नहीं हट पा रहा, लेकिन कल को कम घना, या नहीं रहेगा।

चिंतन

शुरू में व्यवहार अंत में निश्चय।
एक बच्चा पिता के साथ मेला गया। बच्चा खिलौने के लिए जिद कर रहा था। थोड़ी देर में पिता अलग हो गए। बच्चा रोने लगा। बहुत सारे खिलौने देने पर भी बच्चा लेने को तैयार नहीं।
हमको भी मूल को प्राथमिकता देनी चाहिए।

ब्र. (डॉ.) निलेश भैया

समुद्र नहीं तालाब बनो जहाँ शेर भी सिर झुका कर पानी पीने को मजबूर हो जाते हैं।
हम ऐसे तालाब कैसे बनें ?
जीवन में मधुरता/ उदारता लाने पर।
लाभ क्या होगा ?
तब कर्म भी सिर झुका जायेंगे।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

शिष्य… गुरुजी ! मकान की बहुत परेशानी है। कुछ तरकीब बताएँ।
गुरु… एक घड़ा टेढ़ा करके पेड़ पर लटका दें।
अगली साल तक एक मकान बन गया।
गुरु… यह न टोटका था, ना ही आशीर्वाद। तूने घड़ा लटकाया, उसमें चिड़िया ने घर बनाया, उसकी दुआ से तेरा घर बना।

एन.सी.जैन – नोएडा

शिष्य…”गुरु जी! बहुत परेशानियाँ है, नींद भी नहीं आती है, क्या करुँ ?”
100 ऊँट ले जा, जब सब बैठ जाएँ तब सो जाना। वह इधर के ऊँटों को बिठाता तो उधर के खड़े हो जाते।
जीवन की परेशानियाँ भी ऐसी ही हैं। सब शांत कभी नहीं होंगी, कुछ अपने आप शांत होंगी, कुछ करने से, कुछ कभी नहीं। तुम्हें बीच-बीच में शांत होकर सो लेना होगा।

ब्र. (डॉ.) नीलेश भैया

आगरा मंदिर के युवा श्री अमित का संस्मरण…
जब मैं 17-18 साल का था। मंदिर में एक बूढ़ी माताजी ने मुझसे कहा…”मुझे दिखाई नहीं देता। क्या तुम धर्म की पुस्तक (पद्म पुराण) मुझे सुना दिया करोगे ?”
अमित ने पूरा पुराण पढ़कर सुनाया। बाद में पता लगा उन्हें दिखाई ही नहीं देता था बल्कि उन्हें तो बहुत ज्ञान था।
ऐसे ही उन महिला ने कई बच्चों में रुचि पैदा की थी। इस तरह अमित को रुचि पैदा हो गई, आज भी वह बुजुर्गों को पढ़-पढ़ कर सुनाते हैं।
मुझे भी प्रेरणा मिली… बच्चों को सुनाने से बेहतर है, उनसे सुनना।

सोते समय विचार ज्यादा आते हैं/ सताते हैं, ऐसा क्यों ?
पूरे दिन चाबी भरोगे तो रात को अलार्म बजेगा ही। चीजों/ घटनाओं को ज्यादा ममत्व दोगे तो जोर से बजेगा, ज्यादा Disturb करेगा।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

गुस्से वाले मुर्गे के सामने शीशा रख दो। मुर्गा चोंच मार-मार कर खुद को घायल कर लेगा। दूसरा मुर्गा बच जाएगा।
हम भी यदि प्रतिक्रिया न दें तो सामने वाला ख़ुद व ख़ुद जलता रहेगा/ कर्म-बंध करता रहेगा।

चिंतन

बाह्य जगत अंतर जगत
आयु बढ़ती है आयु घटती है
मोह से प्रभावित निर्मोह से
आयु बढ़ने के साथ अभिमान बची आयु के सद्पयोग के भाव

जीवन की सबसे बड़ी गलती… आयु को न देखने की।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

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