| बाह्य जगत | अंतर जगत |
| आयु बढ़ती है | आयु घटती है |
| मोह से प्रभावित | निर्मोह से |
| आयु बढ़ने के साथ अभिमान | बची आयु के सद्पयोग के भाव |
जीवन की सबसे बड़ी गलती… आयु को न देखने की।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
दर्शन के बिना अध्यात्म, जीवन चल सकता है।
बिना अध्यात्म के, दर्शन का दर्शन नहीं।
अध्यात्म स्वाधीन नयन है।
दर्शन पराधीन, उपनयन है (उदाहरण चश्मा)।
दर्शन बताया जा सकता है।
अध्यात्म महापुरुषों के द्वारा ही प्राप्ति का उपाय है।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
जरूरत के चरण…
- भूख/ शरीर सम्बन्धित
- सुरक्षा
- परिवार/ संगति
- सम्मान
- आत्मनिष्ठ/ आत्मजागृति।
पूर्व के दर्शन में भगवान राजाओं के पुत्र थे सो चार चरण पहले ही पूरे थे, अतः पांचवें चरण तक पहुंचते थे।
पाश्चात के चार ही। इसलिए तुलसीदास जी ने कहा है – “हारे को हरी नाम”
ब्र. (डॉ.) नीलेश भैया
आम के बौर आते ही एक चिड़िया की नई सी आवाज आई। थोड़े अंतराल के साथ आवाज मधुर होती गई। अंत में वह कोयल की मधुर आवाज निकली।
शुरू की आवाज का कारण ?
10 माह का अंतराल, बिना अभ्यास का।
चिंतन

(रेनू- नया बाजार मंदिर)
संसार में सुख कम हैं/ कम समय के लिए आते हैं। बढ़ाने का उपाय ?
माँ का पत्र आए, तुरंत ना खोलें;
शुगर की बीमारी हो, चार लड्डू खाने का मन हो, एक लड्डू को धीरे-धीरे चार लड्डू के खाने के समय के बराबर खाएं।
लो! बढ़ गया ना सुख का समय!!
चिंतन
बच्चों को भगवान की “जय” कहलवाओ तो वह कह देता है “दै”। उसकी भाषा माँ ही समझ पाती है।
भगवान की भाषा गुरु ही समझते हैं। जैसे शुद्ध दूध को न पचाने वाले बच्चे को माँ पानी मिलाकर देती है, ऐसे ही गुरु भगवान की भाषा को Dilute करके भक्तों को देते हैं।
गुरु, भगवान और भक्त के बीच की कड़ी हैं।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
ज्ञान / क्रिया…
श्री आर.के.जैन (कलेक्टर) से पूछा –> आपके पास सबसे ज्यादा शिकायत कौन सी आती हैं ?
पत्रकार.. “आप लोगों को समाज की परेशानियों का ज्ञान तो रहता है फिर भी आप उन पर कार्यवाही क्यों नहीं करते ?”
आर.के.जैन… क्या हम सबको अपनी-अपनी कमजोरी नहीं मालूम! फिर हम उनको दूर करने के लिए कुछ करते क्यों नहीं!!
ब्र.(डॉ.) नीलेश भैया
मिट्टी सुंदर, पानी भी सुंदर, आपस में सम्बंध स्थापित करते ही असुंदर कीचड़।
आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी
(जब दो सुंदर वस्तुओं के संबंध का आउटपुट असुंदर होता है तो असुंदर के साथ संबंध का आउटपुट क्या होगा !)
धार्मिक –> जो धार्मिक क्रियायें करे।
धर्मात्मा –> जिसकी आत्मा में धर्म आ गया हो/ धर्म को आत्मसात कर लिया हो।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
कोटा पद्धत्ति तो Tension ही देती है। चाहे सरकारी नौकरियों में हो या धार्मिक क्रियाओं का (कोटा फिक्स करके धर्म करना)।
चिंतन

(रेनू- नया बाजार मंदिर)
जीवन का दुरुपयोग करना तो अपराध है ही लेकिन सदुपयोग ना करना भी अपराध है।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
दो प्रकार के मन मानो → एक शरीर का दूसरा आत्मा का।
शरीर का मन कहता है खाओ पीओ ऐश करो। आत्मा का मन कहता है व्रत उपवासादि करो।
जीतेगा का कौन ?
यदि शरीर वाले को ज्यादा महत्व/ समय देंगे तो शरीर वाला अन्यथा आत्मा वाला।
आर्यिका श्री स्वस्तिभूषण माताजी
Pages
CATEGORIES
- 2010
- 2011
- 2012
- 2013
- 2014
- 2015
- 2016
- 2017
- 2018
- 2019
- 2020
- 2021
- 2022
- 2023
- 2024
- 2025
- 2026
- News
- Quotation
- Story
- संस्मरण-आचार्य श्री विद्यासागर
- संस्मरण – अन्य
- संस्मरण – मुनि श्री क्षमासागर
- वचनामृत-आचार्य श्री विद्यासागर
- वचनामृत – मुनि श्री क्षमासागर
- वचनामृत – अन्य
- प्रश्न-उत्तर
- पहला कदम
- डायरी
- चिंतन
- आध्यात्मिक भजन
- अगला-कदम
Categories
- 2010
- 2011
- 2012
- 2013
- 2014
- 2015
- 2016
- 2017
- 2018
- 2019
- 2020
- 2021
- 2022
- 2023
- 2024
- 2025
- 2026
- News
- Quotation
- Story
- Uncategorized
- अगला-कदम
- आध्यात्मिक भजन
- गुरु
- गुरु
- चिंतन
- डायरी
- पहला कदम
- प्रश्न-उत्तर
- वचनामृत – अन्य
- वचनामृत – मुनि श्री क्षमासागर
- वचनामृत-आचार्य श्री विद्यासागर
- संस्मरण – मुनि श्री क्षमासागर
- संस्मरण – अन्य
- संस्मरण-आचार्य श्री विद्यासागर
- संस्मरण-आचार्य श्री विद्यासागर
Recent Comments