भगवान की मूर्ति… निरखों अंग-अंग जिनवर के, इनमें झलके शांति अपार।
अलग-अलग अंगों का अपना-अपना प्रभाव होता है, उनसे अलग-अलग एनर्जी मिलती है।
अलग-अलग समय पर दर्शनों का भी प्रभाव अलग-अलग होता है।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
“What is the best ? … Time.
Which is the worst ? … Time.
What is the difference between the two … of Time !”
(J.L.Jain)
पूछ की इच्छा मायाचारी है,
अगले जन्म में पूँछ वाला बनने की तैयारी है।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
आत्मा का चिंतन/ परिचय कैसे करें ?
आत्मा के गुणों (श्रद्धा/ ज्ञान/ दयादि) का चिंतन करने तथा इन गुणों को जीवन में उतारने से परिचय होगा।
क्षु. श्री सहजानंद वर्णी जी
जिसमें वास हो जाए।
एक समय के राग को वासना नहीं कहते। उस राग में बस जाना वासना है।
चिंतन
करवट चाहे रात में बदलें या दिन में, Left को लें चाहे Right को, सावधान रहते हैं (ताकि गिर ना जायं)।
जब समय बदले (अच्छा या बुरा), सावधान रहें (ताकि गिर ना जायं) !
मुनि श्री प्रमाणसागर जी

(रेनू- नया बाजार मंदिर)
पेड़ के पत्ते सड़/ सूख/ पीले हो रहे हैं, सब चिंतित हैं।
उसे किस जमीन में रोपा, कैसा खाद, सडा़ पानी दिया/ दे रहे हैं, विचार किया !
उनको धर्म/ गुरु से जोड़ा ? या पैसा/ नाम से/ आधुनिक जीवन से ही ??
चिंतन
एक स्थिति में पड़े रहने से कठोरता आ जाती है जैसे जल का बर्फ बन जाना।
बर्फ जलाती है, इसलिए जल का नाम पड़ा होगा।
ब्र.(डॉ.) नीलेश भैया – चिंतन
उपदेश पात्र तथा कुपात्र को भी, जैसे हो उसे ही व्यवस्थित करने।
ज्ञान पात्र को ही जैसा गुरु चाहते हैं, वैसा बनाने को।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
सुपात्र (साधु) को दान देने का एक और फायदा -> सुपात्र को इच्छा/ अपेक्षा नहीं, ऐसों को दान देने से हमारी अपेक्षा/ इच्छा कम होगी।
ऐसे सुपात्र वायदे नहीं करते, इन्हीं के आशीर्वाद फलते हैं जैसे फलदार पेड़।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
जैसा खेत/ बीज, वैसी फसल।
सुपात्र की पूजा से पूजक को सम्मान,
दान से भोग/ इच्छापूर्ति,
भक्ति से सुंदरता(असुंदर भी सुंदर लगने लगता है)।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (रत्नकरण्ड श्रावकाचार श्लोक – 116)
आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे….
जितना-जितना तन को सजा रहा है,
उतना-उतना चेतन को सज़ा दे रहा है।
आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी

(मंजू रानीवाला)
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