कार के टायर के नीचे आने से पैर कुचल गया।
पर टायर तो रबड़ का और रबड़ मुलायम ?
हवा भर दी सो कठोर हो गया।
मनुष्य में भी हवा भर दो तो वह कठोर हो जाता है। अन्यथा उसका स्वभाव तो
कोमल/ विनम्र होता है।
चिंतन
शाबाशी अच्छे/ बुरे कामों पर भी। इससे अहंकार आता है।
आशीष सिर्फ अच्छे कामों के लिये ही। इससे अहंकार घटता है।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
कर्म चोर बहु फिरत हैं…
यह कहावत सही नहीं है। कर्म तो साहूकार हैं, उनका कर्ज़ा कभी चुकता नहीं है।
मुनि श्री मंगलानन्द सागर जी
(सही कहा है…ब्याज दर ब्याज लगती जाती है, एक कर्म उदय में आया, हमने रागद्वेष किया। कटा एक, बंधे चार)
चिंतन
साँप को साँप कहो या साँप जी, वह तो डसेगा ही।
क्रिस्टोफ़र नोलन
बच्चा माता पिता के बीच सो रहा है, सर्वाधिक सुरक्षित महसूस करता है। स्वप्न में शेर उसे खाने आया।
बचायेगा कौन ?
कोई सम्बंधी नहीं। सिर्फ जगना ही बचा सकता है।
चिंतन
राजा के प्रिय मंत्री की गलती पर राजा को सजा तो देनी ही थी।
सैनापति की राय थी – 1 लाख मुद्रा 100 कोडे, सैनिक की 1 हजार मुद्रा 10 कोडे, भिखारी की 10 मुद्रा , 1 दिन भोजन नहीं।
सबके अपनी बुद्धि/स्तर के अनुसार मापदंड थे।
ब्र. डॉ. नीलेश भैया
क्या भगवान भक्तों की ही इच्छा-पूर्ति करते हैं, या जो भी शरण में आता है, उसकी?
भगवान किसी की भी इच्छा-पूर्ति नहीं करते। जो भी विश्वास के साथ उनकी शरण में जाता है, उसकी इच्छायें ही समाप्त हो जाती हैं।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
सामने वाले में अच्छाई दिखे तो उसे सच्चाई मानो (भरोसा, परखकर)।
अपनी अच्छाई के पीछे सच्चाई परखो।
परिवार/ समाज में सच्चाई को गौण कर अच्छाई को प्रमुखता दें।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
कांक्षा का नुक़सान… संसार तथा परमार्थ दोनों में फल पर दृष्टि रहती है सो धर्म/ कर्त्तव्य पर कम हो जाती है।
इससे विशुद्धि/ शांति भी कम हो जाती है।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थसूत्र 7/23)
काँपते हाथों को रोकने के लिये कहते हैं…. “साधो”।
साधु वही जो विचलित होते मन को साध ले।
ब्र. डॉ. नीलेश भैया
रुलाना….
किसी को रुलाने का पाकीज़ा तरीका… हँसाओ इस क़दर कि पानी निकल आये,
हम तो दुश्मन को भी पाकीज़ा सज़ा देते हैं।
हाथ उठाते नहीं, नज़रों से गिरा देते हैं।
डॉ. ब्र. नीलेश भैया
मन्दिर जाना बन्द कर दिया क्योंकि वहाँ झगड़े/ विसंवाद होते हैं।
दुकान/ घर में भी तो होते हैं, वहाँ जाना/ रहना बन्द किया क्या?
मुनि श्री मंगलानन्द सागर जी
देह को तो राख बनना ही है।
तो क्या राख से राग रखना समझदारी होगी !
आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी
दान अच्छी चीज़ का, अच्छे के लिये।
त्याग बुरी चीज़ का, अच्छे के लिये।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
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