बच्चों के सुख को प्राथमिकता दें या हित को ?
सुख मन के लिए होता है, हित जीवन के लिए।
सुख को प्राथमिकता दी तो उनका अहित होगा, हित को दी तो सुखी भी रहेंगे।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी

(रेनू – नया बाजार मंदिर, ग्वालियर)
अकाउंट में डबल एंट्री होती हैं, लेन-देन की अलग-अलग।
कर्म सिद्धांत में भी ऐसा ही है… जिसने गाली खाई उसके में -ve एंट्री हो गई (यदि सहन नहीं कर पाया तो, सहन कर लिया तो पॉजिटिव एंट्री),
जिसने दी उसके में -ve एंट्री पड़ गई।
गौरव-भोपाल (चिंतन)
ईर्ष्या होती है दूसरों को बढ़ते देखकर, उदास होते हो तो दूसरों की वजह से, उम्मीद करते हो तो वो भी दूसरों से, डर लगता है तो वो भी दूसरों से, क्रोध आता है तो दूसरों की वजह से।
सब कुछ तो दूसरों का है, हमारा अपना क्या है ?
(सुरेश-इन्दौर)

(मंजू रानीवाला)
इतने सहज भी न हो जाना की जानवरों की तरह बिना शर्म के कहीं भी/ कभी भी/ कुछ भी करने लग जाओ।
बच्चों की तरह इतने सरल भी न बन जाना की कोई भी बुद्धू बना जाए।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
सेवा में थे तब पूरी पगार, सेवा-निवृत होने पर आधी।
आज (81 साल के होने पर) पूछते हैं… कैसे हो ?
सेहत/ हालात पेंशन वाले* हैं, पर काम/ खर्चा सेवा के समय जैसा चल रहा है।
चिंतन
* 50% वाले
आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे… “मोक्षमार्ग बाहर है ही नहीं।”
जैसे हवाई जहाज उठने के बाद बाहर दौड़ने में सहायक, पहियों को भी अंदर ले लेता है तभी ऊपर उठता जाता है/ गति आती है।
निर्यापक मुनि श्री संभवसागर जी
दान पर-वस्तु का जैसे धन आदि।
त्याग स्व-वस्तु का जैसे क्रोध आदि (कषाय)।
क्रोध तभी आता है जब मान को धक्का लगता है।
जैसे एक ने कहा… यह काम कर देना, काम न होने पर क्रोध आएगा।
दूसरे ने कहा… सुविधाजनक हो तो यह काम कर देना, काम न होने पर क्रोध नहीं आएगा।
मुनि श्री शैलसागर जी
छाया और अंधकार में फ़र्क़ क्या है ?
अंधकार… प्रकाश का अभाव।
छाया….. प्रकाश की अवरोधित अवस्था।
चिंतन
विहार चल रहा था। मुनि श्री संभवसागर जी 5:50 पर निकले। आचार्य श्री विद्यासागर जी 6:00 बजे।
बहुत देर तक आचार्य श्री पीछे-पीछे चलते रहे।
मिलने पर कहा… “बहुत देर से मैं तुम्हारे शरीर का X-Ray कर रहा था”
बहुत दिनों का साइटिका का दर्द ठीक हो गया। 12 साल से फिर कभी नहीं हुआ।
निर्यापक मुनि श्री संभवसागर जी

(रेनू- नया बाजार मंदिर)
ज्ञान प्राण है
संयत हो तो त्राण*
अन्यथा श्वान
*मुक्ति
आचार्य श्री विद्यासागर जी
आँख वस्तु को बिना छुए ज्ञान प्राप्त करती है। ज्ञानी भी जानता/ देखता है, चीज़ों में involve नहीं होता।
वृद्धावस्था में इंदियाँ जबाब दे देती हैं। बस आँख की तरह दूर से समझो/ अंदर में रहो। सुखी रहोगे, क्योंकि सुख तो अंदर ही है।
आर्यिका श्री स्वस्तिभूषण माताजी
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