Committing yourself is a way of finding out who you are.
A man finds his identity by identifying.
Robert E. Terwilliger
धोखे से कमाये गये धन को पुण्य में लगाने पर पुण्य उसको मिलेगा जिसको धोखा दिया गया था।
गुरु गोविन्द सिंह
संगति…
गंगा का शुद्ध जल भी नाली में गंदा हो जाता है।
चिंतन
शुभ… यानी अशुभ से दूर।
लाभ… यानी फायदा –> संसार में धनादि का (धर्म में आत्मकल्याण का)।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
हम इन्द्रियों का बहुत घमण्ड करते हैं।
कानों से सुने, आँखों से देखे को ही सही मानते हैं।
क्षु. श्री सहजानंद जी
Jainism –> “How to Live” ही नहीं, “How to Die” भी है।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
आचार्य मानतुंग के अनुसार धनवान वह जो अपने धन का उपयोग धनहीनों को धन, पुण्यवानों को आहार दानादि, बराबर वालों को सहयोग प्रदान करता हो।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
बारात के पीछे हार्न बजाने से फ़ायदा कुछ नहीं,
नुकसान –> आकुलता, ध्वनि-प्रदूषण।
बेहतर है नाच लो –> कलुषता कम होगी, न्योछावर राशि में नोट भी मिल जायें।
ब्र. डॉ. नीलेश भैया
आत्मा शरीर के माध्यम से भोग करती है। तभी तो शरीर पर चींटी, अनुभव आत्मा करती है।
आत्मा निकलने के बाद बिच्छू भी काट ले तो अनुभव नहीं।
प्रश्न… फिर मरने पर “राम/ अरिहंत नाम सत्य” क्यों सुनाते हैं ?
मुर्दे को नहीं, ले जा रहे लोगों को सुनाते हैं।
चिंतन
अहिंसा मुनियों के लिये क्योंकि उनके पास अनुकम्पा करने के साधन नहीं होते हैं।
अनुकम्पा तो गृहस्थों के लिये होती है।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
गुरु कोई व्यक्ति नहीं शक्ति हैं। जो हमको कभी नज़रों से, कभी आशीर्वाद से और कभी भावनाओं से बिना कहे/ बिना कुछ करे शक्ति देते रहते हैं।
आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी
जितना कीमती हीरा, उतने ज्यादा कोण।
ऐसे ही जिस व्यक्ति के जितने ज़्यादा दृष्टिकोण, वह व्यक्ति उतना ही ज़्यादा महान।
निर्यापक मुनि श्री वीरसागर जी
जीना और जाना तो निश्चित है।
कैसे जाना/ क्या करके जाना ताकि आगे का जीवन अच्छे से जी सकें, यह हमारे हाथ में है।
चिनाई में पुरानी ईंटें, नई ईंटों की दिशा और दशा निर्धारित करती हैं।
ब्र. (डॉ.) नीलेश भैया
साधना की सीमा क्या होनी चाहिये ?
साध्य की प्राप्ति तक।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
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