कषाय (क्रोध, माम, माया, लोभ) कारण है, पार कार्य।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
लड्डू की सुंदरता/ सुगंधि/ क़ीमत तभी तक, जब तक खाने वाले से संयोग न हो।
बाद में तो दुर्गति ही।
क्षु.श्री सहजानन्द जी
भक्त से भगवान…
भगवान के सामने बोलो/ अनुभव करो… “दासोहम्”।
अगले कदम पर “उदासोहम्” (संसार से)।
अंत में… “सोहम्”।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
नीतिपूर्ण कार्यों को करने से थकान नहीं होती है।
अनीतिपूर्ण कार्यों में ही थकान होती है।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

(P K Jain, Noida)
पागल को ज़बाब देने वाला “डबल पागल”।
आधे पागल (क्रोधादि में) को ज़बाब देने वाला फुल पागल ही तो कहलायेगा ना !
चिंतन
सोलर पैनल जैसे होते हैं गुरु। अपनी Energy ख़ुद पैदा करते रहते हैं। फ़र्क यह है कि इनकी Energy रात/ सोते में भी चार्ज होती रहती है तथा शिष्य रूपी ग्रिड को भी Energy देते रहते हैं।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
जिनको लगता है कि उनके फै़सले रब करेगा,
वे बैठे हैं कि अब करेगा-अब करेगा।
(ब्र. डॉ. नीलेश भैया)
आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे, “पाप मल है, पुण्य जल है। मल धोने के लिये जल आवश्यक है।”
आचार्य श्री समयसागर जी
अपने को दीन मानना जैसे हीरे को काँच मानना।
शुद्ध मानना जैसे ख़दान में पड़े हीरे को तराशा हुआ हीरा मानना।
चिंतन
कृत = किया हुआ।
हन = हँता/ विनाशक।
कृतघ्न = जो किये गये उपकार को नकार दे।
(कमल कांत)

(रेनू- नया बाजार मंदिर)
विचारों की यदि दिशा भटक जाए तो वह विकार बन जाते हैं।
एक बुढ़िया की कुटिया पड़ोसी ने हड़प ली। बुढ़िया ने निवेदन किया कि एक डलिया मिट्टी ले जाने दें ताकि उसकी खुशबू से परिवार सो सके। डलिया भारी थी पड़ोसी को निवेदन किया सिर पर रखवा दें। पड़ोसी उठा नहीं पाया।
बुढ़िया –> एक डलिया मिट्टी का बोझ नहीं उठा पा रहे हो, पूरी जमीन की मिट्टी का बोझ कैसे सहन कर पाओगे !
ब्र. डॉ. नीलेश भैया
पुरुषार्थ पहले या भाग्य ?
सुभाष
भाग्य से ही पुरुषार्थ कर पाते हैं। तब और ज्यादा अच्छा भाग्य बन जाता है,
फिर ज्यादा पुरुषार्थ कर पाते हैं।
जैसे पूँजी (भाग्य) लगाने से व्यवसाय (पुरुषार्थ)।
पूँजी बढ़ती जाती है, साथ-साथ व्यवसाय भी।
चिंतन
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