पागल अपने को पागल नहीं कहता, यही उसका पागलपन है।
हम भी अपने को वह नहीं कहते जो हम हैं, वह कहते हैं जो हम हैं ही नहीं जैसे धनी आदि।

आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी

एक बहन धार्मिक क्रिया के लिए छोटी सी मटकी को नल के नीचे लगाकर नल पूरा खोल देती थीं (ताकि जल्दी भर जाए, पर आधी अधूरी ही भरती थी)। एक दिन दूसरा काम कर रही थी, नल को थोड़ा सा खोला। देखा! मटकी ऊपर तक भर गई थी।

एकता – पुणे

सीख –> उतावली की तो आधे अधूरे रह जाओगे। सब्र का फल पूरा/ मीठा होता है।

चिंतन

भगवान की मूर्ति…. “निरखों अंग-अंग जिनवर के, इनमें झलके शांति अपार।”
अलग-अलग अंगों का अपना-अपना प्रभाव होता है, उनसे अलग-अलग एनर्जी मिलती है।
अलग-अलग समय पर दर्शनों का भी प्रभाव अलग-अलग होता है।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

आत्मा का चिंतन/ परिचय कैसे करें ?
आत्मा के गुणों (श्रद्धा/ ज्ञान/ दयादि) का चिंतन करने तथा इन गुणों को जीवन में उतारने से परिचय होगा।

क्षु. श्री सहजानंद वर्णी जी

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