सब मनुष्यों के जन्म, मरण तथा दुःख समान ही होते हैं।
दुःख समान कैसे ?
क्योंकि सबके दुःखों के कारण “भ्रम” ही होते हैं। जैसे सोते में समुद्र में डूबने से उभरने का उपाय…
जागना/ तत्व ज्ञान।
क्षु. सहजानंद जी (सुख यहाँ)
मौसमी के 6-7 फ़ीट के पेड़ पर हज़ारों फूल लगे। बाद में सैकड़ों छोटी-छोटी मौसमी की गाँठें सी बन गयीं।
चिंता हुई कि ये छोटा सा पेड़ इतनी मौसमियों का बोझ झेल कैसे पायेगा!
3 सप्ताह बाद कुण्डलपुर यात्रा से लौटा, तो देखा, सिर्फ़ 15-20 मौसमी बढ़ रही हैं।
गुरुवर श्री क्षमासागर जी कहते थे, “तुम्हारे कर्म तो बौर जैसे हैं; बहुत हैं। यदि सब एक साथ फलित हो जायें, तो तुम्हारा पाउडर भी नहीं बचेगा!”
पुण्य-क्रियाओं से पाप-प्रकृतियाँ झड़ जाती हैं या/और कम हो जाती हैं।
चिंतन
जीवनोद्देश्य… जिनादेश* पालन
अनुपदेश…..अन्य का उपदेश नहीं
आचार्य श्री विद्यासागर जी
* भगवान का आदेश
मूल पर नज़र न रखना ही बड़ी भूल है।
मूल पर नज़र तभी जाती है जब नज़र शुद्ध हो।
नज़र शुद्ध कैसे हो ?
नज़र = ना + ज़र (धन)। धन का संग्रह करना बुरा नहीं, परिग्रह (उससे ममत्व रखना) बुरा है।
ब्र. डॉ. नीलेश भैया
Boss के Boss तक मेरे मित्र ने मेरे खिलाफ शिकायत की। मैं Boss के पास जाकर दु:खी हुआ।
Boss… ये तो तुम्हारे हित में हुआ है। जितनी जल्दी व्यक्ति का स्वभाव पता लगे उतना अच्छा।
सुनते ही मन शांत।
कहीं अपना स्वभाव पता लग जाय तो कितनी शांति मिलेगी !
चिंतन
(हां ! दो टके की हांडी तो गई पर कुत्ते की जात पहचानी गई… जे.पी.शर्मा-जयपुर)
आपका स्मरण रहे,
संसार का विस्मरण रहे।
गुरु ने मुझे गुरु समय दिया,
लघु बनने के लिये।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
बड़ों के अनुभव पर आधारित कहानी किस्सों से छोटों को आसानी/ रुचि के साथ ज्ञान ग्राह्य हो जाता है। ये आधारित होती हैं धूप, छांव पर।
दुर्दिन, अच्छे दिनों के लिये अच्छी कहानी देने वाले बन जाते हैं ।
लोग प्रश्न नहीं उत्तर चाहते हैं।
ब्र. डॉ. नीलेश भैया
दया तो आत्मा का स्वभाव है, हर जीव में पाया जाता है, अपने बच्चों के प्रति हिंसक जानवरों तक में।
जैसे-जैसे आत्मा विशुद्ध होती जाती है, पहले मनुष्यों पर दया, फिर जानवरों, कीड़े मकोड़ों, अंत में सूक्ष्म जीवों पर भी।
चिंतन
अभक्ष्य खाने वाले को, अभक्ष्य देना दान में नहीं आयेगा।
क्योंकि दान तो स्व-पर हितकारी होता है। अभक्ष्य देने में स्व का अहित तो है ही, “पर” का भी धार्मिक/ आत्मिक स्तर पर अहित होगा।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
सापेक्ष…
तीन मित्र घूमने निकले।
घोंघा कछुए की पीठ पर, शिकायत करता रहा –> धीरे चलो।
साथ में खरगोश को कछुए से शिकायत थी ——> इतना धीरे क्यों चल रहे हो ?
ब्र. डॉ. नीलेश भैया
Good advice is always certain to be ignored, but that’s no reason not to give it.
J. L. Jain (Agatha Christie)
अपने घर को अपना न कहकर भगवान का कहने से घर में गलत काम नहीं हो पायेंगे।
जैसे मन्दिर में नहीं कर पाते।
मोह रूपी छोटा सा कागज़ भी आँख के करीब रखने से, वह पहाड़ जैसे बन जाता है।
जिसके पीछे पूरा संसार ढक जाता है।
सुख यहाँ
ज्ञान दो साधनों से –>
1. वस्तु(अजीव) जगत से… इसमें स्थायीपना होता है सो प्रमाणिक है जैसे आग जलाती है। आजकल इसका आदर बहुत बढ़ गया है।
2. जीव जगत से…इसमें स्थिरता नहीं। आदर घट गया है।
ब्र. डॉ. नीलेश भैया
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