विज्ञान…
जिसमें निरन्तर खोज चालू रहे,
अंतिम निष्कर्ष कभी न मिले।
गुरुवर मुनि क्षमासागर जी
आचार्य श्री विद्यासागर जी सुनाते थे…
क्या हो गया समझ में, मुझको न आता,
क्यों बार-बार मन बाहर दौड़ जाता।
स्वाध्याय ध्यान करके मन रोध पाता,
पै श्वान सा मन सदा मल शोध लाता।
आचार्य श्री समयसागर जी
आचार्य श्री विद्यासागर जी के पास एक किसान ने आकर प्रार्थना की पानी बरसाने का मंत्र दे दो।
आचार्य श्री –> ज़मीन तैयार करो, पुरुषार्थ करो।
15 दिन बाद किसान फिर आया… पानी रोकने का मंत्र बताओ।
दोनो का मंत्र वही है… अपने पुरुषार्थ पर विश्वास करो।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
यदि भगवान से एकत्व स्थापित कर लिया तो वे कभी विभक्त नहीं होने देंगे।
निर्यापक मुनि श्री वीरसागर जी
जैसलमेर में अकाल पड़ा। सेठ जयचंद्र जैन ने हजारों क्विंटल अनाज, घी, तेल, धनादि राजा मानसिंह के कोष में दान दिया। अकाल समाप्त होने पर सेठ जी को पता लगा कि मंदिर पुजारी के २ पुत्र, सेठ के मित्र का पुत्र, भूख से मर गये।
सेठ ने राजा से शिकायत की –> मेरे आसपास तक सहायता नहीं पहुँची।
राजा –> पहले आपको अपने आसपास/ नौकर आदि का ध्यान रखना था।
क्या हम रखते हैं ?
(अनिता जी – शिवपुरी)
संसार की सबसे कम मूल्यवान वस्तु क्या ?
“मैं स्वयं”
कैसे ?
अपने को दीनहीन दिखाते नहीं, पर मानते हैं।
छोटे-छोटे मूल्य की वस्तुओं जैसे धनादि को मूल्यवान मानना ही दर्शाता है कि हम अपने सही है, चश्मे से ज्यादा महत्वपूर्ण है आँख।
ब्र. डॉ. नीलेश भैया
चोर घोड़ा चुरा कर बेचने खड़ा हुआ। कीमत तो मालूम नहीं थी सो बहुत ज्यादा बता रहा था। ग्राहक लौट रहे थे। एक ने कहा ठीक है जरा चाल तो देख लूँ। हाथ का हुक्का चोर को पकड़ा कर घोड़े पर चढ़ा और भाग गया।
पहला खरीददार आया → बिक गया ? कितने में ??
जितने में लिया था, उतने में।
बचत क्या हुई ?
ये पाप का हुक्का।
क्षु. सहजानन्द जी
उत्कृष्टता की तीन श्रेणी* ——> 10, 16, 25% दान देने वाले।
निकृष्टता की भी तीन श्रेणी** –> 90, 84, 75% समय/ ध्यान (भगवान/ गुरु/ शास्त्र को छोड़कर) दूसरों पर लगाने वाले।
चिंतन
* बढ़ते हुए क्रम में
** घटते हुए क्रम में
खाओ-पीओ, चखो मत*।
देखो-भालो, तको मत।
हँसो-बोलो, बको मत।
खेलो-कूदो, थको मत।
मुनि श्री मंगलसागर जी
* बार-बार खाना
Tel University Israel की Study के अनुसार पौधे Ultrasonic frequency में कीड़ों से Interact करते हैं। पानी की कमी/ उखाड़े जाने पर ये आवाज एक मीटर तक Detect की गयी है तथा उनकी आकृति/ रंग भी बदल जाता है।
NDTV- News
आचार्य श्री विद्यासागर जी को बताया –> आप सुबह 3-4 बजे से लेकर रात तक इतनी मेहनत करते हैं, एक ग्लास दूध ले लिया करिये, हम भी मेहनत करने के बाद एक ग्लास दूध लेते हैं।
आ. श्री –> मैं भी लेता हूँ। तुम एक “ग्लास” लेते हो, मैं अनेक “क्लास” लेता हूँ।
आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी
टी.वी. आदि के निमित्त से धर्म खूब हो रहा है,
तो धर्म का ह्रास कैसे और क्यों कहा ?
जितनी धार्मिक क्रियायें हो रही हैं,
उनसे बहुत ज्यादा पाप क्रियायें हो रही हैं।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
हम धनादि/ पुत्रादि से ज्यादा अपने को चाहते हैं। जैसे दर्पण को नहीं, उसमें अपने को देखते हैं, दर्पण को तो निमित्त बना लेते हैं।
क्षु. सहजानन्द जी
श्रावक (गृहस्थ) का पैर घर में, मन बाहर।
श्रमण (साधु) का पैर बाहर, मन घर (अंतरंग) में।
ब्र. डॉ. नीलेश भैया
Pages
CATEGORIES
- 2010
- 2011
- 2012
- 2013
- 2014
- 2015
- 2016
- 2017
- 2018
- 2019
- 2020
- 2021
- 2022
- 2023
- News
- Quotation
- Story
- संस्मरण-आचार्य श्री विद्यासागर
- संस्मरण – अन्य
- संस्मरण – मुनि श्री क्षमासागर
- वचनामृत-आचार्य श्री विद्यासागर
- वचनामृत – मुनि श्री क्षमासागर
- वचनामृत – अन्य
- प्रश्न-उत्तर
- पहला कदम
- डायरी
- चिंतन
- आध्यात्मिक भजन
- अगला-कदम
Categories
- 2010
- 2011
- 2012
- 2013
- 2014
- 2015
- 2016
- 2017
- 2018
- 2019
- 2020
- 2021
- 2022
- 2023
- News
- Quotation
- Story
- Uncategorized
- अगला-कदम
- आध्यात्मिक भजन
- गुरु
- गुरु
- चिंतन
- डायरी
- पहला कदम
- प्रश्न-उत्तर
- वचनामृत – अन्य
- वचनामृत – मुनि श्री क्षमासागर
- वचनामृत-आचार्य श्री विद्यासागर
- संस्मरण – मुनि श्री क्षमासागर
- संस्मरण – अन्य
- संस्मरण-आचार्य श्री विद्यासागर
- संस्मरण-आचार्य श्री विद्यासागर
Recent Comments