समुद्र नहीं तालाब बनो जहाँ शेर भी सिर झुका कर पानी पीने को मजबूर हो जाते हैं।
हम ऐसे तालाब कैसे बनें ?
जीवन में मधुरता/ उदारता लाने पर।
लाभ क्या होगा ?
तब कर्म भी सिर झुका जायेंगे।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

शिष्य… गुरुजी ! मकान की बहुत परेशानी है। कुछ तरकीब बताएँ।
गुरु… एक घड़ा टेढ़ा करके पेड़ पर लटका दें।
अगली साल तक एक मकान बन गया।
गुरु… यह न टोटका था, ना ही आशीर्वाद। तूने घड़ा लटकाया, उसमें चिड़िया ने घर बनाया, उसकी दुआ से तेरा घर बना।

एन.सी.जैन – नोएडा

शिष्य…”गुरु जी! बहुत परेशानियाँ है, नींद भी नहीं आती है, क्या करुँ ?”
100 ऊँट ले जा, जब सब बैठ जाएँ तब सो जाना। वह इधर के ऊँटों को बिठाता तो उधर के खड़े हो जाते।
जीवन की परेशानियाँ भी ऐसी ही हैं। सब शांत कभी नहीं होंगी, कुछ अपने आप शांत होंगी, कुछ करने से, कुछ कभी नहीं। तुम्हें बीच-बीच में शांत होकर सो लेना होगा।

ब्र. (डॉ.) नीलेश भैया

आगरा मंदिर के युवा श्री अमित का संस्मरण…
जब मैं 17-18 साल का था। मंदिर में एक बूढ़ी माताजी ने मुझसे कहा…”मुझे दिखाई नहीं देता। क्या तुम धर्म की पुस्तक (पद्म पुराण) मुझे सुना दिया करोगे ?”
अमित ने पूरा पुराण पढ़कर सुनाया। बाद में पता लगा उन्हें दिखाई ही नहीं देता था बल्कि उन्हें तो बहुत ज्ञान था।
ऐसे ही उन महिला ने कई बच्चों में रुचि पैदा की थी। इस तरह अमित को रुचि पैदा हो गई, आज भी वह बुजुर्गों को पढ़-पढ़ कर सुनाते हैं।
मुझे भी प्रेरणा मिली… बच्चों को सुनाने से बेहतर है, उनसे सुनना।

सोते समय विचार ज्यादा आते हैं/ सताते हैं, ऐसा क्यों ?
पूरे दिन चाबी भरोगे तो रात को अलार्म बजेगा ही। चीजों/ घटनाओं को ज्यादा ममत्व दोगे तो जोर से बजेगा, ज्यादा Disturb करेगा।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

गुस्से वाले मुर्गे के सामने शीशा रख दो। मुर्गा चोंच मार-मार कर खुद को घायल कर लेगा। दूसरा मुर्गा बच जाएगा।
हम भी यदि प्रतिक्रिया न दें तो सामने वाला ख़ुद व ख़ुद जलता रहेगा/ कर्म-बंध करता रहेगा।

चिंतन

बाह्य जगत अंतर जगत
आयु बढ़ती है आयु घटती है
मोह से प्रभावित निर्मोह से
आयु बढ़ने के साथ अभिमान बची आयु के सद्पयोग के भाव

जीवन की सबसे बड़ी गलती… आयु को न देखने की।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

दर्शन के बिना अध्यात्म, जीवन चल सकता है।
बिना अध्यात्म के, दर्शन का दर्शन नहीं।
अध्यात्म स्वाधीन नयन है।
दर्शन पराधीन, उपनयन है (उदाहरण चश्मा)।
दर्शन बताया जा सकता है।
अध्यात्म महापुरुषों के द्वारा ही प्राप्ति का उपाय है।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

जरूरत के चरण…

  1. भूख/ शरीर सम्बन्धित
  2. सुरक्षा
  3. परिवार/ संगति
  4. सम्मान
  5. आत्मनिष्ठ/ आत्मजागृति।

पूर्व के दर्शन में भगवान राजाओं के पुत्र थे सो चार चरण पहले ही पूरे थे, अतः पांचवें चरण तक पहुंचते थे।
पाश्चात के चार ही। इसलिए तुलसीदास जी ने कहा है – “हारे को हरी नाम”

ब्र. (डॉ.) नीलेश भैया

आम के बौर आते ही एक चिड़िया की नई सी आवाज आई। थोड़े अंतराल के साथ आवाज मधुर होती गई। अंत में वह कोयल की मधुर आवाज निकली।
शुरू की आवाज का कारण ?
10 माह का अंतराल, बिना अभ्यास का।

चिंतन

संसार में सुख कम हैं/ कम समय के लिए आते हैं। बढ़ाने का उपाय ?
माँ का पत्र आए, तुरंत ना खोलें;
शुगर की बीमारी हो, चार लड्डू खाने का मन हो, एक लड्डू को धीरे-धीरे चार लड्डू के खाने के समय के बराबर खाएं।
लो! बढ़ गया ना सुख का समय!!

चिंतन

बच्चों को भगवान की “जय” कहलवाओ तो वह कह देता है “दै”। उसकी भाषा माँ ही समझ पाती है।
भगवान की भाषा गुरु ही समझते हैं। जैसे शुद्ध दूध को न पचाने वाले बच्चे को माँ पानी मिलाकर देती है, ऐसे ही गुरु भगवान की भाषा को Dilute करके भक्तों को देते हैं।
गुरु, भगवान और भक्त के बीच की कड़ी हैं।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

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