अपने मकान/ मच्छरदानी में एक छोटे से मच्छर का भी प्रवेश वर्जित है।
अपनी आत्मा में दुश्मनों का भी प्रवेश वर्जित नहीं !
चिंतन
मोह हो तो राग बढ़ता है,
राग हो तो मोह।
क्षु. श्री सहजानन्द जी
पुण्य जल है, पाप मल है।
ऐसे पुण्य का अर्जन करो जो पाप को धो दे।
ऐसे पुण्य का अर्जन, पवित्र परिणामों से होता है।
(ऐसा आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे-)
आचार्य श्री समयसागर जी
सांस ही जीवन है। जितनी अधिक सांस व्यय करेंगे उतना जीवन नष्ट होगा।
यदि प्राणायाम नहीं कर सकते तो लम्बी-लम्बी गहरी सांस लें।
निर्यापक मुनि श्री नियमसागर जी
राग से निवृत्ति के लिये… वानप्रस्थ आश्रम।
द्वेष से निवृत्ति के लिये… वृद्धाश्रम।
(वहाँ अपने को बनाये रखने के लिये द्वेष को कम करते करते समाप्त करना होता है)।
ब्र. डॉ. नीलेश भैया
सत्य प्रकट करने की अगर ज़िद ही है तो अपना सत्य प्रकट करें,
तुम्हारा तुरंत लाभ, देखने वाले प्रभावित होंगे और वे भी प्रेरित होंगे अपना सत्य प्रकट करने के लिए।
मुनि श्री जी
उपलब्धि थोड़े समय का संतोष है,
संतोष हमेशा की उपलब्धि।
मुनि श्री मंगलानन्द सागर जी
पाप के पास के फ़ायदों से अच्छा, दूर के नुकसान देखें।
ब्र. डॉ. नीलेश भैया
विज्ञान…
जिसमें निरन्तर खोज चालू रहे,
अंतिम निष्कर्ष कभी न मिले।
गुरुवर मुनि क्षमासागर जी
आचार्य श्री विद्यासागर जी सुनाते थे…
क्या हो गया समझ में, मुझको न आता,
क्यों बार-बार मन बाहर दौड़ जाता।
स्वाध्याय ध्यान करके मन रोध पाता,
पै श्वान सा मन सदा मल शोध लाता।
आचार्य श्री समयसागर जी
आचार्य श्री विद्यासागर जी के पास एक किसान ने आकर प्रार्थना की पानी बरसाने का मंत्र दे दो।
आचार्य श्री –> ज़मीन तैयार करो, पुरुषार्थ करो।
15 दिन बाद किसान फिर आया… पानी रोकने का मंत्र बताओ।
दोनो का मंत्र वही है… अपने पुरुषार्थ पर विश्वास करो।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
यदि भगवान से एकत्व स्थापित कर लिया तो वे कभी विभक्त नहीं होने देंगे।
निर्यापक मुनि श्री वीरसागर जी
जैसलमेर में अकाल पड़ा। सेठ जयचंद्र जैन ने हजारों क्विंटल अनाज, घी, तेल, धनादि राजा मानसिंह के कोष में दान दिया। अकाल समाप्त होने पर सेठ जी को पता लगा कि मंदिर पुजारी के २ पुत्र, सेठ के मित्र का पुत्र, भूख से मर गये।
सेठ ने राजा से शिकायत की –> मेरे आसपास तक सहायता नहीं पहुँची।
राजा –> पहले आपको अपने आसपास/ नौकर आदि का ध्यान रखना था।
क्या हम रखते हैं ?
(अनिता जी – शिवपुरी)
संसार की सबसे कम मूल्यवान वस्तु क्या ?
“मैं स्वयं”
कैसे ?
अपने को दीनहीन दिखाते नहीं, पर मानते हैं।
छोटे-छोटे मूल्य की वस्तुओं जैसे धनादि को मूल्यवान मानना ही दर्शाता है कि हम अपने सही है, चश्मे से ज्यादा महत्वपूर्ण है आँख।
ब्र. डॉ. नीलेश भैया
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