धर्मात्मा जो सेवकों के प्रति कृतज्ञता महसूस करे, पगार देकर एहसान महसूस करने वाला अधर्मी।
दान/ सहायता लेने वाले से कृतज्ञ महसूस करने वाला धर्मात्मा, बड़ा मानने वाला अधर्मी।
भक्त गुरु के दर्शन करने जाता है, कमभक्त (कमबख़्त/ अभागा) गुरु को अपना दर्शन देने जाते हैं।
चिंतन
बांसुरी में माधुर्य क्यों ?
- उसमें गांठ नहीं होती।
- बांसुरी अपने अंदर कुछ जमा/ छुपाती नहीं।
- बिना बुलवाये बोलती नहीं।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
पाश्चात्य दर्शन -> वस्तु के सुधार से देश/ समाज/ व्यक्ति का सुधार।
भारतीय दर्शन -> व्यक्ति के सुधार से देश/ समाज में सुधार।
ब्र.(डॉ.) नीलेश भैया
दिवाली के दिन घर का कोई बेटा चला जाय/ घर का चिराग़ बुझ जाए तो दिवाली खोटी मानने लगते हैं।
उससे पहले ढेरों दीपक जलाते थे। भूल जाते थे, इस दिन भगवान महावीर भी तो चले गए थे (निर्वाण हुआ था), वे भी तो किसी के बेटे थे !
मुनि श्री मंगलानंद सागर जी
एक धर्म गुरु टापू पर अकेला रह गया। सालों बाद टापू पर एक जहाज पहुँचा। गुरु ने धार्मिक क्रियायों के लिए दो धर्म-स्थल बना लिए थे, एक अपने लिए दूसरा अपने ही धर्म के दूसरे मतावलम्बियों का।
दूसरा क्यों बनाया ?
अपने को याद दिलाने के लिए कि दूसरे स्थल पर मुझे कभी नहीं जाना है।
डॉ.(ब्र.) नीलेश भैया
दीक्षा -> The इच्छा।
The = (दीक्षा ही) सब कुछ।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थसूत्र – 7/25 )
The इच्छा -> सब कुछ देने की इच्छा।
मुनि श्री मंगलसागर जी
दीनता से कर्मबन्ध क्यों ?
क्योंकि दीनता आत्मा का स्वभाव नहीं,
विभाव में जाने से कर्मबन्ध तो होगा ही !
चिंतन
गृहस्थ, साधु को आहार-दान।
साधु, गृहस्थ को ज्ञान-दान।
ज्ञान से अभय-दान भी हो जाता है।
कहा है -> अज्ञान नुकसान करने वाली दवा है।
गुरुकुल में भर्ती होने के लिए बच्चे आए।
प्रश्न पूछा गया: कौन हो तुम ?
उत्तर:
1. नाम/पद, आदि।
2. शुद्ध बुद्ध हूँ।
3. ईश्वरीय तत्त्व हूँ।
सब को मना कर दिया गया।
4. यही जानने तो आया हूँ।
सफल घोषित।
डॉ.(ब्र.) नीलेश भैया
पागल अपने को पागल नहीं कहता, यही उसका पागलपन है।
हम भी अपने को वह नहीं कहते जो हम हैं, वह कहते हैं जो हम हैं ही नहीं जैसे धनी आदि।
आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी

(मंजू रानीवाला)
मकान निर्माण में पुरानी ईंटें (पूर्व का पुरुषार्थ) नई ईंटों (भविष्य) की दिशा/ जमाव निर्धारित करती हैं।
डॉ.(ब्र.) नीलेश भैया
धर्म का अर्थ न जानने वाले/ अर्थ* को अत्यधिक महत्व देने वाले,
अर्थ कमाने में अनर्थ का सहारा लेते हैं।
चिंतन
* Meaning/ Money
विचारों को पकड़ना ऐसा ही है जैसे तराजू में मेढ़कों को तौलना।
क्षु. श्री सहजानंद वर्णी जी
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