एक लघु फिल्म ने बहुतों को बोध कराया…
दो बुज़ुर्ग बैठे तीसरे मित्र का इंतज़ार कर रहे हैं।
5 मिनट बाद….
पहला…वह नहीं आया।
दूसरा.. आएगा।
यही वार्तालाप बार-बार दोहराकर 20 मिनट बाद लिखा आया… आप किसका इंतज़ार कर रहे हैं ? फिल्म तो समाप्त हो चुकी है !

हम किसका इंतज़ार कर रहे हैं ? अपनी फिल्म समाप्त होने से पहले कुछ Generate (शुभ कर्म) क्यों नहीं करते ?
या जो इंतज़ार जीवन भर किया वही आगे भी करना है ?

ब्र.(डॉ.) नीलेश भैया

ईरानी संत चिंतित कि उन्हें भगवान कैसे मिलें !
समुद्र के किनारे छोटा बच्चा भी चिंतित कि समुद्र को प्याली में कैसे भरूँ !!

दोनों चिंतायें एक ही श्रेणी की हैं ।

मुनि श्री मंगलसागर जी

जैसे मंदिर में हम ग़लत न बोल सकते हैं ना ही ग़लत कर सकते हैं।
ऐसे ही यदि हम अपने घर को “भगवान का घर” कहने/ मानने लगें तो घर में भी ग़लत न बोल पायेंगे ना ही ग़लत कर पायेंगे।

बच्चे की आंख में जन्म के समय लाल लेंस लगा दिया। बड़े होकर उसे सब लाल-लाल दिखते थे। बाकी सब को सतरंगी* दुनिया।
गुरु की दृष्टि में संसार में सार नहीं, हमारी दृष्टि में संसार में ही सार है।

ब्र. (डॉ.) नीलेश भैया

* सप्तभंगी

मुनि को हाथी की संज्ञा दी जा सकती है। हाथी को महावत नियंत्रित करता है, मुनि को महाव्रत। नियंत्रित करने वाला अंकुश यदि गिर जाता है तो हाथी ख़ुद उठकर महावत को दे देता है। ऐसे ही मुनि ख़ुद कठोर प्रायश्चित लेकर अपने को नियंत्रित करते हैं।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

हमारी आत्मा ब्रह्म रूप और इसकी बाहरी तत्वों से रक्षा करना ब्रह्मचर्य-धर्म,
रक्षा जागृत रहने से, संसार के रंगीन सपनों को देखते रहने में नहीं।
ब्रह्म की उपासना तथा रक्षा करने वाला ब्रह्म ही है, इसीसे हमारे बल तथा बुद्धि की रक्षा होती है।
जगत का रूप जानने से राग होता है और स्वरूप जानने से संसार कम।
संबंध अच्छाई से, निर्बंध सच्चाई से, सच्चाई और अच्छाई मिल जाए तो भगवान की परछाई बन जाते हैं।

मुनि श्री सौम्य सागर जी महाराज

“कुछ भी मेरा नहीं” आकिंचन्य और इस भाव का आना आकिंचन्य-धर्म।
भीड़ में रहकर अपने नीड़ में रहना आकिंचन्य।
अनुलोम-विलोम में साँस का ग्रहण और त्याग किया जाता है। पर आकिंचन्य ग्रहण और त्याग के ऊपर।
वियोग और विरोध जन्य अभाव आकिंचन्य नहीं उसमें तो अवसाद होता है, अभाव में विनोद और आनंद आकिंचन्य है।

मुनि श्री सौम्य सागर जी महाराज

जीवन में संयम धारण करने के बाद त्याग के भाव आना चाहिए/ आते ही हैं।
दान के लिए धन संग्रह समझदारी नहीं। यह तो ऐसा ही हो गया कि शांति के लिए पहले हम अशांत हों।
शरीर आदि को पर पर कहते हुए भी हम उसमें तत्पर क्यों रहते हैं !
एक डब्बे में सात डंडियाँ टाइट करके भरी हुई हैं, उल्टा करने पर भी गिर नहीं रहीं हैं। लेकिन एक डंडी को हम निकाल देते हैं तब बाकी छह अपने आप पर गिर जाती हैं। उस डंडी का नाम है “धन”, इसका त्याग करते ही, शरीर/ घर/ पत्नी/ संतान/ मित्र/ शत्रु सब अलग होने लगते हैं।
विचार तो करें…यह धन हम पाप से कमा रहे हैं, पापियों के लिए, पाप में लगाने के लिए!
अब तो इसका सदुपयोग कर अपनी समझदारी का परिचय दें।

मुनि श्री सौम्य सागर जी महाराज

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