कषायों को मंद करने के बाद ही सत्य प्रकट होता है और सत्य हाथ से फिसल न जाए उसके लिए संयम रखना पड़ता है/ संयम की बाड़ लगानी पड़ती है।
संयम बांधता नहीं बल्कि हमारी गलत धारणाओं से हमें निर्बंध करता है।
संयम दो प्रकार का… एक इंद्रिय संयम (पांचों इंद्रियों को नियंत्रण में रखना), दूसरा प्राणी संयम (प्राणियों की रक्षा, हमारे द्वारा उनका घात ना हो)।
जिसे अपनी जीभ पर नियंत्रण है, उसका जीवन पर नियंत्रण रहता है।
मुनि श्री सौम्य सागर जी
चार कषायें जब समाप्त या मंद पड़ जाती हैं तब जीवन में सत्य प्रकट होता है।
जो दिखता है वह सत्य नहीं, ना दिखने वाला ही सत्य है। दिखता है उसका फोटो लिया जाता है, जो नहीं दिखता उसका ऐक्स-रे।
नियति ने दो आंखें इसीलिए दीं ताकि हम गहराई/ अनेकांत दृष्टि से सच्चाई को समझ सकें, एक जिव्हा इसलिए ताकि हम सिर्फ सत्य कहें।
कल्पना सत्य नहीं, साक्षात दर्शन सत्य।
मुनि श्री सौम्य सागर जी
लोभ का उल्टा शौच यानी पवित्रता।
जितनी अपेक्षाएं ज्यादा होगीं, उतना लोभ ज्यादा होगा।
जिसके मन में लोभ आ जाए उसके आसपास का वातावरण कुशलहाल होते हुए भी बेहाल हो जाता है जैसे चंद्रमा की चांदनी रात बगैर बादल के अमावस्या बन जाती है.
मुनि श्री सौम्य सागर जी
मायाचारी का उल्टा/ मन वचन काय की एकरूपता आर्जव धर्म है।
एक मासोपवासी(बहुत अंतराल के बाद आहार लेने वाले) मुनिराज तपस्या करके चले गए। उसी स्थान पर एक दूसरे मुनिराज तपस्या करने लगे। लोगों ने समझा वही मासोपवासी मुनिराज हैं और वे जय जयकार करने लगे। दूसरे मुनिराज इस भ्रम को समझ तो गए पर उनके मन में यह भाव आगया कि मैं थोड़े ही मायाचारी कर रहा हूं, इन लोगों ने गलत समझा तो मैं क्या करूं। इस जरा से मायाचारी के भाव से उनका दिगंबरत्व दिगंबर(नग्नता) हो गया और अगले जन्म में वह हाथी बने। माया करने से पशु की काया मिली।
सावधान! यदि हम मायाचारी करेंगे तो अगले जन्म में जानवर बनेंगे। जब कर्मों ने बड़े-बड़े मुनिराजों को नहीं छोड़ा, वे हमको क्या छोड़ेंगे!
मुनि श्री सौम्य सागर जी
(धर्म और गुरु की ना मानना, मान है)
मान का विपरीत,
अपने मान को मान ना देना,
दूसरे के मान से आहत न होना मार्दव धर्महै ।
मुनि श्री सौम्य सागर जी
दसलक्षण धर्म के प्रथम दिवस उत्तम-क्षमा की बधाई,
सबसे क्षमा भाव।
दृष्टि-संयम का पालन करें। लाभ…जीवों की रक्षा, ठोकर न लगना, विकारों का ना आना, आंख की धूल से रक्षा।
अब शेर की दहाड़ हिंसा करने के लिए नहीं, हिंसा करते हुए जीवों को दहलाने के लिए।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (तत्वार्थ सूत्र – 7/14)
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पार्टी आदि में अनर्गल प्रवृत्ति करते समय सुख लगता है, तो ग़लत क्या ?
आपकी प्रवृत्ति से दूसरों को दु:ख/ अशांति, यह ग़लत हुआ/ हिंसा हुई।
ख़ुद की आत्मा का घात होने से अंतरंग हिंसा भी।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्वार्थ सूत्र – 7/14)
10 आमों में एक और मिलाया तो कुल कितने हुए ?
12
कैसे ?
10 + 1 + 1 मेरे पास पहले से था।
हम अपनी-अपनी अपेक्षाओं से निर्णय लेते हैं/ गणित बिठाते हैं, इसलिए हमारा हिसाब गलत हो जाता है।
ब्र. (डॉ.) नीलेश भैया
महावीर मुनि अवस्था में एक गांव में लंबे समय तक ध्यान तप करते रहे। गांव वालों ने घास की झोंपड़ी बना दी। गांव वालों ने देखा की झोंपड़ी को जानवर खा गए। महावीर अभी भी ध्यान में है।
गांव वाले… आपने बचाया क्यों नहीं ?
महावीर… शरीर ही मेरा नहीं, उसकी सुरक्षा का भाव नहीं, तो अन्य की सुरक्षा का भाव कैसे होगा !
ब्र.(डॉ.) निलेश भैया

(रेनू- नया बाजार मंदिर)
सब अपनी-अपनी अपेक्षा से पूर्ण हैं जैसे पानी से भरी छोटी तथा बड़ी बाल्टियाँ।
छोटी बाल्टी में पानी और डालो तो पानी Waste ही होगा, पूर्णता बढ़ेगी नहीं, आपका पुरुषार्थ भी निरर्थक होगा।
चिंतन
एक राजा को घोड़ा बहुत प्यारा था। पर उसकी बुरी आदत से राजा को नीचा देखना पड़ता था। चलते-चलते घोड़े को खाने की चीज दिख जाए तो बस उधर ही चल देता था।
पुराने सईस को बुलाया गया, उसने घोड़े को दौड़ाया जैसे ही वह खाने की ओर बढ़ता सईस कोड़ा मारता, दो-चार कोड़े खाकर उसने यह आदत छोड़ दी।
हमारा मन भी घोड़े की तरह है, संसार की ओर भागे तो तगड़े प्रायश्चित का कोड़ा लगा दें, धीरे-धीरे भागना छोड़ देगा।
ब्र. (डॉ.) निलेश भैया
अकड़ नहीं तो पकड़ (चैंट जाना/ स्वाभिमान को देना) भी नहीं होनी चाहिए।
जिस घर में काम कर रहा हो/ रह रहे हो उसे हल्का, दूसरे घर को बेहतर मानें/ कहे तो नुकसान होगा न !
जिस भगवान के आज/ अभी दर्शन कर रहे हो, उसे ही सर्वोत्तम मानो तभी कल्याण होगा।
चिंतन

(अनीता जैन)
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