एक धर्म गुरु टापू पर अकेला रह गया। सालों बाद टापू पर एक जहाज पहुँचा। गुरु ने धार्मिक क्रियायों के लिए दो धर्म-स्थल बना लिए थे, एक अपने लिए दूसरा अपने ही धर्म के दूसरे मतावलम्बियों का।
दूसरा क्यों बनाया ?
अपने को याद दिलाने के लिए कि दूसरे स्थल पर मुझे कभी नहीं जाना है।

डॉ.(ब्र.) नीलेश भैया

दीक्षा -> The इच्छा।
The = (दीक्षा ही) सब कुछ।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थसूत्र – 7/25 )

The इच्छा  -> सब कुछ देने की इच्छा।

मुनि श्री मंगलसागर जी

गुरुकुल में भर्ती होने के लिए बच्चे आए।

प्रश्न पूछा गया: कौन हो तुम ?

उत्तर:
1. नाम/पद, आदि।
2. शुद्ध बुद्ध हूँ।
3. ईश्वरीय तत्त्व हूँ।

सब को मना कर दिया गया।

4. यही जानने तो आया हूँ।

सफल घोषित।

डॉ.(ब्र.) नीलेश भैया

पागल अपने को पागल नहीं कहता, यही उसका पागलपन है।
हम भी अपने को वह नहीं कहते जो हम हैं, वह कहते हैं जो हम हैं ही नहीं जैसे धनी आदि।

आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी

एक बहन धार्मिक क्रिया के लिए छोटी सी मटकी को नल के नीचे लगाकर नल पूरा खोल देती थीं (ताकि जल्दी भर जाए, पर आधी अधूरी ही भरती थी)। एक दिन दूसरा काम कर रही थी, नल को थोड़ा सा खोला। देखा! मटकी ऊपर तक भर गई थी।

एकता – पुणे

सीख –> उतावली की तो आधे अधूरे रह जाओगे। सब्र का फल पूरा/ मीठा होता है।

चिंतन

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