दान अच्छी चीज़ का, अच्छे के लिये।
त्याग बुरी चीज़ का, अच्छे के लिये।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

सिद्धि के लिये साधना होती है।
लेकिन इसके आगे यदि “प्र” लग गया तो साधना प्रसिद्धि के लिये होने लग जाती है, सिद्धि छूट जाती है

आचार्य श्री विद्यासागर जी

नया व्यक्ति गाँव में पहुँचा।
पूछा –> यहाँ के लोग कैसे हैं ?
मैं ही ईमानदार हूँ (पूरे गाँव के बारे में कथन हो गया)।
दूसरे से पूछा –>
मैं भी ईमानदार हूँ (इसमें भी पूरा कथन हो गया)।

पहले वक्तव्य में घमण्ड, दूसरे में विनम्रता। फ़र्क सिर्फ “ही” और “भी” का है।

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

वृद्धावस्था में इन्द्रियाँ/ दिमाग शिथिल हो जाते हैं। जिन चीज़ों में पहले से रुचि है वही आगे बढ़ जातीं हैं।
यदि खाने में तो खाते रहते, पूजा-पाठ तो वह बढ़ जाता है।
इसलिये शुरु से ही संस्कार अच्छे/ धार्मिक डालें।

चिंतन

अकेला कोई रहना नहीं चाहता।
दो होते ही… तीन…चार।
तालाब में पत्थर फैंकते ही एक, फिर अनेक लहरें उठ जाती हैं।
ऐसे ही विचार एक के बाद अनेक आने लग जाते हैं।

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

माली राजा को रोज़ाना फल लाकर देता था।
राजा एक खाता/ रखता, दूसरा माली के ऊपर फेंकता।
माली कहता “अच्छा हुआ”।
पूछा, ऐसा क्यों कहता है ?
अच्छा हुआ मैं तरबूज नहीं लाता।

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

मोटे पेट वाला व्यक्ति गोल्फ़ खेलने गया।
बॉल पास में रखी तो दिखी नहीं, दूर रखी तो वहाँ स्टिक पहुँचे नहीं।
हमारी भी दूर/ दूसरों की चीज़ों पर दृष्टि जाती है पर पहुँच नहीं।
पास/ अपने पास की चीज़ों पर दृष्टि पहुँचती नहीं। (क्योंकि पेट बड़ा है/ संचय ज्यादा है, सदुपयोग कम)

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

आचार्य श्री विद्यासागर जी से पूछा….
आप अपने को कैसा शिष्य मानते हैं ?
सूखे पत्ते सा।
वो कैसे ?
सुखे पत्ते की अपनी कोई इच्छा/ मंज़िल नहीं होती,
गुरु रूपी हवा जिधर ले जाती है, उधर चला जाता है।

आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी

वैज्ञानिक आइंस्टीन की सालों की मेहनत अचानक प्रयोगशाला में आग लगने से समाप्त हो गयी।
आइंस्टीन…. अच्छा हुआ मेरी गल्तियाँ समाप्त हो गयीं, अब नये सिरे से बेहतर काम शुरु करुँगा।

एकता – पुणे

नदी/ सूरज हमसे सम्बन्ध बनाते नहीं, हम आगे बढ़कर बनाते हैं, प्यास बुझाने/ ताप लेने।
भगवान/ गुरु से हमें ही Connect होना होगा।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

शून्य अंदर/ बाहर से खाली होता है।
जिन‌का जीवन अंदर/ बाहर से खाली होता है, उनके जीवन में पूर्ण विराम लग जाता है। शून्य पूर्णता का प्रतीक है। (जिस अंक के पीछे भी लगा दो तो उसकी कीमत बढ़ जाती है)

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

आहार-दान धर्म है इसलिये देने तथा लेने वाले दोनों का धर्म बढ़ेगा। यदि साधु के पेट भरने का भाव आ जाय तो धर्म नहीं।
ऐसे ही आर्शीवाद जब अभय-दान बन जाता है तब बहुत कारगर बन जाता है। पर काम करेगा अपने से छोटों पर।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

लाड़ से खुशी सुरक्षित, डाँट से हित।
इसीलिये गुरु शिष्य को डाँट लगाकर रखते हैं।
आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे…. पर डाँट इतनी तगड़ी मत लगा देना कि शीशी से दवा निकले ही नहीं(उद्देश्य पूरा होगा ही नहीं)।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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