क्या भगवान भक्तों की ही इच्छा-पूर्ति करते हैं, या जो भी शरण में आता है, उसकी?
भगवान किसी की भी इच्छा-पूर्ति नहीं करते। जो भी विश्वास के साथ उनकी शरण में जाता है, उसकी इच्छायें ही समाप्त हो जाती हैं।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
सामने वाले में अच्छाई दिखे तो उसे सच्चाई मानो (भरोसा, परखकर)।
अपनी अच्छाई के पीछे सच्चाई परखो।
परिवार/ समाज में सच्चाई को गौण कर अच्छाई को प्रमुखता दें।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
कांक्षा का नुक़सान… संसार तथा परमार्थ दोनों में फल पर दृष्टि रहती है सो धर्म/ कर्त्तव्य पर कम हो जाती है।
इससे विशुद्धि/ शांति भी कम हो जाती है।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थसूत्र 7/23)
काँपते हाथों को रोकने के लिये कहते हैं…. “साधो”।
साधु वही जो विचलित होते मन को साध ले।
ब्र. डॉ. नीलेश भैया
रुलाना….
किसी को रुलाने का पाकीज़ा तरीका… हँसाओ इस क़दर कि पानी निकल आये,
हम तो दुश्मन को भी पाकीज़ा सज़ा देते हैं।
हाथ उठाते नहीं, नज़रों से गिरा देते हैं।
डॉ. ब्र. नीलेश भैया
मन्दिर जाना बन्द कर दिया क्योंकि वहाँ झगड़े/ विसंवाद होते हैं।
दुकान/ घर में भी तो होते हैं, वहाँ जाना/ रहना बन्द किया क्या?
मुनि श्री मंगलानन्द सागर जी
देह को तो राख बनना ही है।
तो क्या राख से राग रखना समझदारी होगी !
आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी
दान अच्छी चीज़ का, अच्छे के लिये।
त्याग बुरी चीज़ का, अच्छे के लिये।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
सिद्धि के लिये साधना होती है।
लेकिन इसके आगे यदि “प्र” लग गया तो साधना प्रसिद्धि के लिये होने लग जाती है, सिद्धि छूट जाती है।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
नया व्यक्ति गाँव में पहुँचा।
पूछा –> यहाँ के लोग कैसे हैं ?
मैं ही ईमानदार हूँ (पूरे गाँव के बारे में कथन हो गया)।
दूसरे से पूछा –>
मैं भी ईमानदार हूँ (इसमें भी पूरा कथन हो गया)।
पहले वक्तव्य में घमण्ड, दूसरे में विनम्रता। फ़र्क सिर्फ “ही” और “भी” का है।
ब्र. डॉ. नीलेश भैया
वृद्धावस्था में इन्द्रियाँ/ दिमाग शिथिल हो जाते हैं। जिन चीज़ों में पहले से रुचि है वही आगे बढ़ जातीं हैं।
यदि खाने में तो खाते रहते, पूजा-पाठ तो वह बढ़ जाता है।
इसलिये शुरु से ही संस्कार अच्छे/ धार्मिक डालें।
चिंतन
अकेला कोई रहना नहीं चाहता।
दो होते ही… तीन…चार।
तालाब में पत्थर फैंकते ही एक, फिर अनेक लहरें उठ जाती हैं।
ऐसे ही विचार एक के बाद अनेक आने लग जाते हैं।
ब्र. डॉ. नीलेश भैया
एक विद्यार्थी दूसरे को पीट रहा था।
कारण ?
दूसरे ने गलत जबाब लिखा था, पहला उसकी नकल कर रहा था।
नकल करनी हो तो असल की करो/ सच्चे देव, शास्त्र, गुरु की करो।
माली राजा को रोज़ाना फल लाकर देता था।
राजा एक खाता/ रखता, दूसरा माली के ऊपर फेंकता।
माली कहता “अच्छा हुआ”।
पूछा, ऐसा क्यों कहता है ?
अच्छा हुआ मैं तरबूज नहीं लाता।
ब्र. डॉ. नीलेश भैया
Pages
CATEGORIES
- 2010
- 2011
- 2012
- 2013
- 2014
- 2015
- 2016
- 2017
- 2018
- 2019
- 2020
- 2021
- 2022
- 2023
- 2024
- 2025
- 2026
- News
- Quotation
- Story
- संस्मरण-आचार्य श्री विद्यासागर
- संस्मरण – अन्य
- संस्मरण – मुनि श्री क्षमासागर
- वचनामृत-आचार्य श्री विद्यासागर
- वचनामृत – मुनि श्री क्षमासागर
- वचनामृत – अन्य
- प्रश्न-उत्तर
- पहला कदम
- डायरी
- चिंतन
- आध्यात्मिक भजन
- अगला-कदम
Categories
- 2010
- 2011
- 2012
- 2013
- 2014
- 2015
- 2016
- 2017
- 2018
- 2019
- 2020
- 2021
- 2022
- 2023
- 2024
- 2025
- 2026
- News
- Quotation
- Story
- Uncategorized
- अगला-कदम
- आध्यात्मिक भजन
- गुरु
- गुरु
- चिंतन
- डायरी
- पहला कदम
- प्रश्न-उत्तर
- वचनामृत – अन्य
- वचनामृत – मुनि श्री क्षमासागर
- वचनामृत-आचार्य श्री विद्यासागर
- संस्मरण – मुनि श्री क्षमासागर
- संस्मरण – अन्य
- संस्मरण-आचार्य श्री विद्यासागर
- संस्मरण-आचार्य श्री विद्यासागर
Recent Comments