दीक्षा -> The इच्छा।
The = (दीक्षा ही) सब कुछ।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थसूत्र – 7/25 )
The इच्छा -> सब कुछ देने की इच्छा।
मुनि श्री मंगलसागर जी
दीनता से कर्मबन्ध क्यों ?
क्योंकि दीनता आत्मा का स्वभाव नहीं,
विभाव में जाने से कर्मबन्ध तो होगा ही !
चिंतन
गृहस्थ, साधु को आहार-दान।
साधु, गृहस्थ को ज्ञान-दान।
ज्ञान से अभय-दान भी हो जाता है।
कहा है -> अज्ञान नुकसान करने वाली दवा है।
गुरुकुल में भर्ती होने के लिए बच्चे आए।
प्रश्न पूछा गया: कौन हो तुम ?
उत्तर:
1. नाम/पद, आदि।
2. शुद्ध बुद्ध हूँ।
3. ईश्वरीय तत्त्व हूँ।
सब को मना कर दिया गया।
4. यही जानने तो आया हूँ।
सफल घोषित।
डॉ.(ब्र.) नीलेश भैया
पागल अपने को पागल नहीं कहता, यही उसका पागलपन है।
हम भी अपने को वह नहीं कहते जो हम हैं, वह कहते हैं जो हम हैं ही नहीं जैसे धनी आदि।
आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी

(मंजू रानीवाला)
मकान निर्माण में पुरानी ईंटें (पूर्व का पुरुषार्थ) नई ईंटों (भविष्य) की दिशा/ जमाव निर्धारित करती हैं।
डॉ.(ब्र.) नीलेश भैया
धर्म का अर्थ न जानने वाले/ अर्थ* को अत्यधिक महत्व देने वाले,
अर्थ कमाने में अनर्थ का सहारा लेते हैं।
चिंतन
* Meaning/ Money
विचारों को पकड़ना ऐसा ही है जैसे तराजू में मेढ़कों को तौलना।
क्षु. श्री सहजानंद वर्णी जी
गृहस्थ जो गृह में स्थित हो,
जो स्त्री के साथ रहे*।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
*( जो धर्म के साथ रहे वह श्रावक )
एक बहन धार्मिक क्रिया के लिए छोटी सी मटकी को नल के नीचे लगाकर नल पूरा खोल देती थीं (ताकि जल्दी भर जाए, पर आधी अधूरी ही भरती थी)। एक दिन दूसरा काम कर रही थी, नल को थोड़ा सा खोला। देखा! मटकी ऊपर तक भर गई थी।
एकता – पुणे
सीख –> उतावली की तो आधे अधूरे रह जाओगे। सब्र का फल पूरा/ मीठा होता है।
चिंतन
छोटी सी कोशिश भी बड़े परिणाम ला सकती है।
अरविंद
छोटी सी गलती भी बड़े (वीभत्स) परिणाम ला सकती है।
चिंतन

(रेनू- नया बाजार मंदिर)
भगवान की मूर्ति…. “निरखों अंग-अंग जिनवर के, इनमें झलके शांति अपार।”
अलग-अलग अंगों का अपना-अपना प्रभाव होता है, उनसे अलग-अलग एनर्जी मिलती है।
अलग-अलग समय पर दर्शनों का भी प्रभाव अलग-अलग होता है।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
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