बच्चे की आंख में जन्म के समय लाल लेंस लगा दिया। बड़े होकर उसे सब लाल-लाल दिखते थे। बाकी सब को सतरंगी दुनिया।
गुरु की दृष्टि में संसार में सार नहीं, हमारी में दृष्टि में संसार में ही सार है।

ब्र. (डॉ.) नीलेश भैया

मुनि को हाथी की संज्ञा दी जा सकती है। हाथी को महावत नियंत्रित करता है, मुनि को महाव्रत। नियंत्रित करने वाला अंकुश यदि गिर जाता है तो हाथी ख़ुद उठकर महावत को दे देता है। ऐसे ही मुनि ख़ुद कठोर प्रायश्चित लेकर अपने को नियंत्रित करते हैं।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

हमारी आत्मा ब्रह्म रूप और इसकी बाहरी तत्वों से रक्षा करना ब्रह्मचर्य-धर्म,
रक्षा जागृत रहने से, संसार के रंगीन सपनों को देखते रहने में नहीं।
ब्रह्म की उपासना तथा रक्षा करने वाला ब्रह्म ही है, इसीसे हमारे बल तथा बुद्धि की रक्षा होती है।
जगत का रूप जानने से राग होता है और स्वरूप जानने से संसार कम।
संबंध अच्छाई से, निर्बंध सच्चाई से, सच्चाई और अच्छाई मिल जाए तो भगवान की परछाई बन जाते हैं।

मुनि श्री सौम्य सागर जी महाराज

“कुछ भी मेरा नहीं” आकिंचन्य और इस भाव का आना आकिंचन्य-धर्म।
भीड़ में रहकर अपने नीड़ में रहना आकिंचन्य।
अनुलोम-विलोम में साँस का ग्रहण और त्याग किया जाता है। पर आकिंचन्य ग्रहण और त्याग के ऊपर।
वियोग और विरोध जन्य अभाव आकिंचन्य नहीं उसमें तो अवसाद होता है, अभाव में विनोद और आनंद आकिंचन्य है।

मुनि श्री सौम्य सागर जी महाराज

जीवन में संयम धारण करने के बाद त्याग के भाव आना चाहिए/ आते ही हैं।
दान के लिए धन संग्रह समझदारी नहीं। यह तो ऐसा ही हो गया कि शांति के लिए पहले हम अशांत हों।
शरीर आदि को पर पर कहते हुए भी हम उसमें तत्पर क्यों रहते हैं !
एक डब्बे में सात डंडियाँ टाइट करके भरी हुई हैं, उल्टा करने पर भी गिर नहीं रहीं हैं। लेकिन एक डंडी को हम निकाल देते हैं तब बाकी छह अपने आप पर गिर जाती हैं। उस डंडी का नाम है “धन”, इसका त्याग करते ही, शरीर/ घर/ पत्नी/ संतान/ मित्र/ शत्रु सब अलग होने लगते हैं।
विचार तो करें…यह धन हम पाप से कमा रहे हैं, पापियों के लिए, पाप में लगाने के लिए!
अब तो इसका सदुपयोग कर अपनी समझदारी का परिचय दें।

मुनि श्री सौम्य सागर जी महाराज

“इच्छा निरोध: तप:”,
आचार्य विद्यासागर जी का कहते थे… “अपेक्षा निरोध: तप:।”
शरीर की वयस्कता उम्र से, मन की तप से।
तप से रसायन आदि प्राप्त किया जा सकता है जिससे प्रभावना तो होगी, जग की भलाई भी लेकिन आत्मा को रसमई बनाने के लिए जो प्रताप किया जाता है, उससे जगत का कल्याण।
यदि हर गलती पर बोर्ड में एक कीली लगायें, पश्चाताप होने पर निकाल दें फिर भी जो निशान रह जाते हैं उसको लेकर यदि हम परेशान रहते हैं तो वह होगा सच्चा तप।

मुनि श्री सौम्य सागर जी महाराज

कषायों को मंद करने के बाद ही सत्य प्रकट होता है और सत्य हाथ से फिसल न जाए उसके लिए संयम रखना पड़ता है/ संयम की बाड़ लगानी पड़ती है।
संयम बांधता नहीं बल्कि हमारी गलत धारणाओं से हमें निर्बंध करता है।
संयम दो प्रकार का… एक इंद्रिय संयम (पांचों इंद्रियों को नियंत्रण में रखना), दूसरा प्राणी संयम (प्राणियों की रक्षा, हमारे द्वारा उनका घात ना हो)।
जिसे अपनी जीभ पर नियंत्रण है, उसका जीवन पर नियंत्रण रहता है।

मुनि श्री सौम्य सागर जी

चार कषायें जब समाप्त या मंद पड़ जाती हैं तब जीवन में सत्य प्रकट होता है।
जो दिखता है वह सत्य नहीं, ना दिखने वाला ही सत्य है। दिखता है उसका फोटो लिया जाता है, जो नहीं दिखता उसका ऐक्स-रे।
नियति ने दो आंखें इसीलिए दीं ताकि हम गहराई/ अनेकांत दृष्टि से सच्चाई को समझ सकें, एक जिव्हा इसलिए ताकि हम सिर्फ सत्य कहें।
कल्पना सत्य नहीं, साक्षात दर्शन सत्य।

मुनि श्री सौम्य सागर जी

लोभ का उल्टा शौच यानी पवित्रता।
जितनी अपेक्षाएं ज्यादा होगीं, उतना लोभ ज्यादा होगा।
जिसके मन में लोभ आ जाए उसके आसपास का वातावरण कुशलहाल होते हुए भी बेहाल हो जाता है जैसे चंद्रमा की चांदनी रात बगैर बादल के अमावस्या बन जाती है.

मुनि श्री सौम्य सागर जी

मायाचारी का उल्टा/ मन वचन काय की एकरूपता आर्जव धर्म है।
एक मासोपवासी(बहुत अंतराल के बाद आहार लेने वाले) मुनिराज तपस्या करके चले गए। उसी स्थान पर एक दूसरे मुनिराज तपस्या करने लगे। लोगों ने समझा वही मासोपवासी मुनिराज हैं और वे जय जयकार करने लगे। दूसरे मुनिराज इस भ्रम को समझ तो गए पर उनके मन में यह भाव आगया कि मैं थोड़े ही मायाचारी कर रहा हूं, इन लोगों ने गलत समझा तो मैं क्या करूं। इस जरा से मायाचारी के भाव से उनका दिगंबरत्व दिगंबर(नग्नता) हो गया और अगले जन्म में वह हाथी बने। माया करने से पशु की काया मिली।
सावधान! यदि हम मायाचारी करेंगे तो अगले जन्म में जानवर बनेंगे। जब कर्मों ने बड़े-बड़े मुनिराजों को नहीं छोड़ा, वे हमको क्या छोड़ेंगे!

मुनि श्री सौम्य सागर जी

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