Posted by admin on August 31, 2010 at 11:04 am ·
सम्यग्दॄष्टि की निर्जरा :-
प्रश्न – क्या सम्यग्दॄष्टि जीव, भोग भोगते समय निर्जरा नहीं करता है ?
उत्तर :- चौथे गुणस्थान वाले भोग भोगते समय निर्जरा नहीं करते हैं,
वीतराग सम्यग्दॄष्टि भोग भोगते समय भी निर्जरा करते रहते हैं ।
पं. रतनलाल बैनाड़ा जी
Posted by admin on August 30, 2010 at 10:15 am ·
तीर्थंकर प्रकृति :-
तीर्थंकर प्रकृति का बंध, कठिन तप या ध्यान अथवा बड़े-बड़े उपसर्ग सहने से नहीं होता,
यह तो अपाय/उपाय नाम के धर्मध्यान से होता है ।
Posted by admin on August 29, 2010 at 09:31 am ·
गृहीत मिथ्यात्व :-
गृहीत मिथ्यात्व सभी गतियों में संभव है ।
मनुष्य गति में किया हुआ गृहीत मिथ्यात्व अन्य गतियों में संस्कार लेकर जाता है ।
पं. रतनचंद्र जैन व्यक्तित्व और कृतित्व पेज 106
Posted by admin on August 28, 2010 at 09:12 am ·
प्रतिक्रमण :-
किये हुये दोषों का निराकरण, आलोचना खुद की ।
Posted by admin on August 27, 2010 at 07:33 am ·
काल का प्रभाव :-
किसी भी जगह जैसे कैलाश पर्वत या सम्मेद शिखर के पर्वत की विशुद्धता, भगवान के मोक्ष जाने के बाद एक कोड़ा कोड़ी सागर तक रहती है ।
पं. रतनलाल बैनाड़ा जी
Posted by admin on August 26, 2010 at 06:12 am ·
दर्शन :-
बौद्ध दर्शन – अज्ञान राग संसार का कारण होता है ।
जैन दर्शन – अज्ञान और राग संसार के कारण होते हैं ।
Posted by admin on August 25, 2010 at 11:33 am ·
नामकर्म :-
देवों के शरीर में दीप्ति तथा वर्ण, नामकर्म से आते हैं ।
आदेय नामकर्म से Personality बनती है ।
शुभ नामकर्म से सुन्दरता आती है ।
तैजस से शरीर का तापमान, जठराग्नि तथा कान्ति आती है ।
जिज्ञासा समाधान पेज 87
Posted by admin on August 24, 2010 at 09:33 am ·
रक्षाबंधन :-
जैन धर्म के अनुसार इसके दो महत्व हैं ।
1. सांसारिक – स्त्री के बचपन में पिता संरक्षण देता है, युवावस्था में पति तथा वृद्धावस्था में बच्चे संरक्षण देते हैं ।
लेकिन भाई अपनी बहन को तीनों अवस्था में संरक्षण देता है ।
2. धर्म के क्षेत्र में यह श्रमण और श्रावकों के प्रेम तथा संरक्षण का त्यौहार है ।
श्रावक अपनी सांसारिक उपलब्धियों से साधु तथा धर्म की रक्षा करता है, वहीं साधु धर्म के द्वारा श्रावकों की रक्षा करते हैं ।
उज्जैनी नगरी में बाली और उनके मित्र मुनिराज से शास्त्रार्द्ध में हार गये और उनको रात को मारने गये, देवों ने उनको कीलित कर दिया, राजा ने देश निकाला दे दिया ।
बाली आदि पद्म राजा के राज्य में मंत्री बन गये, वहीं अकंपनाचार्य उन मुनिराज तथा अन्य 700 मुनियों को लेकर पधारे, बाली ने पद्म राजा से अपना पुराना वचन मांगा और 7 दिन के लिये राज्य ले लिया ।
बाली ने बदले की भावना से 700 मुनियों के आसपास आग लगवा दी जिसे विष्णुकुमार मुनि ने अपनी विक्रिया ऋद्धि से 52 अंगुल के ब्राम्हण का रूप रखकर बाली से 3 कदम जमीन मांगी, वरदान मिलने पर विक्रिया से उन्होंने अपना शरीर बहुत बढ़ा कर लिया, दो कदम में पूरा राज्य नाप लिया और तीसरा कदम बाली की पीठ पर रखा और इस तरह 700 मुनियों का उपसर्ग समाप्त हुआ ।
अग्नि और धुयें की वजह से मुनिराजों के गले खराब हो गये थे इसलिये इस पर्व पर मुलायम सेवैंयों की खीर बनाकर उपसर्ग निवारण को याद किया जाता है ।
यह कथा मल्लिनाथ भगवान के समकालीन है ।
यह अनास्था और आस्था की पराकाष्ठा का पर्व है ।
Posted by admin on August 23, 2010 at 01:04 pm ·
दान/त्याग :-
दान व्यवहार है ।
त्याग निश्चय है ।
श्री विमल चौधरी
Posted by admin on August 22, 2010 at 01:33 pm ·
भगवान का ज्ञान :-
सर्वज्ञ के ज्ञान का अनंतवां भाग तथा असंख्यात भाग ही आज उपलब्ध है ।
यह दर्शाता है कि सर्वज्ञ का ज्ञान कितना विशाल होता है
क्षु. श्री जिनेन्द्र वर्णी जी (शांतिपथ प्रदर्शक)
Posted by admin on August 21, 2010 at 12:33 am ·
निगोदिया शरीर :-
पॄथ्वीकायिक, जलकायिक, वायुकायिक, अग्निकायिक, केवली, आहारक, देव तथा नारकियों के शरीर निगोदिया जीवों से रहित होते हैं ।
Posted by admin on August 20, 2010 at 11:22 am ·
हेय/उपादेय :-
वनस्पतिकाय जीव प्राण वायु Oxygen को तो छोड़ देता है और ख़राब Gas यानि Carbon Dioxide को ग्रहण करता है ।
वैसे यदि हम हेय को ग्रहण करते रहेंगे और उपादेय को छोड़ते रहेंगे तो अपना भविष्य/अगला जन्म वनस्पतिकाय में होने की सम्भावना हो जायेगी ।
चिंतन
Posted by admin on August 19, 2010 at 10:36 am ·
भगवान बाहुबली की लतायें :-
केवलज्ञान होने के बाद भगवान बाहुबली की लतायें हट गयीं थीं क्योंकि केवलज्ञान अवस्था में उपसर्ग नहीं रहता है ।
Posted by admin on August 18, 2010 at 10:35 am ·
मोक्ष सप्तमी :-
इस वर्ष यह 16 अगस्त को पड़ी थी,
भगवान पार्श्वनाथ इस दिन श्री सम्मेद शिखर जी से मोक्ष पधारे थे ।
Posted by admin on August 17, 2010 at 03:11 pm ·
देशना लब्धि :-
देशना देने वाले आचार्य आदि की उपलब्धि को और उपदेश के अर्थ के ग्रहण, धारण तथा विचारण को देशना-लब्धि कहते हैं ।
पं. रतनचंद्र जैन व्यक्तित्व और कृतित्व पेज 107
Posted by admin on August 16, 2010 at 03:01 pm ·
समाधि मरण :-
मरण के समय समाधि जैसे भाव रहें ।
Posted by admin on August 15, 2010 at 10:40 am ·
समाधि :-
1. वचन का त्याग कर, वीतराग भाव से आत्मा को ध्याना ।
2. संयम, नियम, तप, धर्मध्यान और शुक्लध्यान से आत्मा को ध्याना ।
3. विकल्पों का नाश होना ।
4. मन को एकाग्र करना शुभोपयोग या शुद्धोपयोग में लगाना ।
5. पर्यायवाची-समाधान, साम्य, योग, निरोध ।
6. ध्येय और ध्याता का एकीकरण ।
जैनेन्द्र सिद्धांत कोश – 4/337
Posted by admin on August 14, 2010 at 10:04 am ·
सम्यग्दृष्टि :-
जो अपने परिणामों के प्रति सचेत है ।
Posted by admin on August 13, 2010 at 09:37 am ·
चक्रवर्ती के रक्षक देव :-
14 रत्नों और 9 निधियों को 1, 1 हजार देव रक्षा करते हैं,
तथा 32 हजार देव चक्रवर्ती की सेवा में रहते हैं । इस तरह कुल 55 हजार रक्षक देव होते हैं ।
Posted by admin on August 12, 2010 at 09:25 am ·
श्रावक :-
‘श्रा’ – श्रद्धावान
‘व’- विवेकवान
‘क’ – क्रियावान
Posted by admin on August 11, 2010 at 10:11 am ·
Jain TV Channel :-
A new TV Channel named PARAS has been started recently. It shows all the programmers of Jain Dharm only including daily Abhishek, Pathshala & Muni Aahar also.
Posted by admin on August 10, 2010 at 10:42 am ·
आहार की योग्यता :-
क्या कोई ड़ाक्टर Delivery कराकर आहार दे सकता है ?
नहीं, उसे एक दिन का सूतक लगेगा, उस दिन वह आहार नहीं दे सकता ।
पूजा भी नहीं कर सकता ।
सुबह पहले पूजा/आहार कराकर Delivery आदि करा सकते हैं ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी ( पं. रतनलाल बैनाड़ा जी)
Posted by admin on August 9, 2010 at 03:45 am ·
मोक्ष की योग्यता :-
चौथे काल में पैदा होकर पांचवें काल से जीव मोक्ष गये हैं पर हुंड़ावसर्पिणी के प्रभाव से ही,
हुंड़ावसर्पिणी के अलावा पांचवें काल से मोक्ष नहीं जाते ।
Posted by admin on August 8, 2010 at 10:10 am ·
महावीर भगवान के बाद श्रुतकेवली :-
महावीर भगवान के निर्वाण के 62 वर्षों तक केवलज्ञानी भरतक्षेत्र में रहे ।
तदनन्तर आचार्य श्री विष्णु, श्री नन्दि, अपराजित, गोवर्धन और भद्रबाहु श्रुतकेवली हुये ।
गणधर भी श्रुतकेवली होते हैं,
किन्तु श्रुतकेवली से गणधर का स्थान ऊँचा होता है,
अत: वे गणधर के नाम से प्रसिद्ध होते हैं ।
Posted by admin on August 7, 2010 at 12:04 pm ·
केवलज्ञान और छिन्न भिन्न शरीर :-
केवलज्ञान होने पर छिन्न भिन्न शरीर पूर्ववत् पूर्ण हो जाता है,
जिनेन्द्र भगवान का शरीर सर्वागम् ही होता है ।
Posted by admin on August 6, 2010 at 11:31 am ·
गणधर :-
श्री धवला जी के अनुसार गणधर गृहस्थ अवस्था में ही जब समवशरण में उपस्थित रहते हैं तब वे भगवान की वाणी सुनकर मुनिव्रत धारण करके गणधर बनते हैं ।
Posted by admin on August 5, 2010 at 10:14 am ·
पंच परमेष्ठी स्तवन :-
पंच परमेष्ठी स्तवन कैसे करें ?
विदेह क्षेत्र में साक्षात विराजमान अरहंत भगवंतो को,
सिद्धालय में साक्षात विराजमान सिद्ध भगवंतो को,
तथा अढ़ाईद्वीप में साक्षात विराजमान आचार्यों, उपाध्यायों तथा समस्त साधूओं को मेरा बारंबार नमस्कार है ।
बाई जी
(इससे पंच परमेष्ठीयों को Visualize करेंगे, श्रद्धा बढ़ेगी, Imaginary नहीं मानेंगे ।)
Posted by admin on August 4, 2010 at 10:12 pm ·
दर्शन :-
महासत्ता को स्वीकारना ।
बाई जी
( महासत्ता = वह वस्तु जो Exist करती है । )
Posted by admin on August 3, 2010 at 12:15 pm ·
चित्त :-
आत्मा के चैतन्य विशेष रूप परिणाम ।
सम्यग्दर्शन पेज 251
Posted by admin on August 2, 2010 at 09:44 am ·
समिति :-
पैर रखते ही पाप लगता है,
और आंख उठाते ही जहर चढ़ता है ।
त्रस जीवों की रक्षा के लिये तथा रागद्वेष से बचने के लिये ही समितियों का पालन आवश्यक है ।
Posted by admin on August 1, 2010 at 09:40 am ·
मोक्ष :-
1. भाव मोक्ष – आत्मा के परिणाम जो बंधनों के क्षय में कारण हैं ।
2. द्रव्य मोक्ष – आत्मा से समस्त बंधनों का दूर हो जाना ।
क्षु. श्री जिनेन्द्र वर्णी जी कहते थे – अंतरंग और बाह्य क्षोभ से रहित आत्मा की पूर्ण शांत दशा ही मोक्ष है ।
सम्यग्दर्शन – पेज 251