Posted by admin on September 28, 2010 at 07:50 am ·
आहार :-
मुनियों के आहार में सबसे महत्वपूर्ण है विधि,
वे परीक्षा लेते नहीं, देते हैं ।
दूसरों को कठिनाई में ड़ालते नहीं, अपने को कठिनायों की आदत ड़ालते हैं ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
Posted by admin on September 27, 2010 at 09:50 pm ·
हिंसा :-
क्या श्रावकों के लिये अल्प हिंसा मान्य है ? क्योंकि अणुव्रतों में विरोधी, आरंभिक और औद्धोगिक हिंसा का नियम नहीं है ।
नहीं, यह अहिंसा की दिशा में पहला प्रयत्न है ।
आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी
Posted by admin on September 25, 2010 at 10:50 am ·
भगवान :-
भगवान ना दीक्षा देते हैं ना शिक्षा, इसलिये आचार्य पदवी धारण नहीं करते ।
ना सुनना, ना सुनाना ।
बोलना तथा सुनना तो साधारण मनुष्य की कमजोरी है ।
वे शरीर चलाते नहीं, चलता रहता है ।
शरीर का Petrol अलग है, आत्मा का अलग ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
Posted by admin on September 23, 2010 at 11:01 am ·
क्षमापर्व :-
- खम्मामि सव्वजीवाणां, सव्वे जीवा खमन्तु मे ।
मैं पहले सब जीवों को क्षमा करता हूँ और अपेक्षा रखता हूँ कि सब जीव मुझे भी क्षमा करें ।
- जैसे अपने अपराध के लिये दूसरों से क्षमा चाहते हैं क्या दूसरे से अपराध होने पर ऐसी ही क्षमा हम अपने भीतर भी धारण नहीं कर सकते ?
मुनि श्री क्षमासागर जी
Posted by admin on September 22, 2010 at 10:22 am ·
उत्तम ब्रह्मचर्य
- जब हम आत्मानुराग से भर गये हों, देहासक्ति से ऊपर उठ गये हों वहीं ब्रह्मचर्य है ।
- परिणामों की अत्यंत निर्मलता का नाम ब्रह्मचर्य है ।
मुनि श्री क्षमासागर जी
Posted by admin on September 21, 2010 at 11:02 am ·
उत्तम आकिंचन्य :-
अब कुछ करना नहीं,
अब तो भावना और उपाय/साधना के फल आने शुरु हो गये, भरेपन का भाव आने लगा ।
सहारे की भावना बुरी है, सहारा देना और लेना बुरा नहीं ।
असली परीक्षा तो अभाव में ही होती है।
एक साधू को राजा ने अपने महल में सुलाया, सुबह पूछा-नींद कैसी आयी?
साधू- कुछ तेरी जैसी, कुछ तेरी से अच्छी। (आरामदायक, पर आदत नहीं डाली)
मुनि श्री क्षमासागर जी
Posted by admin on September 20, 2010 at 11:02 am ·
उत्तम त्याग
- परिग्रह को नियन्त्रित करने का नाम ही दान है । देने वाला लेने वाले को अपने से बड़ा मानता है तब वास्तव में त्याग धर्म सफल होता है ।
मुनि श्री क्षमासागर जी
Posted by admin on September 19, 2010 at 11:02 am ·
उत्तम त्याग
- अवगुणों को छोड़ने का मन बना लें, उन्हें ग्रहण न करें, इसी का नाम त्याग है ।
मुनि श्री क्षमासागर जी
Posted by admin on September 18, 2010 at 11:02 am ·
उत्तम तप :-
- विषय-भोग जीवन को मुश्किल में ड़ालते हैं, तपस्या मुश्किल में नहीं ड़ालती । तपस्या तो जीवन को आसान बना देती है ।
- जिसके मन में निरन्तर इच्छाएँ उठ रही हैं उसका मन कभी नहीं भरता ।
मुनि श्री क्षमासागर जी
Posted by admin on September 17, 2010 at 02:56 pm ·
उत्तम संयम :-
- अपने मन-वचन और इन्द्रियों को संयमित कर लेना, नियमित कर लेना, नियन्त्रित कर लेना, इसी का नाम संयम है ।
- यदि हमने अपने जीवन में सत्य-ज्योति हासिल कर ली है तो हमारा दायित्व है, हमारा कर्तव्य है कि हम उस पर संयम की एक चिमनी भी रख दें जिससे वह सच्चाई की ज्योति कभी बुझ नहीं पाये ।
मुनि श्री क्षमासागर जी
Posted by admin on September 16, 2010 at 10:44 am ·
उत्तम सत्य :-
- जिसका मन जितना सच्चा होगा उसका जीवन भी उतना ही सच्चा होगा ।
- जीवन उन्हीं का सच बनता है जो कषायों से मुक्त हो जाते हैं ।
मुनि श्री क्षमासागर जी
Posted by admin on September 15, 2010 at 10:36 am ·
उत्तम शौच ( लोभ न करना ) :-
- अपन आनन्द लें उस चीज़ का जो अपने को प्राप्त है ।
- जो अपने पास है वह नहीं दिखता, जो दूसरों के पास है हमें वह दिखता है ।
मुनि श्री क्षमासागर जी
Posted by admin on September 14, 2010 at 10:30 am ·
उत्तम आर्जव ( कपट नहीं करना ) :-
- जीवन में उलझनें दिखावे और आड़म्बर की वज़ह से हैं ।
- कृत्रिमता का कारण है – हम अपने को वैसा दिखाना चाहते हैं जैसे हम हैं नहीं ।
मुनि श्री क्षमासागर जी
Posted by admin on September 13, 2010 at 10:28 am ·
उत्तम मार्दव ( मान नहीं करना ) :-
- दूसरों के गुणों में अगर हम आह्लाद महसूस करते हैं तो मानियेगा हमारे भीतर मृदुता-कोमलता आनी शुरू हो गयी है।
- तृप्ति मान-सम्मान से भी नहीं मिलती बल्कि मान-सम्मान मिलने के साथ हमारे भीतर जो कृतज्ञता और विनय आती है उससे तृप्ति मिलती है ।
मुनि श्री क्षमासागर जी
Posted by admin on September 12, 2010 at 10:22 am ·
उत्तम क्षमा :-
- जो जितना सामर्थ्यवान होगा वह उतना क्षमावान भी होगा ।
जो जितना क्रोध करेगा वह उतना ही कमजोर होगा ।
शिकायत :-
कागज की किश्ती
कुछ देर
लहरों से खेली
फिर ड़ूब गई
इसे शिकायत है कि
किनारों ने इसे धोखा दिया ।
मुनि श्री क्षमासागर जी
Posted by admin on September 11, 2010 at 11:10 am ·
पयुर्षण पर्व :-
- पयुर्षण घाटी है, इसमें चढ़ाई कठिन होती है, साइकिल से भी उतर के चलना पड़ता है ।
इसके बाद जीवन में ढ़लान आ जायेगा, जीवन सरल हो जायेगा ।
- पयुर्षण यानि परिधि में ऊषण (गर्मी) ।
ताकि विशुद्ध बन जाओ ।
भादौं के 30 दिनों में 32 पर्व आते हैं ।
जैसे – सोलह कारण, दशलक्षण, सुगंध दशमी, अनंत चौदस, भगवान के कई कल्याणक आदि ।
- पयुर्षण पर्व है ।
पर्व ढ़ाई अक्षर का होता है, बहुत सारे अच्छे शब्द ढ़ाई अक्षर के ही हैं जैसे – धर्म, संत, क्षमा, प्रेम आदि ।
पर्व में वैराग्य है, इसे त्यौहार की तरह ना मनायें, क्योंकि त्यौहार में राग है ।
पर्व अकृत्रिम हैं, त्यौहार कृत्रिम हैं ।
पर्व से आत्मरंजन होता है और त्यौहार में मनोरंजन ।
पर्व में ‘प’ पापों के लिये, ‘र’ रगड़ने के लिये तथा ‘व’ विसर्जन के लिये होता है ।
दीवाली पर तो दीवारों की सफाई होती है,
पर्व में आत्मा की पवित्रता,
भादौं में भद्रता ।
ये 10 धर्म, 10 प्राणों की रक्षा के लिये हैं ।
हमारे दस लक्षणों को उभारने के लिये हैं ।
मुनि श्री सौरभसागर जी
Posted by admin on September 10, 2010 at 11:29 am ·
पयुर्षण :-
वो सुबह का भक्तामर
वो शाम का प्रतिक्रमण
वो संतों का प्रवचन
वो रात्रि भोजन का त्याग
वो जैन धर्म की धूम
और 10 दिन के पर्युषण
Coming Soon……….
Posted by admin on September 09, 2010 at 10:18 am ·
आचार्य कुन्द्कुन्द :-
आप आचार्य जिनचन्द्र के शिष्य थे तथा आचार्य उमास्वामी आपके शिष्य थे ।
जैनेन्द्र सिद्धांत कोश – भाग 2
Posted by admin on September 07, 2010 at 02:16 pm ·
जन्माभिषेक :-
इंद्र को शंका हुयी कि छोटा सा बच्चा इतने बड़े बड़े 1008 कलशों का पानी कैसे सहन करेगा !
भगवान बालक ने जरा सा अंगूठा दबाया और इंद्र हिलने लगा ।
(बाकि देव नहीं हिले क्योंकि संदेह इंद्र को ही हुआ था, संदेह भी ज्ञानी को ही होता है )
वह भूल गया था कि तीर्थंकर बालक बोल नहीं सकते पर अच्छों-अच्छों की बोलती बंद कर सकते हैं ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
Posted by admin on September 06, 2010 at 11:48 am ·
सिद्ध/अरहंत :-
सिद्ध भगवान – पारदर्शी कांच हैं ।
अरहंत भगवान – कांच के पीछे चांदी की पोलिश वाले हैं ।
Posted by admin on September 05, 2010 at 11:41 am ·
कषाय :-
क्रोध, मान, माया, लोभ क्रम-क्रम से ही जाते हैं ।
Posted by admin on September 04, 2010 at 10:33 am ·
लिपिबद्ध-ग्रंथ :-
पहला लिपिबद्ध-ग्रंथ है “श्री कसाय पाहुड़”
इसके रचियता थे – आचार्य श्री गुणधर जी ।
दूसरा लिपिबद्ध-ग्रंथ है “श्री षट्खंड़ागम”
इसके रचियता थे – आचार्य श्री पुष्पदंत और भूतबली जी ।
श्री रतनलाल बैनाड़ा जी
Posted by admin on September 03, 2010 at 09:26 am ·
पुरुषार्थ :-
बीमारी में औषधि का सेवन करने से यानि पुरूषार्थ करने से,
उन कर्मों में शांति आती है, जो बीमारी का कारण हैं ।
श्री धवला जी ( स्याद्वाद )
Posted by admin on September 02, 2010 at 09:17 am ·
सीमा :-
अपरिग्रह में वस्तुओं की सीमा के बारे में तो बहुत कहा जाता है,
पर कषायों की सीमा के बारे में हम नहीं सोचते ।
Posted by admin on September 01, 2010 at 12:47 pm ·
गंधोदक :-
भगवान का स्नान किये हुये जल को माथे पर लगाते समय,
ऐसा अनुभव करें कि, आप भगवान को प्रत्यक्ष छू रहे हैं ।