Posted by admin on August 29, 2011 at 11:24 am ·
अनुयोग :-
प्रथमानुयोग : समझाने के लिये ।
करुणानुयोग : अपने को समझने के लिये ।
चरणानुयोग : अपने को चलाने के लिये ।
द्रव्यानुयोग : अपने तक पहुँचने के लिये ।
मुनि श्री विभवसागर जी
Posted by admin on August 26, 2011 at 10:16 am ·
केशलोंच : –
केश सौंदर्य का प्रतीक,
दिगम्बर मुनि की पहचान केशलोंच।
केशलोंच करते समय, देखते समय तुरंत भावनाओं में भेद-विज्ञान, तप, परिषहजय के भाव आते हैं, जैसे cash-लोंंच/ Cash Transaction हो रहा हो ।
Posted by admin on August 24, 2011 at 10:59 am ·
भोग :-
भोग की वस्तु पुण्य से मिलतीं हैं ।
भोग की वस्तु छोड़ना निर्जरा है ।
भोग को भोगना पुण्य का क्षय करना है;
जैसे पेड़ को काट-काट कर काम में ले लोगे तो उस पर फल (मोक्ष) कैसे लगेंगे ?
Posted by admin on August 23, 2011 at 06:17 pm ·
विनय :-
शास्त्र खोलने से पहले मंगलाचरण करें, पढ़ने के बाद बंद करके स्तुति करके यथास्थान रखें ।
शास्त्र/माला नाभि के ऊपर रखें ।
वरना ज्ञानावरणी का बंध होगा ।
Posted by admin on August 20, 2011 at 10:12 am ·
विज्ञान/ वीतराग-विज्ञान :-
विज्ञान – संसार को जानता है/ खोज करता है।
वीतराग-विज्ञान – आत्मा को जानता है/ खोज करता है।
Posted by admin on August 19, 2011 at 10:56 am ·
क्षयोपशम/ क्षय/ उपशम :-
क्षयोपशम – आंशिक रूप से प्रकटीकरण।
क्षय – पूर्ण प्रकटीकरण।
उपशम – पूर्ण पर अस्थाई प्रकटीकरण।
Posted by admin on August 13, 2011 at 10:24 am ·
रक्षाबंधन:-
उज्जैनी नगरी में बाली और उनके मित्र मुनिराज से शास्त्रार्द्ध में हार गये और मुनि रात को मारने गये, देवों ने उनको कीलित कर दिया, राजा ने देश निकाला दे दिया ।
बाली आदि पद्म राजा के राज्य में मंत्री बन गये, वहीं अकंपनाचार्य उन मुनिराज तथा अन्य 700 मुनियों को लेकर पधारे, बाली ने पद्म राजा से अपना पुराना वचन मांगा और 7 दिन के लिये राज्य ले लिया ।
बाली ने बदले की भावना से 700 मुनियों के आसपास आग लगवा दी जिसे विष्णुकुमार मुनि ने अपनी विक्रिया ऋद्धि से 52 अंगुल के ब्राम्हण का रूप रखकर बाली से 3 कदम जमीन मांगी, वरदान मिलने पर विक्रिया से उन्होंने अपना शरीर बहुत बढ़ा कर लिया, दो कदम में पूरा राज्य नाप लिया और तीसरा कदम बाली की पीठ पर रखा और इस तरह 700 मुनियों का उपसर्ग समाप्त हुआ ।
अग्नि और धुयें की वजह से मुनिराजों के गले खराब हो गये थे इसलिये इस पर्व पर मुलायम सेवैंयों की खीर बनाकर उपसर्ग निवारण को याद किया जाता है ।
यह कथा मल्लिनाथ भगवान के समकालीन है ।
यह अनास्था और आस्था की पराकाष्ठा का पर्व है ।
Posted by admin on August 09, 2011 at 10:02 am ·
प्रवृत्तिआत्मक/ निवृत्तिआत्मक क्रियायें :-
प्रवृत्तिआत्मक क्रियायें प्राय: सामूहिक और निवृत्तिआत्मक क्रियायें व्यक्तिगत होतीं हैं ।
गुरू श्री क्षमासागर जी
Posted by admin on August 08, 2011 at 11:27 am ·
सम्यग्दृष्टि :-
यह दृष्टि है तो छोटी सी चिंगारी, पर इससे कर्म के बड़े बड़े गठ्ठर एक क्षण में भस्म हो जाते हैं ।
Posted by admin on August 06, 2011 at 10:02 am ·
आत्मिक सुख :-
संसारी जीव सुखों का वैसे ही अंदाजा लगाते हैं जैसे चक्रवर्ती के सुखों का अंदाजा भील लोग लगाते हैं कि, चक्रवर्ती राजा हर समय गुड़ खाता रहता होगा ।
Posted by admin on August 04, 2011 at 11:36 am ·
परिमाण :-
100-200 वर्ष पहले पं. दौलतराम जी तथा भैया भगवती प्रसाद जी हुए थे ।
वे 16 रु. की बिक्री से 1 रु. कमाने के बाद दुकान बंद करके मंदिर में बैठकर धर्म ध्यान करने लगते थे ।
Posted by admin on August 03, 2011 at 11:20 am ·
संसार मार्ग /मोक्ष मार्ग :-
संसार मार्ग – बाहर दृष्टि होना ।
मोक्ष मार्ग – अंदर दृष्टि होना ।
सम्यग्दर्शन
Posted by admin on August 01, 2011 at 11:36 am ·
कषायों में हेय/उपादेय :-
उपादेय – प्रशस्त लोभ,
हेय – क्रोध, मान, माया, अप्रशस्त लोभ।
पं. रतनलाल बैनाड़ा जी