Month: January 2022
ध्यान
ध्यान कल्पना ही तो है – सिद्ध, अरहंत, आत्मादि की; कैसा स्वरूप होगा आदि ! ऐसा ध्यान करते-करते एक दिन तद्-रूप भी होने की संभावना
अज्ञान
बंद आँख में अंधेरा सुहाना लगने लगता है, आँख खुलने पर पता लगता है कि क्या-क्या खोया ! मुनि श्री प्रमाणसागर जी
अनर्थदंड
रावण 16 हजार रानियों को भोगता था, पर पापी नहीं; सीता पर बुरी दृष्टी डाली तो पापी – अनर्थदंड। जो भोजन मिलना नहीं, उसका मन
संसार
संसार/मिथ्यादर्शन का Test – मंदिर जा जाकर/धार्मिक क्रियायें करते-करते बोर होना/थकना/ऊबना। धार्मिक क्रियाओं से सम्यग्दृष्टि का आनंद/उत्साह बढ़ता है। मुनि श्री सुधासागर जी
गोत्र / कुल
मुनिराज उच्च-कुलीन से आहार लेते हैं, उच्च-गोत्र से लेने का नियम नहीं, वरना देवता तो उच्च-गोत्री ही होते हैं; पर उनसे आहार नहीं लिया जाता।
मनुष्य
हाथी लाख का, मरे तो सवा लाख का; मनुष्य नाक का, मरे तो ख़ाक का; पर मानता है अपने को लाखों का। मुनि श्री प्रणम्यसागर
भोग
इन्द्रिय भोग निम्ब (नीम) के पुष्प के समान—गंध अच्छी, स्वाद कड़वा। पाप के भोग में संताप तात्कालिक, पुण्य के भोग में दीर्घकालीन का बीजारोपण; आकुलता
सपना
दिन का हो या रात का, सपना सपना होय; सपना अपना सा लगे, किन्तु न अपना होय। आचार्य श्री विद्यासागर जी दिन के सपने मोह
मिथ्यात्व
अनित्य को नित्य मानना भी मिथ्यात्व है। क्योंकि तुमने सच्चे देव, शास्त्र, गुरु को तो माना पर उनकी नहीं मानी। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
संतोष
साधु और पापी दोनों में ही संतोष दिखता/होता है। बस दोनों की मंज़िलें विपरीत दिशा में होतीं हैं। शकुनि ने अपनी बहन के साथ हुये
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