Category: वचनामृत – अन्य
प्रतिक्रिया
2 मुर्गे लड़ते हैं प्रतिक्रिया के कारण। यदि प्रतिक्रिया न करें तो सामने वाले की स्थिति उस मुर्गे जैसी हो जायेगी जो दर्पण में चोंच
धर्म ध्यान
गुरुजन कहते हैं → धर्म ध्यान हर समय करते रहना चाहिये। पर हर समय पूजादि तो सम्भव नहीं ! पूजादि तो धर्म के बाह्य रूप
दुःख
हम दुःख नहीं चाहते पर दुःख के साधनों को छोड़ना तो दूर, बढ़ाते/ जमा करते रहते हैं। मुनि श्री शैलसागर जी
वरदान
भगवान से कभी यह वर मत माँगना कि मैं अपने बच्चों की हर इच्छा पूरी कर सकूँ। ऐसा वर माँगा, तो धृतराष्ट्र बन जाओगे। निर्यापक
इष्ट / अनिष्ट
इष्ट/अनिष्ट स्थायी नहीं रहते। माँ बचपन में इष्ट, शादी के बाद पत्नी फिर बच्चे, वृद्धावस्था में भगवान। मुनि श्री प्रमाणसागर जी
आशीर्वाद
गुरु का पहला आशीर्वाद बीज-रूप होता है। आगे के जल-रूप, पौधे को स्वस्थ बनाये रखने के लिये। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
पुण्य / पाप
प्राय: पुण्य के उदय में पाप करने का मन होता है और पाप के उदय में पुण्य का। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
राग / मोह
राग –> हिलमिल कर रहना। मोह –> उनके बिना न रह पाना। मुनि श्री प्रमाणसागर जी
धर्म / धर्मात्मा
धर्म से ज़्यादा (जल्दी) कल्याण धर्मात्मा से। नमोस्तु धर्म को, आशीर्वाद धर्मात्मा से। पूजा धर्म की, फल धर्मात्मा बनने पर। 3 अनुयोगों (75% धर्मशास्त्र) में
दुआ / बद-दुआ
हमारे पुण्य कर्मों/ दुआओं का प्रभाव हमारे प्रियजनों पर होता है या नहीं ? उनके दुःख से आप दुःखी होते हैं तो आपके पुण्य से
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