Category: वचनामृत-आचार्य श्री विद्यासागर
दर्शन / अध्यात्म
दर्शन के बिना अध्यात्म, जीवन चल सकता है। बिना अध्यात्म के, दर्शन का दर्शन नहीं। अध्यात्म स्वाधीन नयन है। दर्शन पराधीन, उपनयन है (उदाहरण चश्मा)।
तारीफ़
तारीफ़ नहीं, अपनी ओर देख, चक्कर नहीं। (जैसे झूले पर चक्कर तभी आते हैं जब बाहर की ओर देखते हैं)। आचार्य श्री विद्यासागर जी
अंतरंग यात्रा
गाड़ी जब रिवर्स में जाती है तब गति तो कम पर सावधानी ज्यादा रखनी पड़ती है। ऐसे ही बाहर से अंदर की यात्रा करते समय
स्वभाव
दो प्रकार के व्यक्ति होते हैं… पहले… भूमि पर उगे बरगद की तरह जो सबको छाया आदि देते हैं। दूसरे… उस बरगद जैसे जो दीवार
भक्त से भगवान
भक्त से भगवान… भगवान के सामने बोलो/ अनुभव करो… “दासोहम्”। अगले कदम पर “उदासोहम्” (संसार से)। अंत में… “सोहम्”। आचार्य श्री विद्यासागर जी
पुण्य
आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे, “पाप मल है, पुण्य जल है। मल धोने के लिए जल आवश्यक है।” आचार्य श्री समयसागर जी
साधना
सिद्धि के लिए साधना होती है। लेकिन इसके आगे यदि “प्र” लग गया तो साधना प्रसिद्धि के लिए होने लग जाती है, सिद्धि छूट जाती
शिष्य / गुरु
आचार्य श्री विद्यासागर जी से पूछा…. आप अपने को कैसा शिष्य मानते हैं ? सूखे पत्ते सा। वो कैसे ? सुखे पत्ते की अपनी कोई
इंद्रियों पर नियंत्रण
इंद्रियों पर नियंत्रण रखने के लिये मन को असंतुष्ट रखें। मीठा मन को अच्छा लगता, सो और-और मांगता है, जिव्हा नहीं। (असंतुष्ट मन बुझ आता
जीवन का उद्देश्य
जीवनोद्देश्य… जिनादेश* पालन। अनुपदेश…..अन्य का उपदेश नहीं। आचार्य श्री विद्यासागर जी * भगवान का आदेश।
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