Category: वचनामृत-आचार्य श्री विद्यासागर
साधना
सिद्धि के लिये साधना होती है। लेकिन इसके आगे यदि “प्र” लग गया तो साधना प्रसिद्धि के लिये होने लग जाती है, सिद्धि छूट जाती
शिष्य / गुरु
आचार्य श्री विद्यासागर जी से पूछा…. आप अपने को कैसा शिष्य मानते हैं ? सूखे पत्ते सा। वो कैसे ? सुखे पत्ते की अपनी कोई
इंद्रियों पर नियंत्रण
इंद्रियों पर नियंत्रण रखने के लिये मन को असंतुष्ट रखें। मीठा मन को अच्छा लगता, सो और-और मांगता है, जिव्हा नहीं। (असंतुष्ट मन बुझ आता
जीवन का उद्देश्य
जीवनोद्देश्य… जिनादेश* पालन। अनुपदेश…..अन्य का उपदेश नहीं। आचार्य श्री विद्यासागर जी * भगवान का आदेश।
गुरु
आपका स्मरण रहे, संसार का विस्मरण रहे। गुरु ने मुझे गुरु समय दिया, लघु बनने के लिए। आचार्य श्री विद्यासागर जी
शुभ-लाभ
शुभ… यानी अशुभ से दूर। लाभ… यानी फायदा –> संसार में धनादि का (धर्म में आत्मकल्याण का)। आचार्य श्री विद्यासागर जी
Jainism
Jainism –> “How to Live” ही नहीं, “How to Die” भी है। आचार्य श्री विद्यासागर जी
सीमा
साधना की सीमा क्या होनी चाहिये ? साध्य की प्राप्ति तक। आचार्य श्री विद्यासागर जी
पुण्य
पुण्य जल है, पाप मल है। ऐसे पुण्य का अर्जन करो जो पाप को धो दे। ऐसे पुण्य का अर्जन, पवित्र परिणामों से होता है।
मन
आचार्य श्री विद्यासागर जी सुनाते थे… क्या हो गया समझ में, मुझको न आता, क्यों बार-बार मन बाहर दौड़ जाता। स्वाध्याय ध्यान करके मन रोध
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