Month: July 2025

ज्ञान / तटस्थता

ज्ञान के अनुपात में तटस्थता बढ़ती है। तीर्थंकरों में भगवान मुनि अवस्था में मौन, तटस्थता दर्शाता है। लेकिन केवलज्ञान होने पर मुखरित क्यों हो जाते

Read More »

सूक्ष्म / साधारण

आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे… सूक्ष्म और बादर, जीव के विशेषण हैं, प्रत्येक और साधारण, शरीर के। मुनि श्री सौम्य सागर जी (श्री जीवकांड

Read More »

वात्सल्य

अपनी समर्थता से सधर्मी की असमर्थता को समर्थता में बदलना । निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

Read More »

सप्रतिष्ठित / अप्रतिष्ठित

आचार्य श्री विद्यासागर जी उदाहरण देकर बताते थे… आम का छिलका अप्रतिष्ठित, गूदा सप्रतिष्ठित, गुठली अप्रतिष्ठित, मींग सप्रतिष्ठित। मुनि श्री सौम्य सागर जी (श्री जीवकांड

Read More »

निंदा / पूजा

निंदा के साथ पूजा करना, स्वनिंदा बिना पूजा से कम महत्वपूर्ण है। स्वनिंदा से कर्मों का नाश होता है। कहा जाता है –> परनिंदा करने

Read More »

सप्त धातु

वैक्रियिक शरीर में सप्तधातु नहीं होती है। पर नारकियों के शरीर में अशुभतर होती है, क्योंकि उनको शारीरिक रोग/ कष्ट होते हैं, पहले से सातवें

Read More »

प्रतिस्पर्धा

दो जुड़वां भाइयों के सब कुछ एक सा होते हुए भी,भाग्य अलग-अलग क्यों? क्योंकि पूर्व संचित कर्म अलग-अलग होते हैं, जिन्हें कोई जानता नहीं। फिर

Read More »

विरह काल

सौधर्म इंद्र का उत्कृष्ट विरह काल 6 माह है। शची पटरानी का विरह काल ? आचार्य श्री विद्यासागर जी के अनुसार शची पटरानी का विरह

Read More »

दान

पहले तात्कालिक लाभ को प्राथमिकता पर दीर्घकालीन ज्यादा महत्वपूर्ण। मंदिर आदि में (बोलियाँ आदि लेना) चार प्रकार के दानों के अलावा, धर्म प्रभावना के लिए

Read More »

तप

तप में पुण्य और पाप दोनों प्रकार के कर्म प्रकृतियों की उदीरणा होती है। मुनि श्री सौम्य सागर जी (जिज्ञासा समाधान – 17 मई)

Read More »

मंगल आशीष

Archives

Archives
Recent Comments

July 31, 2025