अनेकांत
जितना कीमती हीरा, उतने ज्यादा कोण।
ऐसे ही जिस व्यक्ति के जितने ज़्यादा दृष्टिकोण, वह व्यक्ति उतना ही ज़्यादा महान।
निर्यापक मुनि श्री वीरसागर जी
जितना कीमती हीरा, उतने ज्यादा कोण।
ऐसे ही जिस व्यक्ति के जितने ज़्यादा दृष्टिकोण, वह व्यक्ति उतना ही ज़्यादा महान।
निर्यापक मुनि श्री वीरसागर जी
2 Responses
अनेकांत को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। जैन धर्म अनेकांत को मानता है। अतः जीवन के कल्याण के लिए अनेकांत पर श्रद्बान करना परम आवश्यक है।
Anekant ke siddhant ka bahut hi sundar example diya ! Gurudev ke charnon me shat shat naman !