Month: August 2025
कार्मण शरीर
कार्मण शरीर की उत्कृष्ट स्थिति (एक कर्म की अपेक्षा) 70 कोड़ाकोड़ी सागर होती है। सब कर्मों की अपेक्षा अनादि-अनंत या सांत। मुनि श्री सौम्य सागर
हार का कारण
दुर्योधन के पास बड़ी सेना, दोनों गुरु, बड़े-बड़े गुरुजन, फिर भी हारा। कारण ? गुरुजनों से चाहता था। पांडव गुरुजनों को चाहते थे। निर्यापक मुनि
कार्मण काय
शरीर में कर्मों के समूह को कार्मण-काय क्यों कहा ? क्योंकि इसके माध्यम से ही कर्मबंध तथा कर्मों का निस्तापन होता है। जैसे औदारिक-काय आदि
Empathy
अपने आप को सामने वाले की स्थिति में रखकर सोचना, Empathy कहलाता है। (एकता – पुणे)
चक्रवर्ती
कहा है बहु आरंभ परिग्रह नरक आयु का निमित्त है। पर चक्रवर्ती तो सब नरक में जाते नहीं हालांकि उनके पास वैभव बहुत ज्यादा होता
भगवान बनना
भगवान बनने के लिए (श्री रयणसार के अनुसार) – पहले भक्त बनो। किसके ? देव-शास्त्र-गुरु के, देव/ गुरु प्रपंच रहित, शास्त्र विवाद/ विरोध रहित हैं।
मोक्ष की पात्रता
पुराने वाले आचार्य श्री माघनंदी जी की दीक्षा आठ बार खंडित हुई। फिर भी वे उसी भव से मोक्ष गए। मुनि श्री सौम्य सागर जी
ईर्ष्या
ईर्ष्या की ख़ासियत – जिनसे करोगे उसकी प्रगति होगी (सामने वाला Competition में और मेहनत करता है)। प्रेम किया तो वह अकर्मण्य हो जायेगा (जैसे
परिग्रह
तत्त्वार्थ सूत्र जी –> बहुआरम्भ/परिग्रह नरक का कारण। कितने परिग्रह को “बहु” कहा जाये? भोगने की शक्ति से ज्यादा परिग्रह “बहु” कहा जाता है। मुनि
शिष्य / भक्त
आचार्य श्री विद्यासागर जी अपने शिष्यों और भक्तों को सिंह बनाते थे, इसलिए हंटर जैसा अनुशासन रखते थे, श्वान नहीं जिसको पट्टा डालकर घुमाया जाए।
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