Month: August 2025
भाव
मन के भाव, बाह्य कारणों से प्रभावित/ आत्मा के कर्मों से आते हैं। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (जिज्ञासा समाधान – 2/4/22)
भाग्य / पुरुषार्थ
भाग्यवादी को भाग्य मूर्ख बनाता है, पुरुषार्थवादी की सहायता करता है। मुनि श्री सौम्य सागर जी (जिज्ञासा समाधान – 19 मई)
विनय
मुनिराज को आहार कराते समय, नीचे रखे बर्तन को पैर से खिसकाने में क्या दोष है ? वंश जैन – छीपीटोला (आगरा) आहार कराते समय
दिमाग
प्रकृति ने दिमाग शरीर के सबसे ऊपर रखा है। इसे भारी (अनुपयोगी ज्ञान/ घमंड से) मत होने देना, वरना ज़िंदगी Disbalance हो जायेगी। (एकता –
पीत लेश्या
आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे… पीत लेश्या वाले देव ही नारकियों को आपस में भिड़वा सकते हैं। मुनि श्री सौम्य सागर जी (जिज्ञासा समाधान
गुण / अवगुण
कीमत दोनों की होती है। अंतर ? गुण की कीमत मिलती है, अवगुण की चुकानी पड़ती है। (एकता-पुणे)
निगोदिया
आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे… पूर्व आचार्यों ने पाँच स्थावरों के नाम दिये, पर यह नहीं कहा कि स्थावर पाँच ही होते हैं जैसा
ब्रह्मचर्य
आचार्य श्री विद्यासागर जी…. उधारी 40 वर्ष पुरानी हो जाये तो खाते में से निकाल देते हैं। शादी 40 साल तक नहीं हो तब तो
सम्यग्दर्शन
सम्यग्दर्शन तत्त्वार्थ पर सही(समीचीन) श्रद्धान। सम्यक् – सही कार्य/ लक्ष्य। तत्त्वार्थ – अधिकरण। श्रद्धान – प्रतीति/ लक्षण। प्रतीति – ऐसा ही है। मुनि श्री प्रणम्यसागर
Competition / Cooperation
Competition(प्रतिस्पर्द्धा) में बहुत से अज्ञात कारण हैं जैसे पूर्व के कर्म(भाग्य), जब कि Cooperation(सहकारिता) में लाभ ही लाभ हैं… 1) ईर्ष्या से बचोगे। ईर्ष्या करते
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