तारीफ़
तारीफ़ नहीं,
अपनी ओर देख,
चक्कर नहीं।
(जैसे झूले पर चक्कर तभी आते हैं जब बाहर की ओर देखते हैं)।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
तारीफ़ नहीं,
अपनी ओर देख,
चक्कर नहीं।
(जैसे झूले पर चक्कर तभी आते हैं जब बाहर की ओर देखते हैं)।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
2 Responses
तारीफ़ करना बुरा नहीं होता है,चाहे दुसरो की या स्वयं की हो, लेकिन जूठी तारीफ़ से बचना परम आवश्यक है। अतः जीवन के कल्याण हेतु तारीफ़ वास्तविक रूप होना आवश्यक है,जिससे बदनामी से बचना आवश्यक है।
Acharya Shri ke charnon me shat shat naman !