प्यास

नीर नहीं तो,
समीर सही प्यास,
कुछ तो बुझे।
भावार्थ – अत्यधिक गर्मी में पानी भले न मिले परन्तु ठंडी हवा चलती रहे तो प्यास में कमी तो आती है। उसी प्रकार पंचम काल में भले ही केवली/ श्रुतकेवली का समागम प्राप्त नहीं है किन्तु ठंडी हवा के समान आचार्य, उपाध्याय, साधु अथवा समीचीन देव-शास्त्र-गुरु तो उपलब्ध हैं जो हमारा मोक्षमार्ग प्रशस्त कर रहे हैं।
आचार्य श्री विद्यासागर जी




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प्यास के उदारण से प़तीत होता है कि मोक्ष मार्ग के लिये आचार्य, उपाध्याय, साधु एवंं देव शास्त्र पर श्रद्धान करना परम आवश्यक है।