Day: March 4, 2026

अनर्थदण्ड विरत

अनर्थदण्ड विरत = मन, वचन और काय की कुचेष्टाओं का त्यागी अनर्थ = निष्प्रयोज्य दण्ड = मन, वचन और काय की कुचेष्टायें विरत = उदासीन,

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घमंड

हम इन्द्रियों का बहुत घमंड करते हैं। कानों से सुने, आँखों से देखे को ही सही मानते हैं। क्षु. श्री सहजानंद जी</span

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मंगल आशीष

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