श्रावक (गृहस्थ) का पैर घर में, मन बाहर।
श्रमण (साधु) का पैर बाहर, मन घर (अंतरंग) में।
ब्र. डॉ. नीलेश भैया
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2 Responses
श्रावक/श्रमण को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए श्रावकों को श्रमण बनने के लिए प़यास करना परम आवश्यक है। श्रावकों को बाहर मन न लगाकर अंतरग से जुड़ना परम आवश्यक है।
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श्रावक/श्रमण को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए श्रावकों को श्रमण बनने के लिए प़यास करना परम आवश्यक है। श्रावकों को बाहर मन न लगाकर अंतरग से जुड़ना परम आवश्यक है।
‘श्रावक’ aur ‘श्रमण’ ka difference bahut hi saral shabdon me explain kar diya !