कषाय

चार कषायों में से पहली दो क्रोध और मान प्रत्यक्ष देखने में आती हैं, तीसरी मायाचारी कभी-कभी और चौथा लोभ तो समझ ही नहीं सकते/ पकड़ना बहुत मुश्किल है। उसे तो कषाय मानते भी नहीं पर वह जब दिखाई दे जाता है तब बहुत नीचा देखना पड़ता है।

मुनि श्री निश्चल सागर जी (प्रवचन- 27 फ़रवरी)

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  1. कषाय को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए कषाय का त्याग करना परम आवश्यक है।

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