देव आयुबंध

  • आत्मा से साधे (सरागसंयमी, संयमासंयम) –> विशिष्ट पर्याय वैमानिक देव, अगली पर्याय में भी संस्कार लेकर जाते हैं।
  • मन से साधे –> अकाम निर्जरा, पुण्यार्जन।
  • शरीर से साधे (बालतप) –> व्यंतर भी बनते हैं।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र – 6/20)

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7 Responses

  1. मुनि श्री प़णम्यसागर महाराज जी ने देव आयुबंध को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है।

    1. आत्मा से कौन साधेगा ? जिसके जीवन में संयम होगा।
      सिर्फ़ मन से पुण्य बंध होगा, तुमने संकल्प तो नहीं लिया था लेकिन क्षमता से सहलिया।
      इन दोनों में फ़र्क है ना ! पहले में संकल्प लिया दूसरे में सिर्फ़ परिस्थितियों को सह लिया क्षमतानुसार।

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