Category: अगला-कदम
लब्धि
सम्यक् दर्शन, ज्ञान, चारित्र, संसार तथा परमार्थ सबके लिये अंतरंग तथा बाह्य हेतु चाहिये। क्षयोपशम लब्धि तो जन्म से प्राप्त होती है। विशुद्धि लब्धि… विशुद्धि
सम्यक्त्वाचरण / सम्यक्चारित्र
सम्यक्त्वाचरण /सम्यक्चारित्र में अंतर ? निधि मुंबई सम्यक्त्वाचरण… सम्यग्दर्शन होने पर (4 गुणस्थान) में क्या-क्या नहीं करना! सम्यक्चारित्र… 6 गुणस्थान तथा ऊपर क्या-क्या करना! चिंतन
सिद्धों के गुण
सूक्ष्मत्व नामकर्म के अभाव से। अवगाहनत्व आयु कर्म के अभाव से। अव्याबाध… सुख नहीं गुण प्राप्त हुआ, गोत्र कर्म या वेदनीय कर्म के अभाव से।
सुख / दु:ख
सुख/दु:ख, मोहनीय/वेदनीय से। शरीर से मोह तो शरीरगत व्याधियों से दु:ख/ ठीक होने पर सुख। शरीर को सुन्न करने से शरीर की बाधाएँ/ दु:ख का
गुणस्थानों में बंध
दूसरे गुणस्थान में मिथ्यात्व तो है नहीं, बंध कारण अनंतानुबंधी जनित अविरति है। क्योंकि मिथ्यात्व के बाद बंध का दूसरा प्रत्यय अविरति ही है। चौथे
सम्यक् प्रकृति
मिथ्यात्व का रस अनंतगुणा हीन तब सम्यक् मिथ्यात्व। सम्यक् मिथ्यात्व का रस अनंतगुणा हीन तब सम्यक् प्रकृति। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र – 8/9)
गुप्ति
वचन गुप्ति – प्रवृत्यात्मक… भाषा को हित, मित, प्रिय (समिति-पूर्वक बोलना) निवृत्यात्मक… मौन (न झूठ, न सच)। मनोगुप्ति… आर्तध्यान में नहीं लगना। मुनि श्री प्रणम्यसागर
संवर मार्ग
आचार्य श्री विद्यासागर जी ने संवर मार्ग छठे गुणस्थान से माना है क्योंकि सही में संवर तो गुप्ति, समिति से होता है, हालाँकि संवर की
कर्म वर्गणा
कर्म वर्गणाएँ एक रूप होती हैं। बंधने के बाद चार रूप… प्रकृति बंध…स्वभाव/ किस कर्म को बाधित करेगी जैसे बारिश जल सर्प मुख में विष
दर्शन
दर्शन… व्यावहारिक देखना नहीं। ज्ञान से पहले का सामान्य अवलोकन जिसमें न विशेषता ग्रहण, न पदार्थ की जाति, न क्रिया, ना ही गुण ग्रहण होते
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