Category: अगला-कदम
अनुभाग बंध
घातिया कर्मों के चार भेद -> लता, लकड़ी, हड्डी, शैल स्थानीय। या एक, द्वि, त्रि, चतुर्थ स्थानीय। मिथ्यात्व में एक स्थानीय नहीं होता। देशघाती/ सम्यक
विपाक-विचय
चौथे गुणस्थान में विपाक-विचय क्यों नहीं होता ? कर्मों के विपाक पर दृढ़ श्रद्धा होती तो चारित्र ग्रहण कर लिया होता। चिंतन
निद्रा
निद्रा-निद्रा, प्रचला-प्रचला, स्त्यानगृद्धि –> तीनों अत्यंत अशुभ/ बड़े पापोदय से। निद्रा–> पापोदय + साता के उदय से। इसीलिए शोक/ टेंशन (असाता) में नींद नहीं आती,
अघातिया कर्म
सूक्ष्मत्व –> नाम कर्म के अभाव से अवगाहनत्व –> आयु कर्म के अभाव से अव्याबाध –> गोत्र या वेदनीय के अभाव से अगुरुलघु –> वेदनीय
भाव
चरणानुयोग के अनुसार दया/ अब्रह्म क्षयोपशम-भाव, कर्मोदय से नहीं। ज्यादातर बचने वाले अपने पुण्य-उदय से नहीं, बचाने वाले के भाव से/ उसके पुण्य की उदीरणा
प्रकृति बंध
कर्म वर्गणा एक रूप बंधने के बाद चार रूप (प्रकृति, स्थिति, अनुभाग, प्रदेश)। सबसे पहले प्रकृति बंधती है। किस गुण को बाधित करेगी जैसे ज्ञान,
द्विविधानी
तत्त्वार्थ सूत्र में आये इस शब्द(द्विविधानी) के कई अर्थ लिये जा सकते हैं- द्रव्येन्द्रिय तथा भावेन्द्रिय। बाह्य इन्द्रिय तथा अंतरंग। कामेन्द्रिय (स्पर्श व रसना) तथा
अचित्त
अचित्त करने की विधि… अग्निपक्व ही उत्कृष्ट मार्ग है। छिन्न-भिन्न, क्षारीय पदार्थ मिलाकर करना सही नहीं। 2) रस रूप में लेना। श्री मूलाचार जी के
लब्धि
सम्यक् दर्शन, ज्ञान, चारित्र, संसार तथा परमार्थ सबके लिये अंतरंग तथा बाह्य हेतु चाहिए। क्षयोपशम लब्धि तो जन्म से प्राप्त होती है। विशुद्धि लब्धि… विशुद्धि
सम्यक्त्वाचरण / सम्यक्चारित्र
सम्यक्त्वाचरण /सम्यक्चारित्र में अंतर ? निधि मुंबई सम्यक्त्वाचरण… सम्यग्दर्शन होने पर (4 गुणस्थान) में क्या-क्या नहीं करना! सम्यक्चारित्र… 6 गुणस्थान तथा ऊपर क्या-क्या करना! चिंतन
Recent Comments