Category: अगला-कदम

संवर मार्ग

आचार्य श्री विद्यासागर जी ने संवर मार्ग छठे गुणस्थान से माना है क्योंकि सही में संवर तो गुप्ति, समिति से होता है, हालॉकि संवर की

Read More »

कर्म वर्गणा

कर्म वर्गणायें एक रूप होती हैं। बंधने के बाद चार रूप… प्रकृति बंध…स्वभाव/ किस कर्म को बाधित करेगी जैसे बारिश जल सर्प मुख में विष

Read More »

दर्शन

दर्शन… व्यावहारिक देखना नहीं। ज्ञान से पहले का सामान्य अवलोकन जिसमें न विशेषता ग्रहण, न पदार्थ की जाति, न क्रिया, ना ही गुण ग्रहण होते

Read More »

जीव

जीव उपयोग लक्षण वाला, अंत रहित (अनादि-अनंत), अपने कर्म का करने वाला अर्थात कर्ता और भोगने वाला है। समणसुत्तं – गाथा 592

Read More »

तीसरे गुणस्थान में आयुबंध ?

तीसरे गुणस्थान में आयुबंध क्यों नहीं ? तीसरे गुणस्थान में ना तो मिथ्यात्व की, ना ही सम्यक्त्त्व की तीव्रता इतनी होती है कि वह आयुबंध

Read More »

उदयाभावी

उदयाभावी… अनंतानुबंधी का उदय, अप्रत्याख्यानादि 12 कषाय रूप संक्रमित होकर पर-मुख से उदय में आते रहना। श्री मरणमंडिका

Read More »

आनुपूर्वी

आनुपूर्वी… सिर्फ़ विग्रहगति में उदय (पूर्व आकार बनाए रखना) जैसे नरकगत्यानुपूर्वी –> नरक की ओर गति कराना। इस दौरान तीनों का उदय रहता है (नरकगत्यानुपूर्वी,

Read More »

धर्म / व्रत

धर्म आत्मा का स्वभाव जैसे क्षमा धर्म आदि। व्रत से आत्मा के स्वभाव में अवरोधक तत्त्वों को रोकना जैसे अपरिग्रह व्रतादि। व्रत साधन हैं, धर्म

Read More »

भाव

पहले भाव फिर मन। यदि यह क्रम न हो तो असंज्ञियों के भाव बनेगा ही नहीं। आर्यिका श्री स्वस्तिभूषण माताजी

Read More »

छद्मस्थ

छद्मस्थ… जिनकी आत्मा में आवरण स्थित है। सूत्र (9/10) में दसवें गुणस्थान के बाद आया है सो ज्ञान/दर्शनावरण ही लेना। सैद्धांतिक दृष्टि से 1-10 गुणस्थान

Read More »

मंगल आशीष

Archives

Archives
Recent Comments

August 2, 2026

August 2026
M T W T F S S
 12
3456789
10111213141516
17181920212223
24252627282930
31