निद्रा
निद्रा-निद्रा, प्रचला-प्रचला, स्त्यानगृद्धि –> तीनों अत्यंत अशुभ/ बड़े पापोदय से।
निद्रा–> पापोदय + साता के उदय से। इसीलिए शोक/ टेंशन (असाता) में नींद नहीं आती, सुखरूप में भी नहीं।
भोगभूमिज + देवों में इसका उदय नहीं।
इंद्रिय पर्याप्त पूर्ण होने पर ही निद्रा का उदय।
आहारक, वैक्रियिक ऋद्धि के उत्थापन के समय निद्रा उदय नहीं।
निद्राजय से ही ध्यान लगता है।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थसूत्र – अध्याय 8)



