Month: July 2025
धर्म
धर्म जीने की कला सिखाता है, साथ साथ मरने का सलीका भी। जैसे एक ही थाली से खाया भी जाता है, त्याग भी। आर्यिका अर्हम्
निर्यापक
श्री प्रवचनसार की चूलिका के अनुसार, आचार्य की आज्ञा से संघ का संचालन व अन्य कार्य जैसे शिक्षा, दीक्षा, संघ/ शिष्य निर्वाह आदि करने के
साथ
जब तन साथ नहीं जाता तो सन (Son) कैसे जायेगा ! पति नहीं जायेगा पर पाप ज़रूर साथ जायेगा। चिंतन
भवनत्रिक में लेश्या
मान्यता है कि भवनत्रिक में पीत तथा तीन अशुभ लेश्या होती हैं और अशुभ लेश्या अपर्याप्तक अवस्था में ही होती हैं। तत्तवार्थसूत्र में ऐसा कोई
समता
अस्वस्थ होते हुए भी हम स्वस्थ हैं, ऐसी धारणा बनाने से समता आयेगी। आचार्य श्री विद्यासागर जी
समर्पण
समर्पण अपने व्यक्तित्व/ अस्तित्व का जैसे मुनि श्री समयसागर जी का था। 40 साल तक संघ में मौनी बाबा बनकर रहे। मुनि श्री विनम्रसागर जी
दान में स्वाधीनता
दान देने में भी आनंद तभी आता है जब आप स्वाधीन हों, जैसे भिखारी को खिलाते समय कोई प्रतिक्रिया की अपेक्षा नहीं सो खिलाने में
निगोदिया / साधारण
आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे कि साधारण जीव के आश्रित अनंत निगोदिया रहते हैं। पर निगोदिया जीव को साधारण नहीं कहते, यह एक अलग
रिश्ते
जैसे जैसे पैसा बढ़ता जाता है शून्यता बढ़ती जाती है –> 10, 100, 1000….। इसलिये बुजुर्गों ने 11, 101, 1001, देने का रिवाज बनाता था।
मनुष्य
मनुष्य पर्याय में पर्याप्तकों की संख्या अधिक होती है, अपर्याप्तकों से। कारण ! मनुष्य पर्याय में पुण्यात्मा जन्म लेते हैं। मुनि श्री सौम्य सागर जी
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