Month: August 2025
उत्तम शौच
तत्त्वार्थ सूत्र अध्याय 4… 1) राहु दो होते हैं, एक नित्य राहु जो चंद्रमा में कलाओं के लिए कारण होता है। दूसरा अनित्य राहु जो
उत्तम शौच धर्म
संतोष से निरुत्साह नहीं, क्योंकि संतोष उत्साह और उमंग की पूर्णता है। पास में रखी वस्तु जब बोझ लगे तब बोध में संतोष आता है।
उत्तम आर्जव
पुराणों* में एक कथानक आता है… एक व्यक्ति ने अष्टानिका में नियम लिया कि वह दिगंबर गुरु के दर्शन किए बिना भोजन नहीं करेगा। गुरु
उत्तम आर्जव धर्म
जितना आडंबर ज्यादा, उतनी उलझनें बढ़ती हैं। एक बार बाहर दिखाने का क्रम बन गया फिर वह दिखावा आपकी मजबूरी बन जाता है। दिखावे वाले
उत्तम मार्दव
कटु शब्द सुनने पर कर्ण इंद्रिय को बुरा लगता है। कटु शब्द बोलने पर रसना इंद्रिय को क्यों नहीं ? इंद्रियां तो सब मेरी हैं
उत्तम मार्दव धर्म
मान रूपी बीज को जब माटी में मिलायेंगे तब सम्मान रूपी वृक्ष तैयार होगा। मेरा अपमान न हो जाए इसकी तो बहुत चिंता, पर मैं
अनेकांत
सत्य अनेकांत नहीं, अनेकांत सत्य है। क्योंकि जो आज असत्य है वह कल सत्य हो सकता है, यहाँ नहीं तो कहीं और सत्य होगा। मुनि
उत्तम क्षमा
जो नज़रें झुकाए चलते हैं, दुनिया उनको नज़रें उठाए देखती है जैसे आचार्य श्री विद्यासागर जी जब हावड़ा ब्रिज से निकल रहे थे उनकी नज़रें
प्रचला
ऐसी निद्रा जो प्रचलित करे जैसे बैठे-बैठे झूमना/ गिरना (तीव्र निद्रा से)। प्रचला-प्रचला में लार टपकने लगती है। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
सत्य
अनुसंधान जब अतिसंधान बन जाता है तब सत्य, सत्याग्रह आंदोलन के रूप में परिवर्तित हो जाता है। तब सत्य पर ग्रहण लग जाता है, सत्य
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