उत्तम शौच धर्म

संतोष से निरुत्साह नहीं, क्योंकि संतोष उत्साह और उमंग की पूर्णता है।
पास में रखी वस्तु जब बोझ लगे तब बोध में संतोष आता है। लोभी को तो जो वस्तु पास में है भी नहीं वह भी आकुल व्याकुल करती है।
आप भी पहले अनावश्यक वस्तुओं से विराम लें क्योंकि अनावश्यक‌ व्याकुलता ज्यादा पैदा करती हैं। कोरोना के दौरान समाचार आया कि अनावश्यक वस्तुओं का व्यापार कम होने से अर्थव्यवस्था चरमरा गई।
चारों कषाय इंटरचेंजेबल हैं, एक को कम करने का प्रयास करो दूसरी उभर आती है, तराजू में मेंढकों को तोलने जैसा है।
जब लोभ ज्यादा आए तब पास में रखी वस्तु में से कुछ दान कर दें।
संसारी संसारी से डरता है की वह उसका लाभ/ लोभ कम कर देगा जबकि सन्यासी संसार से डरता है।
लोभ को धर्म की तरफ डायवर्सन करना होगा जैसे कमर्शियल लैंड को कॉलोनी में डाइवर्ट कर देते हैं।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 31 अगस्त)

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6 Responses

  1. उत्तम शौच धर्म में चाह रखना चाहै विषय भोग, माया यानी धन अथवा किसी में चाह रहेगी तो दाह रहेगी अतः जीवन के कल्याण के लिए सन्तोष एवं संयम रखना परम आवश्यक है यही वास्तविक राह होगी।

  2. ‘संसारी संसारी से डरता है की वह उसका लाभ/ लोभ कम कर देगा’; Is sentence me laabh kam hone se lobh kaise kam hoga ? Ise clarify karenge,please ?

    1. संसारी व्यक्ति अपने संसारी भाइयों से डरता है क्योंकि वे कंपटीशन में आकर उसका लाभ कम कर देगा और लाभ कम होने पर उसका लोभ भी कम हो जाएगा।

    1. लाभ बढ़ने पर ही प्राय: लोभ बढ़ता है। कम होने पर तो संकल्प विकल्प होते हैं।

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