Month: January 2026
रागद्वेष / ध्यान
आर्त/रौद्र-ध्यान तथा राग-द्वेष में क्या अंतर है ? दीपा-मुम्बई राग-द्वेष कारण हैं, आर्त/रौद्र-ध्यान कार्य। ब्र. डॉ. नीलेश भैया
दुष्ट
दुष्ट घोड़े को जितना रोको उतना ही और ज्यादा दौड़ता है। ऐसे ही दुष्ट आदमी और दुष्ट मन की भी प्रकृति होती है। चिंतन
आलोचना आदि दोष
आलोचना… स्वयं के दोषों को दूर करना/ दूर करने के लिये। गर्हा……….. दोषों से घृणा करना। निंदा……….. बुरा कहना। तीनों स्वयं के लिये प्रशंसनीय, पर-प्रत्यय
वर्तमान
भविष्य वर्तमान का ही तो Extension है। वर्तमान अच्छा तो, भविष्य अच्छा होगा ही। * गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी * (भूतकाल के दोषों को
पुण्य
पुण्य का तो संचय करना चाहिये; पुण्य के फल का त्याग। पर होता उल्टा है, फल तो चाव से खाते हैं, पुण्य करते नहीं/ करना
दानादि
दानादि… देव, शास्त्र, गुरु को। सहयोग……… किसी को भी। भेंट……… अपने से बड़ों को। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
सम्यक्त्व / मिथ्यात्व
संसार में अभव्यों से बहुत ज्यादा भव्य। लेकिन मिथ्यात्वी अनंत, जबकि सम्यग्दृष्टि बहुत कम। कारण ? अज्ञान/ विनय मिथ्यात्व। चिंतन
छोड़ना
भगवान महावीर से पूछा…छोड़ा क्या ? वह जो मेरा था ही नहीं। घर का आसान पता है कि घर है ही नहीं। ब्र. डॉ. नीलेश
औदयिक भाव
तीर्थंकर-प्रकृति को छोड़कर, औदयिक भाव बंध के कारण होते हैं । निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
शक्ति
सबसे बड़ी शक्तियाँ हैं… इच्छा तथा संकल्प शक्तियाँ। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
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