द्रव्य के उदाहरण में ठर्रा मूंग,उसका तो कुछ कर नहीं सकते पर्याय में केवलज्ञान प्रकट या ना प्रकट उसमें प्रकट कर सकते हैं पुरुषार्थ करके, इसलिए पर्याय महत्वपूर्ण है।
Magar ‘ठर्रा मूंग’ ki comparison to ‘Abhavya jeev’ se karte hain, right ? To phir
‘purushartha’ karke bhi usme ‘kevalgyaan’ kaise prakat kar sakte hain ? Yeh clarify karenge, please ?
अभव्य को द्रव्य से ठर्रा मूंग कहा जबकि भव्य में दो स्टेज/ दो पर्याय बताई गईं… एक में केवलज्ञान प्रकट है और एक में प्रकट नहीं।
ऐसा तो भाव इसमें नहीं आ रहा की अभव्य पुरुषार्थ करके केवलज्ञान प्रकट कर सकता है
5 Responses
द़व्य/पर्याय कों परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है।
‘द्रव्य महत्त्वपूर्ण नहीं, पर्याय महत्त्वपूर्ण है।’ Is sentence ka meaning explain karenge, please ?
द्रव्य के उदाहरण में ठर्रा मूंग,उसका तो कुछ कर नहीं सकते पर्याय में केवलज्ञान प्रकट या ना प्रकट उसमें प्रकट कर सकते हैं पुरुषार्थ करके, इसलिए पर्याय महत्वपूर्ण है।
Magar ‘ठर्रा मूंग’ ki comparison to ‘Abhavya jeev’ se karte hain, right ? To phir
‘purushartha’ karke bhi usme ‘kevalgyaan’ kaise prakat kar sakte hain ? Yeh clarify karenge, please ?
अभव्य को द्रव्य से ठर्रा मूंग कहा जबकि भव्य में दो स्टेज/ दो पर्याय बताई गईं… एक में केवलज्ञान प्रकट है और एक में प्रकट नहीं।
ऐसा तो भाव इसमें नहीं आ रहा की अभव्य पुरुषार्थ करके केवलज्ञान प्रकट कर सकता है