Category: पहला कदम
ज्ञाता/ ग्राहक/ परिच्छेदक
ज्ञाता ही ग्राहक है ज्ञान का। परिच्छेदक Selective ज्ञान ग्रहण करने वाला। सब प्रकार के ज्ञान ग्रहण करने वाले संसारी प्राणी की तो नींद उड़
आयुबंध
7 कर्मों की स्थिति/ अनुभाग कषाय की तीव्रता से ज़्यादा होता है। लेकिन आयुबंध कषाय की तीव्रता में बँधता ही नहीं (मध्यम कषाय में ही
तनुवात वलय
लोक को घेरे सबसे बाहर के वलय की सघनता इतनी कम है कि इसके रंग की तुलना ही नहीं दी जा सकती है। चिंतन
मूल-प्रतिमा
एक इष्ट देव होते हैं जैसे वर्तमान चौबीस तीर्थंकर। दूसरे आराध्य देव जैसे विद्यमान बीस तीर्थंकर, जिन्होंने हमारा Direct हित नहीं किया। हालाँकि यह पूजने
गुरु-महिमा
आचार्य श्री शांतिसागर जी के शिष्य मुनि श्री पायसागर जी (बाद में आचार्य बने), गृहस्थ अवस्था में सब व्यसनों में लिप्त रहते थे। आचार्यश्री के
अरूपी / अमूर्तिक
अरूपी -> रुपात्मक/ वर्णनात्मक। अमूर्तिक -> आकारात्मक गुण। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (पंचास्तिकाय – गाथा 2)
ऋद्धि
मुनिराज ऋद्धियों का उपयोग नहीं करते तो चारण-ऋद्धिधारी क्यों करते हैं ? वर्धन S/o निधि (10 साल) ऋद्धियाँ प्रकट हो जाती हैं, मुनिराज प्रयोग करना
नोकषाय
रति भाव -> द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव अच्छे लगना। अरति भाव -> द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव से अलगाव का भाव। शोक -> अरति के साथ
व्रती
व्रती कौन ? रागद्वेष यदि अंतर्मुहूर्त से ज्यादा नहीं तो वह -> महाव्रती 15 दिनों से कम -> देशव्रती 6 माह से कम -> सम्यग्दृष्टि
प्रसन्न भाव
हास्य आदि आत्मा के स्वभाव नहीं। चिंता/ मद आदि का अभाव सामान्य/ प्रसन्न भाव है, जो आचार्य विद्यासागर जी तथा भगवान में पाया जाता था
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