पूर्ण समर्पण
श्री राम की सेवा तो हनुमान ने भी की और सुग्रीव ने भी। हनुमान के मंदिर श्री राम से भी ज्यादा मिलते हैं, सुग्रीव का एक भी मंदिर नहीं देखा जाता है जबकि वे तो किष्किंधा के नरेश थे और मोक्षगामी जीव भी।
कारण ?
उन्हें श्रीराम पर पूरा भरोसा नहीं था। वे सोचते थे रावण तो तीन खंड का राजा है उस पर विजय कैसे प्राप्त होगी ! मेरा भविष्य क्या होगा ! जबकि हनुमान का सिद्धांत था “सत्यमेव जयते”।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन- 1 मार्च)




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पूर्ण समपर्ण को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए आस्था के समपर्ण होना परम आवश्यक है।