कर्म अपना फल द्रव्य, क्षेत्र, काल तथा भाव के अनुसार देते हैं। वर्तमान में पहले तीन हमारे नियंत्रण में नहीं, पर हम भावों को सुधार कर न केवल कर्म-फल को सुधार सकते हैं; बल्कि ऐसा पुरुषार्थ भी कर सकते हैं कि भविष्य में ये तीनों अनुकूल मिलें।
चिंतन
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कर्मफल को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन में कर्मफल को भावों में सुधारकर पुरुषार्थ कर तीनों अनुकूल मिल सकें, ताकि उचित फल मिल सकता है।
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कर्मफल को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन में कर्मफल को भावों में सुधारकर पुरुषार्थ कर तीनों अनुकूल मिल सकें, ताकि उचित फल मिल सकता है।
Bahut hi thought-provoking aur useful chintan hai !