निरीहता
आचार्य श्री विद्यासागर जी से किसी गृहस्थ ने कहा… हम तो श्रावक हैं, आपके दर्शन करते समय भी कुछ अपेक्षाएं रखते हैं। पर आपकी निरीहता हमको अपनी उपेक्षा लगती है। हमको सीख कैसे मिलेगी ?
आचार्य श्री…
जो सीख चुका है, उसे सिखाने का भाव नहीं,
अपना ध्यान ही, अपनों का ध्यान है,
सिखाने से ज्यादा, दिखाने से सीखता है।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (जिज्ञासा समाधान – 15 मई)




6 Responses
निरीहता का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए भगवान् के पास अपनी आपेक्षायों के लिए जाना उचित नही है।
Acharya shri ne jo kaha, uska 1st aur 3rd sentence explain karenge, please ?
1) जो सीख चुका है उसको तो सीखने के भाव होंगे नहीं फिर भी तुम सिखाओगे तो तुमको इरिटेशन होगा।
3) सामने वाले के चरित्र को देखकर आदमी ज्यादा सीखता है न कि उसके बोलने समझाने से।
‘अपना ध्यान ही, अपनों का ध्यान है’ ka meaning clarify karenge, please ?
कहा है… सिखाने से ज्यादा दिखानेे से सीखता है। जब तुम अपना ध्यान रखोगे तो अपने भी देखकर अपना ध्यान रखेंगे।
Okay.