व्यवहार की अधिकता -> संसार अधिक।
काम की पूर्णता/ गति, व्यवहार + निश्चय से ही।
व्यवहार परतंत्र, निश्चय स्वतंत्र।
निश्चय होने के बाद व्यवहार से निश्चय बदलना नहीं चाहिए, क्योंकि निश्चय सबसे महत्वपूर्ण।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
Share this on...
One Response
निश्चय का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण हेतु निश्चय के साथ व्यवहार रखना परम आवश्यक है।
One Response
निश्चय का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण हेतु निश्चय के साथ व्यवहार रखना परम आवश्यक है।