Month: October 2026

अनु/प्रति जीवी

अनु –> उनमें ही/ अनुरूप/ इनमें प्राण हैं। जीवी –> जीवित रहने वाले/ आत्मा का जीवन/ अस्तित्व । प्रतिजीवी –> शरीर के जीवन (अघातिया कर्म)।

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उतावली

एक बहन धार्मिक क्रिया के लिए छोटी सी मटकी को नल के नीचे लगाकर नल पूरा खोल देती थीं (ताकि जल्दी भर जाए, पर आधी

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छोटी सी

छोटी सी कोशिश भी बड़े परिणाम ला सकती है। अरविंद छोटी सी गलती भी बड़े (वीभत्स) परिणाम ला सकती है। चिंतन

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अलगाव

जब हमारे तथा प्रियजनों के शरीर अलग-अलग हैं तो अलगाव तो अवश्यंभावी होगा ही। एक की परिभाषा तो यही है जिसका दूसरा ना हो, जैसे

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उच्च स्थान

आचार्य समन्तभद्र जी ने कहा है –> स्तवन (दूसरों के गुणों की प्रशंसा/ विनय) से उच्च कुल/ पद तथा कीर्ति मिलती है। निर्यापक मुनि श्री

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सुख

जब सुखी रहना आत्मा का स्वभाव है तो सुख में सुखी होने को मना क्यों ? संसारी सुख, सुख नहीं सुखाभास है, जो आत्मा का

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मूर्ति

भगवान की मूर्ति…. “निरखों अंग-अंग जिनवर के, इनमें झलके शांति अपार।” अलग-अलग अंगों का अपना-अपना प्रभाव होता है, उनसे अलग-अलग एनर्जी मिलती है। अलग-अलग समय

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नपुंसक

“नपुंसक” का शाब्दिक अर्थ “जो पुरुष नहीं है”, “जो स्त्री नहीं है” यह नहीं कहा। क्योंकि “पुंसक” यानी पुरुष। ऐसे ही “नामर्द” कहा ना स्त्री

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Time

“What is the best ? … Time. Which is the worst ? … Time. What is the difference between the two … of Time !”

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निद्रा

निद्रा –> सामान्य शरीर को आराम देने। जल्दी जग भी जाते हैं, जगने पर स्वस्थ महसूस, दोबारा सोने का मन नहीं। निद्रा-निद्रा –> आंखें खुलती

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मंगल आशीष

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