भक्ति
आचार्य श्री विद्यासागर जी की भक्ति सिर्फ़ भगवान के लिए ही नहीं, तीनों(देव, गुरु, शास्त्र) के लिए होती थी। पपौरा जी में गर्मियों के समय में 400 किलोमीटर के विहार करके आए।
मंदिरों का जीर्णोद्धार चल रहा था इसलिए अलग-अलग मंदिरों में मुनिराज स्वाध्याय करते थे। आचार्य श्री जब दर्शन करने के लिए निकलते तो हर मंदिर में टेबल पर रखी हुई जिनवाणियों को नमोस्तु करते हुए निकलते थे ।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 4 जुलाई)




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भक्ती का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए जिनवाणी की भक्ति करना परम आवश्यक है।