संज्ञी
आचार्य श्री विद्यासागर की तत्त्वार्थसूत्र(दूसरे अध्याय) की व्याख्या करते हुए कहते थे… संज्ञी मन सहित होते हैं लेकिन सब मन वाले संज्ञी नहीं होते जैसे केवलज्ञानी, इच्छा ना होकर भी इच्छा दिखती है।
द्रव्यमन के पोषण के लिए भावमन से मनोवर्गणायें ग्रहण करते रहते हैं।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (जिज्ञासा समाधान – 5 मार्च)




4 Responses
संज्ञी को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है।
‘सब मन वाले संज्ञी नहीं होते’; Iska example denge, please ?
महाराज जी ने ख़ुद ही एग्जांपल दे दिया, केवली भगवान।
Okay.