स्व-पर कल्याण
आगरा मंदिर के युवा श्री अमित का संस्मरण…
जब मैं 17-18 साल का था। मंदिर में एक बूढ़ी माताजी ने मुझसे कहा…”मुझे दिखाई नहीं देता। क्या तुम धर्म की पुस्तक (पद्म पुराण) मुझे सुना दिया करोगे ?”
अमित ने पूरा पुराण पढ़कर सुनाया। बाद में पता लगा उन्हें दिखाई ही नहीं देता था बल्कि उन्हें तो बहुत ज्ञान था।
ऐसे ही उन महिला ने कई बच्चों में रुचि पैदा की थी। इस तरह अमित को रुचि पैदा हो गई, आज भी वह बुजुर्गों को पढ़-पढ़ कर सुनाते हैं।
मुझे भी प्रेरणा मिली… बच्चों को सुनाने से बेहतर है, उनसे सुनना।



