आकिंचन
वह अमीर अमीर क्या जिसका मन फ़कीर न हो!
वह फ़कीर फ़कीर क्या जिसका मन अमीर न हो!
जीवन जब तक खुला नहीं, खिला नहीं होगा।
अकर्ता भाव शरीर के प्रति भी, तभी घर/ समाज सुखी रहेंगे।
त्याग तक पहुँचने के बाद प्राय: दिखाने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है, अहम् के साथ।
आनंद अकेले का ही, मज़ा/ सज़ा से ऊपर।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी




6 Responses
आकिंचन का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है।
शरीर के प्रति akarta bhaav se kaise ghar aur samaaj sukhi rahenge ? Ise explain karenge, please ?
शरीर को मैंने बनाया है या समाज को मैंने बनाया है, इससे खुद को घमंड और समाज में विघटन नहीं होगा !
‘मज़ा/ सज़ा से ऊपर’ ka meaning clarify karenge, please ?
मज़ा करने के लिए कोई कंपनी चाहिए अकेले के आनंद में तो स्थिति मज़े से ऊपर हुई ना ! और सज़ा कब? जब कुछ गलती करें, गलती करने के लिए कोई होना चाहिए, अकेले में आनंद में हूँ तो मन वचन काय तीनों से कोई गलती कर ही नहीं सकता।
Okay.