उत्तम अकिंचन्य धर्म
“कुछ भी मेरा नहीं” अकिंचन्य और इस भाव का आना अकिंचन्य-धर्म।
भीड़ में रहकर अपने नीड़ में रहना अकिंचन्य।
लोम-विलोम में सांस ग्रहण तथा त्यागी जाती है पर अकिंचन्य ग्रहण और त्याग के ऊपर।
वियोग और विरोध जन्य अभाव अकिंचन्य नहीं उसमें तो अवसाद होता है, अभाव में विनोद और आनंद अकिंचन्य है।
मुनि श्री सौम्य सागर जी महाराज



