उत्तम आकिंचन्य धर्म
“कुछ भी मेरा नहीं” होने के भाव को ही आकिंचन्य कहते हैं। हल्का होना ऊपर उठना सिखाता है, बाह्य तथा अंतरंग धारणाओं से भी।
एक व्यक्ति समुद्र के रास्ते व्यापार करके बहुत सोना लेकर वापस आ रहा था। रास्ते में तूफान आया और उसने अपनी जान बचाने के लिए सारा सोना समुद्र में फेंक दिया। स्वर्ण से तो रीत गया पर आयु रीत नहीं पाई।
आज शिक्षक दिवस भी है। शिक्षा वही जो मुक्ति में सहायक हो और मुक्ति के लिए रीतना भी ज़रूरी है। आज की शिक्षा कलेक्शन ऑफ़ इनफार्मेशन है जबकि होना चाहिए था करेक्शन ऑफ़ इनफॉरमेशन और उसके लिए जरूरी है कनेक्शन होना।
आज का नियम था दृष्टि संयम,आई कांटेक्ट से बचना यानी नज़रें झुका कर रखना जो कोमलता प्रदान करता है और कर्म के कांटेक्ट से बचाता है।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 5 सितम्बर)




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उत्तम आकिंचन का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है। पर पदार्थों को अपना न मानना और उससे विमुख होना, परिग़ह का त्याग करके निज में स्थित होना ही आकिंचन धर्म है। आकिंचन धर्म में अपना कुछ नही है, सभी का त्याग हो गया है मेरा क्या है उसकी पहिचान करना परम आवश्यक है। अभी लोग मैरा, तैरा, मैरा तैरा में उलझे रहतें है, यह सब दुख के कारण है। जो कुछ आपनाया है, वह संयोग वश मिला है उसका कर्तव्य भाव मानकर देखना है । अतः जीवन में कर्मो पर ध्यान रखना परम आवश्यक है क्योंकि यह सब ओनलाइन है, जिसका परिणाम मिलता है।