उत्तम त्याग धर्म
राग धूप है तथा त्याग छाँव। त्याग तो अवश्यम्भावी है,स्ववश किया तो आनंद परवश किया तो छटपटाहट। आचार्य ज्ञान सागर बताते थे… जो त्याग परवश किया जाता है वह उल्टी जैसा है, परेशानी देने वाला और स्ववश जैसे दैनिक क्रिया में, वह सुकून देने वाला।
आज शिविरार्थियों को नियम दिया है… सब तरह के रसों का त्याग, नीरस उबला भोजन करने का, उससे ही वस्तु का असली स्वाद आता है। यदि उसको 32 बार चर्वण करके खाया जाए तो मिष्ठान से भी ज्यादा स्वाद आता है। जिव्हा पर रखा हुआ नियंत्रण, जीवन पर नियंत्रण बन जाता है। सामने वाला बांधेगा तो बंधन, दबाव/ असहजता लगेगी। स्वयं तो संयम, भावों में निर्मलता आती है। हीरा ऊपर का त्याग करता है तो चमकदार कीमती बन जाता है।
कभी भाव आया कि हम किसी बुराई का त्याग करें और करने पर यदि आनंद आया तो सोचा कि कोई और बड़ी बुराइयों का करें !
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 4 सितम्बर)




One Response
उत्तम त्याग धर्म का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है। जीवन में भोजन करते हैं तो मल छोडना पडता है, सांस लेते है उसको भी छोडना पडता है। श्रमणों के लिए सांसारिक जीवन का त्याग करते हैं। जबकि श्रावको को परिग़ह, बुराईयों को त्याग करना परम आवश्यक है। जीवन को पुण्य बनाने के लिए दान करना परम आवश्यक है। दान करने के फायदे चार होते है। धन अर्जित करने पर पाप लगता हैं, अतः दान करने पर पाप कटता है। दान करने पर आशक्ति समाप्त होती हैं। दान करने पर उदारता का भाव आता है। दान देने पर जीवन पुण्यमय बनता है। दान परमार्थिक कार्यों में करना परम आवश्यक है।