उत्तम त्याग
जिनशासन बहुमत से नहीं चलता, आदिनाथ भगवान अकेले थे 4000 मुनि राग के वशीभूत हो त्याग के मार्ग पर निकले थे, वे विपक्ष में थे।
पित्त उछलता है तो स्वादिष्ट भोजन भी रसदार नहीं लगता, चित्त उछलता है तो बेरस भी रसदार लगने लगता है।
अनंतकाल से ग्रहण कर रहे हैं, लोहा ज़ंग को ग्रहण करता है जो उसे ही खा जाता है, औलाद को ज़ंग लगी तो उसे खोखला(घर में ही जंग* छेड़ देते हैं) कर देती है।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 4 सितम्बर)
* युद्ध।




3 Responses
‘चित्त उछलता है तो बेरस भी रसदार लगने लगता है।’ Is sentence ka meaning clarify karenge, please?
पित्त/ एसिडिटी/ वोमिटिंग सेंसेशन की कंडीशन में रसदार भोजन भी बेरस लगता। मन अच्छा हो/ खुश हो तो बेरस भोजन भी रसदार लगता है।
Okay.