उत्तम ब्रह्मचर्य
जिनमें सब पूजायें तथा 10 धर्म मूर्ति रूप में दिखते थे, उनका नाम था आचार्य श्री विद्यासागर जी। वे तंत्र थे जिनको याद करके मन मंत्र बन जाता है। एक सच्चे ठीये को पकड़ लो तब ठीये बदलने नहीं पड़ते।
ब्रह्मचर्य को नहीं मानने वाले वही होते हैं जो विकारों से हार जाते हैं। वे ही उदाहरण देते हैं… जैसे भूख के लिए भोजन जरूरी है ऐसे ही हारमोंस बननेे पर काम जरूरी। वे नहीं जानते समुद्र और अग्नि को लगातार पानी/ईंधन देते रहने से वे शांत नहीं होते और भड़कते हैं। जबकि उपवास भूख को और मन को मतवाला बनाने से रोकते हैं।
जो अपना समय मौन से बिताते, उनके हारमोंस भी दबे रहते हैं। जैसे ही मन की खुराक बंद, हारमोंस भी शांत। फिर हारमोंस हार कर ब्रह्मचारी को हार पहनाने लगते हैं।
सच्चा ज्ञानी जानता है कि फितूर भी मेरा, कसूर भी मेरा, शूरवीर बनने का काम भी मेरा।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 6 सितम्बर)




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Beautiful post ! Namostu Gurudev !