उत्तम मार्दव धर्म
मान रूपी बीज को जब माटी में मिलायेंगे तब सम्मान रूपी वृक्ष तैयार होगा।
मेरा अपमान न हो जाए इसकी तो बहुत चिंता, पर मैं अपमान योग्य ना हो जाऊँ इसका ध्यान नहीं।
आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे… कोई देखे तो लज्जा आती, मर्यादा टूटने से ना।
निरीक्षण करते रहें… हमारा मान दूसरों के अपमान की ओर जा रहा है या दूसरे को मान देने की ओर !
हमारे पूर्णांक मजबूरी में कम हो सकते हैं पर पुण्य की कमी मंजूरी से ही।
बुद्धि में मान रखने वाला बुद्धू कहलाता है।
यदि कोई आपकी बार-बार आलोचना कर रहा हो तो दो पट्टियाँ बनाओ। हर बुराई सुनने पर पहली पट्टी में गांठ लगाते जाओ। जब पहली पट्टी गांठों से भर जाए तो देखें…पहली की लंबाई कम हो गई। क्या आप चाहते हैं, आपकी लंबाई कम हो ! पर दोनों का वजन बराबर होगा क्योंकि गांठों में आपने अपनी कोई धरणा नहीं रखी।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 29 अगस्त)




4 Responses
उत्तम मार्दव धर्म को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है।
Mere following doubts ko clarify karenge, please:
1) ‘पुर्ण्यांक’ ka kya meaning hai ?
2) ‘दोनों का वजन बराबर होगा क्योंकि गांठों में आपने अपनी कोई धरणा नहीं रखी।’ Iska kya abhipraay hai ?
महाराज जी ने जो एक्सरसाइज बुक बनाई है शिविरार्थियों के लिए, उसमें हर एक, एक्टिविटी के पॉइंट्स दिए हुए यह काम करोगे तो इतने पॉइंट प्लस, यह काम करोगे तो इतने। उस पर 10 दिन का डिसाइड करते हैं चक्रवर्ती आदि। कुछ ऑब्जर्वरों के भी पॉइंट होते हैं। इनको पूर्णांक कहते हैं।
2) एक पट्टी सीधी है, दूसरी में आप गांठ लगाते जा रहे हैं। दोनों का वेट बराबर होगा ना क्योंकि गांठों में आपने कुछ अपना आग्रह ऐड नहीं किया। मेरा तुमसे मतभेद है और मैंने उसमें ऐड कर लिया कि यह तो नालायक लड़की है फिर उसका वेट बढ़ जाएगा ओवरऑल पट्टी का।
Okay.