शिष्य सालों तक गुरु से ज्ञान अर्जित करता रहा।
गुरू → क्या समझे ?
कुछ नहीं।
गुरु → तो, सार को समझ लो, पुद्गल और चेतन अलग-अलग हैं। पुद्गल को पुद्गल तथा चेतन को चेतन मानना ही सार है।
(इसका विस्तार तो अशुभ से दूर रखने के लिये होता है।)
मुनि श्री मंगलानंद सागर जी
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2 Responses
ज्ञानसार को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः ज्ञान प्राप्त करने के लिए गुरुओं से प़ाप्त करना परम आवश्यक है।
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ज्ञानसार को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः ज्ञान प्राप्त करने के लिए गुरुओं से प़ाप्त करना परम आवश्यक है।
ज्ञान ke सार ka bahut hi accha explanation hai ! Namostu Gurudev !