दान
“अनुग्रहार्थ स्वस्ताति सर्गो दानम्”
अनुग्रह में दोनों पक्षों के गुणों में बढ़ोतरी।
“स्वस्ताति” → स्व-धन के अतिसर्ग (त्याग) को दान कहते हैं। यहाँ धन या धन से ली हुई वस्तु ग्रहण करना। धन तो चारों दान देने में आवश्यक। लेकिन खाली धन देने से छुटकारा नहीं, भाव सहित उपस्थिति भी जरुरी होती है।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र – 7/38)




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दान का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए अपने धन का त्याग मंदिर निर्माण, आहार दान मुनियों को उपकरण देना, संत निवास का निर्माण, भैया वृत्ति करना साथ में भाव रखकर करना परम आवश्यक है।