धर्म
धर्म स्व-आश्रित ही नहीं, पर निमित्तक भी है।
साधुजन भी गृहस्थों की भोजन व्यवस्था लेते हैं।
काया के आश्रित तो साधु तथा गृहस्थ दोनों रहते हैं।
आज के समय में पुरुषार्थ भी शरीर के आश्रित है।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
धर्म स्व-आश्रित ही नहीं, पर निमित्तक भी है।
साधुजन भी गृहस्थों की भोजन व्यवस्था लेते हैं।
काया के आश्रित तो साधु तथा गृहस्थ दोनों रहते हैं।
आज के समय में पुरुषार्थ भी शरीर के आश्रित है।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
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धर्म की विस्तृत परिभाषा की गई है वह पूर्ण सत्य है। श्रमण एवं श्रावक को काय के लिए भोजन की आवश्यकता रहती हैं। इसके अतिरिक्त पुरुषार्थ करना परम आवश्यक है।