निगोदिया
आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे… पूर्व आचार्यों ने पाँच स्थावरों के नाम दिये, पर यह नहीं कहा कि स्थावर पाँच ही होते हैं जैसा पाँच इंद्रियों के बारे में कहा।
तो निगोदिया को वनस्पतिकायिक में क्यों रखते हैं ! इसकी एक अलग से छठी श्रेणी भी हो सकती है ना !
मुनि श्री सौम्य सागर जी (श्री जीवकांड – गाथा 201 – 19 मई)




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निगोदिया का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है।