प्रतिध्वनि
हमारा संसार प्रतिध्वनियों का ही है, जिसे हम प्रतिपल जी रहे हैं।
पाप कर्मों की भी प्रतिध्वनियां सताती हैं, क्रिया एक प्रतिक्रिया अनेक। यह सिद्धांत सत्कर्मों में भी लगता है तभी तो कहा.. कर्म फला अरिहंता(शुभ कर्म भगवान तक बना देते हैं)।
हम अपनी ही पाप क्रियाओं की प्रतिध्वनियां भी स्वीकार नहीं करते हैं जैसे चोर चोरी करके जब घिर जाता है तो चोरी का सामान पटक कर कहता है… यह मेरा नहीं है।
प्रतिध्वनि कम करने के लिए विशेषज्ञ उल्टे मटके लटका देते हैं यानी खाली होना सीख जाओ। पहले अनावश्यक को कम करो, साधुजन तो आवश्यक को भी कम करके गुरु बनते हैं।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 22 मई)




One Response
प़तिध्वनि का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए प़तिध्वनि कम करने का प़यास कम होना चाहिए एवं अनावश्यक कार्य करना उचित नहीं है।