फल
जैसा खेत/ बीज, वैसी फसल।
सुपात्र की पूजा से पूजक को सम्मान, दान से भोग/ इच्छापूर्ति, भक्ति से सुंदरता(असुंदर भी सुंदर लगने लगता है)।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (रत्नकरण्ड श्रावकाचार श्लोक – 116)
जैसा खेत/ बीज, वैसी फसल।
सुपात्र की पूजा से पूजक को सम्मान, दान से भोग/ इच्छापूर्ति, भक्ति से सुंदरता(असुंदर भी सुंदर लगने लगता है)।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (रत्नकरण्ड श्रावकाचार श्लोक – 116)