भगवान / गुरु
बच्चों को भगवान की “जय” कहलवाओ तो वह कह देता है “दै”। उसकी भाषा माँ ही समझ पाती है।
भगवान की भाषा गुरु ही समझते हैं। जैसे शुद्ध दूध को न पचाने वाले बच्चे को माँ पानी मिलाकर देती है, ऐसे ही गुरु भगवान की भाषा को Dilute करके भक्तों को देते हैं।
गुरु, भगवान और भक्त के बीच की कड़ी हैं।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी




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भगवान्/गुरु का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण हेतु भक्त को भगवान् एवं गुरुजनों पर श्रद्बान करना परम आवश्यक है।